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अब जर्मन तकनीक से दूर होगी कचरे की बदबू

अब जर्मन तकनीक से दूर होगी कचरे की बदबू

उत्तराखंड राज्य के लोगों को अब कूड़े कचरे की बदबू से शीघ्र ही निजात मिलने जा रही है. क्योंकि राज्य में कचरे से बिजली बनाने का जर्मन तकनीक पर आधारित प्लांट लगाने की तैयारी हो रही है. बिजली के रेट निर्धारित करने को लेकर उरेडा के अफसरों की कमेटी बनाई गई है. ये प्लांट रुड़की में लगाया जाएगा जिसमें करीब 550 मीट्रिक टन कचरे की प्रतिदिन खपत होगी और बिजली बनाई जाएगी.

राज्य के लोगों को अब कूड़े कचरे की बदबू से शीघ्र ही निजात मिलने जा रही है. क्योंकि राज्य सरकार कचरे से बिजली बनाने का जर्मन तकनीक पर आधारित प्लांट लगाने की तैयारी कर रही है.

यह प्लांट रुड़की में लगाया जाएगा जिसमें करीब 550 मीट्रिक टन कचरे की प्रतिदिन खपत होगी और बिजली बनाई जाएगी. सरकार की प्लानिंग के मुताबिक जर्मनी की तकनीक पर आधारित वेस्ट टू एनर्जी प्रोजेक्ट को लेकर प्लांट लगाने वाली कंपनी के प्रतिनिधियों की सिडकुल और विद्युत नियामक आयोग के साथ बैठक हो चुकी है.

प्लांट को लगाने में करीब 1700 करोड़ रुपए का खर्च आएगा जोकि सारा खर्च कंपनी ही वहन करेगी. कचरे से बनने वाली बिजली के रेट निर्धारित करने के लिए उरेडा के अफसरों की एक कमेटी गठित की गई है. वेस्ट टू एनर्जी प्लांट में रेडिये एक्टिव और न्यूक्लियर कचरे को छोड़कर बाकी सभी प्रकार का कूड़ा कचरा इस्तेमाल किया जाता है...कूड़े कचरे को प्लांट में जलाकर सिन गैस बनाई जाती है और गैस से बिजली बनाने का काम किया जाता है.

पर्यावरण और स्थानीय वातारवरण के नजरिए से काफी उपयुक्त माने जाने वाली इस तकनीक का देश में ये पहला प्लांट कहलाएगा. जिसमें करीब 550 मीट्रिक टन कचरा हर रोज़ इस्तेमाल में लाया जाएगा. ये प्लांट 25 मेगावाट की क्षमता का लगाने की योजना बनाई गई है.

सिडकुल के तहत प्रस्तावित इस वेस्ट टू एनर्जी प्लांट को हरिद्वार जिले के सभी नगरीय क्षेत्रों सहित देहरादून और मसूरी का कचरा भी सप्लाई किया जाएगा. सिडकुल के एमडी आर राजेश कुमार का कहना है कि शासन स्तर पर वेस्ट टू एनर्जी प्लांट के लिए कवायद शुरु हो गई है और यह एन्वायरमेंट फ्रेंडली प्रोजेक्ट है.

राज्य के शहरी क्षेत्रों में आबादी बढ़ने और पर्यटकों की आवाजाही से प्रतिदिन भारी मात्रा में कूड़ा-कचरा जमा होता है जिसका डिस्पोज़ल करना नगर निकायों के लिए एक बड़ी मुसीबत बन चुका है. स्थानीय निकायों के लिए सोलिड वेस्ट मैनेज़मेंट प्रोजेक्ट को अमली जामा पहनाना एक चुनौती बना हुआ है.

ऐसे में कूड़ा कचरा शहरों में लोगों की परेशानी ही बढ़ा रहा है. सिडकुल विभाग के अफसर कचरे बनने वाली बिजली के रेट निर्धारित होने का इंतेजार कर रहे हैं ताकि प्लांट का काम आगे बढ़ाया जा सके. उनका मानना है कि औपचारिकताएं पूरी होने के बाद करीब एक वर्ष में ही कूड़े करकट से बिजली बनाने का प्लाटं काम करना शुरु कर देगा.

ये प्लांट जर्मनी की तकनीक पर आधारित है और कई देशों में इससे बिजली बनाने का काम हो रहा है. कूड़े कचरे से बिजली बनाने के अलावा कई प्रकार का मैटेरियल भी प्राप्त होता है जिसको कई प्रकार से इस्तेमाल किया जा सकता है.

आबादी क्षेत्रों में कचरा जमा होने से कई तरह की परेशानियों से भी स्थानीय लोगों को अक्सर दो चार होना पड़ता है और लोग कचरे से निजात पाना चाहते हैं. ऐसे में राज्य सरकार द्वारा वेस्ट टू एनर्जी के इस प्रस्तावित प्रोजेक्ट को लोग भी उत्साहजनक सकारात्मक भरा कदम बता रहे हैं. साथ ही कचरे से कई अन्य उपयोगों के सुझाव भी देते हैं.

स्थानीय डॉक्टर ममता और स्थानीय युवक पंकज गैरोला का मानना है कि कूड़े से बिजली बनाने की अगर शुरुआत होती है तो ये कूड़ा निस्तारण में एक अहम योजना होगी. वेस्ट टू एनर्जी की एन्वायरमेंट फ्रैंडली टेक्नोलॉजी को राज्य में कूड़ा कचरा निस्तारण और उसके बिजली बनाने में उपयोग का महत्वपूर्ण माना जा रहा है. सरकार की कोशिश है कि वेस्ट टू एनर्जी प्रोजेक्ट के जरिये शहरी क्षेत्रों में बढ़ती कचरे के समस्या को कम किया जा सके.

अगर सबकुछ ठीक ठाक रहा तो शीघ्र ही रुड़की में कूड़े कचरे से बिजली बनाने के प्लांट की स्थापना का काम शुरु हो जाएगा. जिससे ना केवल रुड़की बल्कि हरिद्वार के सभी नगरीय क्षेत्र और देहरादून मसूरी सहित 16 नगरों का कूड़ा कचरा प्लांट में जाने लगेगा इससे नगरों की सड़कें भी साफ होंगी और राज्य को बिजली भी प्राप्त हो सकेगी.

Tags: Uttarakhand news, उत्तराखंड

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