स्थापना दिवस पर पूछ रही हैं आंदोलनकारी महिलाएं... पहाड़ ने इतने संघर्ष, इतने बलिदान के बाद पाया क्या?

राज्य निर्माण आंदोलन में सक्रिय रही करीब डेढ़ दर्जन महिलाओं केा पुष्प गुच्छ भेंट कर और शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया.
राज्य निर्माण आंदोलन में सक्रिय रही करीब डेढ़ दर्जन महिलाओं केा पुष्प गुच्छ भेंट कर और शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया.

विधानसभा अध्यक्ष ने किया आंदोलनकारी महिलाओं को सम्मानित, लेकिन फिर भी उभर आई टीस

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देहरादून. उत्तराखंड राज्य बने हुए आज 20 साल पूरे हो गए हैं. उत्तराखंड अपना 21 वां स्थापना दिवस मना रहा है. इस मौके पर शहीद आंदोलनकारियों को याद करते हुए विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल ने राज्य आंदोलन में सक्रिय रही मातृ शक्ति को सम्मानित किया. विधानसभा भवन में आयेाजित कार्यक्रम में विधायक चंद्रा पंत, विधायक उमेश शर्मा काऊ, विधायक हरबंश कपूर भी मौजूद थे. कार्यक्रम में राज्य निर्माण आंदोलन में सक्रिय रही करीब डेढ़ दर्जन महिलाओं केा पुष्प गुच्छ भेंट कर और शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया. साथ ही उन्हें गैरसैंण विधानसभा की तस्वीर भी सम्मान स्वरूप भेंट की गई.

वह कोष कहां गया?

कार्यक्रम में सम्मानित हुई राज्य आंदोलनकारी विजय लक्ष्मी गुसाईं का कहना था कि उत्तराखंड में जिस संतुलित विकास की दरकार थी वह आज भी नहीं हो पा रहा है. पहाड़ से पलायन, हर हाथ को काम की स्थिति आज भी पहले की तरह बनी हुई है.



गुसाईं कहती हैं कि राज्य आंदोलनकारियों ने दिल्ली, मुज्जफरनगर से लेकर श्रीनगर के श्रीयंत्र टापू कांड तक झेला लेकिन उत्साह कभी कम नहीं हुआ. बस अपना उत्तराखंड चाहिए था. आंदोलन में भागीदार रही लगभग हर महिला की दरकार थी कि उसके बेटे-बेटियों को नौकरी मिल सके, रोज़गार मिल सके लेकिन आज भी बेरोज़गार युवा नौकरी के लिए भटक रहे हैं. कोरोना काल के बाद जरूर राज्य सरकार का ध्यान स्वरोजगार की ओर गया लेकिन हकीकत में योजनाएं भी चंद लोगों तक ही पहुंच पा रही हैं.
विजय लक्ष्मी गुसाईं कहती हैं कि मुज्जफरनगर कांड के बाद उत्पीड़ित महिलाओं, घायलों के लिए एक कोष बनाया गया था लेकिन आज उसक कोष का भी अता-पता नहीं है.

क्यों दिया इतना बलिदान? 

राज्य आंदोलनकारी कमला कंडारी कार्यक्रम में शामिल होने पौड़ी गढ़वाल के सुदूर क्षेत्र धुमाकोट से ढाई सौ किलोमीटर का सफर तय कर पहुंचीं थीं. उनका कहना है कि राज्य बनने से पहले वह बच्चों की पढ़ाई के लिए पहाड़ छोड़कर मैदान में आ गई थीं. देहरादून आईं तो राज्य आंदोलन में कूद पड़ीं. फिर न बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की चिंता की न घर बार की. कई जगह पुलिस की मार भी खाई. कंडारी कहती हैं तब जवान थीं, अब साठ साल के पार जा चुकी हैं तो तब की मार अब शरीर में दर्द करती है.

कमला कंडारी का कहना था कि वह फिर से वह धूमाकोट स्थिति अपने गांव में रहने लगी हैं. राज्य बनने के बाद शहरों में तो हालात बदले हैं लेकिन अफसोस कि पहाड़ में आज भी समस्याएं कम नहीं हुई हैं. विकास की किरण इन दो दशकों में भी सुदूर गावों तक नहीं पहुंच पाई हैं. कहीं सड़के नहीं हैं, जहां हैं तो वहां गड्ढे इतने ज़्यादा हैं कि आप चल नहीं सकते.

अस्पताल औपचारिकता भर बन कर रह गए हैं. हर छोटी-छोटी बीमारी के लिए शहरों की ओर भागना पड़ता है. पढ़ाई लिखाई के स्तर में भी कोई सुधार नहीं हुआ है. वह पूछती हैं कि पहाड़ ने इतने संघर्ष, इतने बलिदान के बाद पाया क्या?

कंडारी कहती हैं कि मैं कभी खुद से सोचती हूं कि इस आंदोलन में अपना सर्वोच्च देकर हमने पाया क्या. अपना बहुमूल्य समय बर्बाद करने के सिवा... दु:ख भी होता है कि हम तब भावनाओं में बह गए. फिर वह खुद ही बोल उठती हैं कि दरअसल आंदोलन था ही भावनाओं से जुड़ा हुआ. शायद यही कारण है कि अब यथार्थ के धरातल पर भावनाओं की कोई कद्र नहीं है.
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