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दिहाड़ी मज़दूरों की मदद को बढ़े तो हैं बहुत हाथ लेकिन इन तक नहीं पहुंच पा रहा कोई
Dehradun News in Hindi

Rajesh Dobriyal | News18 Uttarakhand
Updated: March 28, 2020, 2:12 PM IST
दिहाड़ी मज़दूरों की मदद को बढ़े तो हैं बहुत हाथ लेकिन इन तक नहीं पहुंच पा रहा कोई
बिहार के किशनगंज के और अन्य 9 दिहाड़ी मज़दूरों का कहना है कि उनके पास राशन खत्म हो गया है और उन्हें अभी तक कोई सहायता नहं मिली है.

सूचना विभाग से चंद कदम दूर बिहार के इन युवकों के पास न राशन बचा है, न गैस

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देशव्यापी लॉकडाउन की वजह से काम न मिलने की वजह से देश भर से दिहाड़ी मज़दूर अपने घरों के लिए पलायन कर रहे हैं. देहरादून में कुछ ख़ुशकिस्मत ऐसे हैं जिनके सिर पर छत है लेकिन खाने का संकट उनके लिए भी है क्योंकि काम के साथ राशन भी खत्म हो गया. अच्छी बात यह है कि मानवता पर आए इस संकट में मदद के लिए उत्तराखंड में भी कई हाथ आगे बढ़े हैं लेकिन त्रासदी देखिए कि कोई भी हाथ इन ज़रूरतमंदों तक नहीं पहुंच पा रहा है. कोरोना वॉरियर्स की प्रेरणादायक कहानियां के बीच यह कड़वी हकीकत भी जानिए कि कैसे राहत कार्यों के नाम पर शोर ज़्यादा हो रहा है और को-ओर्डिनेशन गायब है.

उधार का राशन मिलना भी बंद

बिहार के किशनगंज ज़िले के 10 युवक देहरादून के अपर नेहरु ग्राम क्षेत्र में गढ़वाली कॉलोनी में रहते हैं. इनमें हिंदू भी हैं, मुसलमान भी. यहां बने छह-सात कमरों के इस मकान को आस-पास के लोग लेबर कॉलोनी कहते हैं. इन युवकों में सबसे बड़े हैं बाबुल. वह बताते हैं कि छह-साल से वह यहां रह रहे हैं और सभी लोग कंस्ट्रक्शन के फ़ील्ड में काम करते हैं. लॉकडाउन के बाद काम बंद हो गया है तो वह भी अपने मकान में बंद हैं.



बाबुल कहते हैं कि उनके पास बमुश्किल एक दिन का राशन बचा है. पड़ोसी दुकानदार सुरेंद्रर बिष्ट उन्हें उधार दे दिया करता था लेकिन लॉकडाउन में उसकी दुकान भी बंद है और उसके पास भी सामान ख़त्म होने लगा है. बाबुल कहते हैं कि आखिर वह कब तक उधार देगा. देना चाहेगा तो देगा कैसे... दुकान खोलेगा तो चालान कट जाएगा. बाबुल कहत हैं कि वह बेचारा खुद परेशान है कि इस लॉकडाउन में हुए नुक़सान की भरपाई कैसे होगी.



daily wager tanveer, तनवीर की 29 मार्च को शादी थी जो अब स्थगित हो गई है.
तनवीर की 29 मार्च को शादी थी जो अब स्थगित हो गई है.


अपनी ही शादी में जाने से चूके

इन युवकों में से कई लोग घर जाने की तैयारी कर रहे थे. ट्रेन का टिकट नहीं मिला था तो एक डग्गामार बस में बुकिंग करवा ली थी. ऐसे बसें अवैध रूप से यूपी, लखनऊ के कई शहरों के लिए चलती हैं- दिक्कत यह है कि अब इस पैसे के वापस मिलने की उम्मीद नहीं है.

तनवीर की रविवार, 29 मार्च यानी कल शादी तय थी. लॉकडाउन नहीं होता तो 27 को वह घर पहुंच जाते और आज घर में मेहमानों की गहमागहमी होती. तो अब क्या होगा? अब बाद में होगी, वह थोड़ी बुझी आवाज़ में बोलते हैं... फिर ज़मीन की तरफ़ देखते हुए कहते हैं, पता नहीं कब.

बहरहाल अभी इन सभी की चिंता यह है कि खाना कैसे खाएंगे.

