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दून में 3 लाख लीटर दूध की डिमांड, डेयरी विभाग 10 फीसदी कर रहा सप्लाई

दून में 3 लाख लीटर दूध की डिमांड, डेयरी विभाग 10 फीसदी कर रहा सप्लाई

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देहरादून में कई दशकों से बाजारों में अपने उत्पादों की क्वालिटी को लेकर मशहूर रहा दून का डेरी विभाग अब लोगों की मांगों पर खरा उतरने में नाकाम साबित हो रहा है.

देहरादून में कई दशकों से बाजारों में अपने उत्पादों की क्वालिटी को लेकर मशहूर रहा दून का डेरी विभाग अब लोगों की मांगों पर खरा उतरने में नाकाम साबित हो रहा है.

लगातार दूध और दुग्ध उत्पादकों की मांग बढ़ती जा रही है, लेकिन डेरी विकास विभाग मांगों की आपूर्त करने में पिछड़ता जा रहा है. राजधानी देहरादून में रोजाना करीब 3 लाख लीटर दूध की डिमांड है, लेकिन डेरी विभाग महज 30 हजार लीटर दूध की रोजाना सप्लाई कर पा रहा है.

डिमांड के सापेक्ष महज 10 फीसदी दूध की सप्लाई हो रही है. मैनेजमेंट की कमी और पुरानी मशीनें दूध के कारोबार भारी पड़ रही है. आधुनिक प्लांट लगाने का मामला शासन में लंबित चल रहा है.

दुग्ध डेरी विकास विभाग दूध के कारोबार को बढ़ाने के लिए कई सालों से ऐड़ी चोटी का जोर लगा रहा है. डेरी विकास विभाग की बाजारों में भागेदारी भी घट रही है. आज निजी कंपनियों का दूग्ध कारोबार पर कारीब 70 फीसदी कब्जा है.

डेरी विभाग के प्लांट की मशीनें काफी पुरानी हो चुकी हैं, जिसकी वजह से दूध की बाजारो में सप्लाई भी नहीं हो पा रही है. दूध के कारोबार को बढ़ाने की योजनाएं शासन की फाइलों से बाहर नहीं निकल पा रही हैं. वहीं, सरकार किसानों से 33 रुपए प्रतिलीटर की हिसाब से दूध खरीद रही है, जिस पर उन्हें प्रतिलीटर 4 रुपए की सब्सिडी भी सरकार दे रही है यानी दूग्ध उत्पादक को प्रतिलीटर 37 रुपए मिल रहा है. लेकिन हैरत की बात है कि करोड़ों रुपए के प्लांट होने के बाद भी डेरी विभाग दूध की सप्लाई नहीं बढ़ा पा रहा है.

राजधानी देहरादून में 50 हजार लीटर प्रति दिन के हिसाब से दूध की सप्लाई करने वाले दुग्धशाला का प्रस्ताव शासन में लंबित चल रहा है. राज्य निर्माण के बाद दुग्धशाला में कोई विशेष बदलाब नहीं हुआ, जिसका नतीजा अब सबके सामने है.

फिलहाल कर्मचारियों का कहना है कि बाजार में लगातार निजी दुग्ध कंपनियों के साथ कम्पटीशन बढ़ता जा रहा है, जिसका मुकाबला करना अब डेरी विभाग को भारी पड़ रहा है. जबकि डेरी विभाग कई तरह के दुग्ध प्रोडक्ट को मार्केट में उतारा है.

फिलहाल डेरी विभाग जिस तरह से काम कर रहा है ऐसे में निजी कंपनियों के सामने विभाग का टिके रहना मुश्किल हो रहा है. बेहतर होता कि अधिकारी विभाग के लंबित मामलों का निपटारा वक्त से करते तो लोगों को सस्ता और क्वालिटी का दूध में मिलता और डेरी विभाग का राजस्व भी बढ़ता.

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