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Heroes of Freedom : देश की आज़ादी में उत्तराखंड के इन नायकों की रही अहम भूमिका, जानें इनके बारे में

देश की आज़ादी में उत्तराखंड के इन नायकों की रही अहम भूमिका

देश की आज़ादी में उत्तराखंड के इन नायकों की रही अहम भूमिका

26 जनवरी को सारा देश गणतंत्र दिवस के रूप में मना रहा है. अंग्रेजी हुकूमत से देश को बचाने के लिए जगह-जगह से आजादी के दीव ...अधिक पढ़ें

रिपोर्ट-हिना आज़मी

देहरादून. 26 जनवरी को सारा देश गणतंत्र दिवस के रूप में मना रहा है. अंग्रेजी हुकूमत से देश को बचाने के लिए जगह-जगह से आजादी के दीवानों ने लड़ाई में हिस्सा लिया. वहीं उत्तराखंड भी इस लड़ाई से अछूता नहीं रहा. पेशावर कांड के महानायक वीर चंद्र गढ़वाली हो या कालू सिंह मेहरा कई उत्तराखंड के रहने वाले लोग आजादी की लड़ाई के मैदान में कूद पड़े, जिनमें हरगोविंद पंत ,गोविंद बल्लभ पंत ,बद्रीदत्त पांडेय ,बिशनी देवी जैसे बड़े नाम शामिल हैं.
देश की आजादी में जिन रणबांकुरों ने स्वतंत्रता आंदोलन के लिए अलख जगाई थी उनमें से कई उत्तराखंड के वीर सपूत भी रहे हैं. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उत्तराखंड से महात्मा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू का अहम ताल्लुक रहा है. कौसानी, हरिद्वार, देहरादून जैसे कई जिलों में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने दौरा किया और पहाड़ की जनता को स्वतंत्रता आंदोलन में जुड़ने के लिए प्रेरित किया.
पूरे देशभर में जब स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज बुलंद हो चुकी थी, तब यह गूँज पहाड़ो तक भी पहुँची थी. नमक के लिए सत्याग्रह हो या कौसानी यात्रा हो, जहां उत्तराखंड में महात्मा गांधी ने जन सैलाब को राष्ट्रीय एकता के सूत्र में जोड़कर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मुखर लड़ने के लिए तैयार किया तो पंडित जवाहरलाल नेहरू भी देहरादून की जेल में रहे. स्वतंत्रता सेनानियों के नक्शे कदम पर चलकर देश की आजादी का सपना लिए पहाड़ की जवानी ने मोर्चा खोला तो आधी आबादी भी सड़कों पर उतरी.
कालू सिंह मेहरा

1857 के स्वतंत्रता संग्राम से उत्तराखंड छोटा नहीं रहा. पहाड़ की जनता भी धीरे-धीरे गुलामी की जंजीरें तोड़ने के लिए तैयार हो रही थी. जगह-जगह प्रदर्शन धरने कर स्थानीय आंदोलन को ताकत दे रहे थे. चंपावत जिले के गांव के कालू सिंह मेहरा पहले क्रांतिकारी थे, जो ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ क्रांतिवीर संगठन बनाकर युवाओं में जोश भर रहे थे. कुमाऊं में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लोगों के आंदोलन का इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि 14 वर्ष के भीतर ही कुमाऊं में अल्मोड़ा अखबार छपना शुरू हो गया. जिसके माध्यम से अंग्रेजों के अत्याचारों से लोगों को रूबरू कराया जा रहा था. कालू सिंह मेहरा लोगों को जोड़ने का प्रयास कर रहे थे.

पं हरगोविंद पंत

अल्मोड़ा कांग्रेस की रीढ़ कहे जाने वाले हरगोविंद पंत को अंग्रेजों द्वारा भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान सबसे पहले नजरबंद किया गया था. उन्होंने आंदोलन में अहम भूमिका निभाई. हर गोविन्द पन्त देश की संविधान सभा के सदस्य रहे .

वीर चंद्र गढ़वाली

पेशावर कांड के महानायक वीर चंद्र गढ़वाली पहले ब्रिटिश सेना में सैनिक थे. साल 1930 में अंग्रेजों ने उन्हें पेशावर भेजा जहां आंदोलन चल रहा था और आंदोलन को कुचलने के आदेश दिए गए, लेकिन ’गढ़वाल सीज फायर’ कहते हुए उन्होंने निहत्थे क्रांतिकारियों पर गोली चलाने से मना कर दिया. जिसके बाद इन्हें जेल भेजा गया और इनकी संपत्ति जब्त कर ली गई. 1941 में जेल से रिहा होने के बाद वीर चंद्र सिंह गढ़वाली महात्मा गांधी से मिले और भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हो गए.

बद्रीदत्त पाण्डेय

’कुमाऊं केसरी’ के नाम से मशहूर बद्री दत्त पांडे को 1921 में हुए कुली-बेगार आन्दोलन में अहम माना गया क्योंकि उन्होंने अंग्रेजों की इस प्रथा को खत्म करने के लिए अपना अहम योगदान दिया.कुली-बेगार आन्दोलन को महात्मा गांधी ने रक्तहीन क्रांति कहा क्योंकि यह अहिंसात्मक रूप से हुआ.

बिशनी देवी

राज्य की पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी बिशनी देवी की भी अहम भूमिका रही. देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर करने वाले गुमनाम नायकों का जब जिक्र होगा, तो बिशनी देवी को जरूर याद किया जाएगा. अल्मोड़ा की रहने वालीं बिशनी देवी उत्तराखंड की पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी थीं. आजादी की लड़ाई में जेल जाने वालीं वह पहली महिला भी थीं.

Tags: Dehradun news, Uttarakhand news

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