तो मुख्यमंत्री को करें फ़ोन

उत्तराखंड सरकार ज़िलाधिकारियों के माध्यम से हर गरीब तक राशन पहुंचाने का अभियान चला रही है. खुद मुख्यमंत्री कोरोना से लड़ने के लिए स्थितियों का जायज़ा ले रहे हैं लेकिन बाबुल और उनके साथियों को पता ही नहीं कि वह किससे मदद मांगें.

daily wager house, जिस मकान में ये दिहाड़ी मज़दूर रहते हैं आस-पड़ोस के लोग उसे लेबर कॉलोनी कहते हैं.
जिस मकान में ये दिहाड़ी मज़दूर रहते हैं आस-पड़ोस के लोग उसे लेबर कॉलोनी कहते हैं.


देहरादून के ज़िलाधिकारी तो पत्रकारों तक के फ़ोन नहीं उठाते, वह बाबुल जैसों की क्या सुनेंगे. हालांकि उत्तराखंड के लिए अफ़सरों का यह रवैया नया नहीं है. हाल ही में हुए बजट सत्र में नेता प्रतिपक्ष समेत विपक्षी विधायकों ने मुख्यमंत्री से शिकायत की थी कि अधिकारी उनके फ़ोन नहीं उठाते तो मुख्यमंत्री ने सभी को अपना नंबर दे दिया था. लेकिन क्या बाबुल जैसे गरीब, ज़रूरतमंद अब सीधे मुख्यंत्री को फ़ोन करेंगे?

मदद का कोई हाथ नहीं पहुंचा यहां तक

सरकार के साथ ही बहुत से लोग व्यक्तिगत स्तर पर, एनजीओ-गुरुद्वारे ज़िला प्रशासन से साथ मिलकर राशन और भोजन ज़रूरतमंदों को दे रहे हैं लेकिन वह इस लेबर कॉलोनी तक नहीं पहुंचे हैं. सरकार से अलग बीजेपी ने ज़रूरतमंदों की मदद के लिए मंडल स्तर पर टीमें गठित करने का ऐलान कर दिया है लेकिन सत्ताधारी पार्टी तक भी इनकी गुहार नहीं पहुंची है जबकि कॉलोनी में कमल के झंडे उठाने वाले लोग चंद कदमों की दूरी पर मौजूद हैं.

पड़ोसियों ने बाबुल की बात स्थानीय पार्षद से करवा दी थी और उन्हें मदद का आश्वासन भी मिला था लेकिन दो दिन बाद भी कोई मदद नहीं पहुंची है.

देहरादून पुलिस भी थाना स्तर पर हर ज़रूरतमंद तक राशन पहुंचाने की कोशिश कर रही है. पुलिस का दावा तो यह भी है कि वह ऐसे लोगों के सिलेंडर (अमूमन बाबुल जैसे युवक छोटे सिलेंडर लेते हैं) भी रीफ़िल करवा देगी. लेकिन इन लोगों को नहीं पता कि ऐसा भी होता है.

daily wager, kishanganj, इन लोगों को पता ही नहीं कि मदद मांगे किससे.
इन लोगों को पता ही नहीं कि मदद मांगे किससे.


को-ओर्डिनेशन की कमी

गरीब, ज़रूतमंदों की मदद के लिए भावनाएं भी हैं और कोशिशें भी. लेकिन बाबुल और उसके साथियों तक अगर मदद नहीं पहुंच पा रही है तो यह इसलिए भी है क्योंकि ज़िला प्रशासन, पुलिस, एनजीओ, राजनीतिक दलों, व्यक्तिगत स्तर पर मदद करने वालों के बीच को-ओर्डिनेशन नहीं है.

यह तो सब मान रहे हैं कि देशव्यापी संकट के इस दौर में स पहली ज़रूरत यह है कि हर ज़रूरतमंद को मदद मिले, कोई भूखा न रहे लेकिन यह होगा कैसे? अधिकारी फ़ोन उठाएंगे नहीं, पार्टी कार्यकर्ता जानकारी देंगे नहीं और जिन्हें पता चल गया है वह कुछ करने की स्थिति में हैं नहीं.

लॉकडाउन के दौरान बाज़ारों में भीड़ नियंत्रित न कर पाने के अपराध के बाद यह दूसरी बड़ी असफलता है जिसकी वजह से उत्तराखंड कोरोना से जंग हारता दिख रहा है.

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First published: March 28, 2020, 1:56 PM IST
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