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मंत्रिमंडल में गढ़वाल, कुमाऊं और मैदान में संतुलन साध पाएंगे सीएम !

मंत्रिमंडल में गढ़वाल, कुमाऊं और मैदान में संतुलन साध पाएंगे सीएम !

उत्तराखंड में मौजूदा प्रंचड बहुमत वाली बीजेपी सरकार के शपथ ग्रहण की उल्टी गिनती शुरू हो गई है. सवाल ये है कि क्या समग्र रूप से उत्तराखंड को मंत्रिमंडल में उचित प्रतिनिधित्व मिल पाएगा. क्या गढ़वाल के साथ-साथ कुमाऊं और मैदान को मंत्रिमंडल में उचित भागीदारी मिलेगी. सरकार चाहे कांग्रेस की रही या फिर बीजेपी की देहरादून, नैनीताल और पौड़ी का ही दबदबा ज्यादा रहा है.

उत्तराखंड में मौजूदा प्रंचड बहुमत वाली बीजेपी सरकार के शपथ ग्रहण की उल्टी गिनती शुरू हो गई है. सवाल ये है कि क्या समग्र रूप से उत्तराखंड को मंत्रिमंडल में उचित प्रतिनिधित्व मिल पाएगा. क्या गढ़वाल के साथ-साथ कुमाऊं और मैदान को मंत्रिमंडल में उचित भागीदारी मिलेगी. सरकार चाहे कांग्रेस की रही या फिर बीजेपी की देहरादून, नैनीताल और पौड़ी का ही दबदबा ज्यादा रहा है.

उत्तराखंड में मौजूदा प्रंचड बहुमत वाली बीजेपी सरकार के शपथ ग्रहण की उल्टी गिनती शुरू हो गई है. सवाल ये है कि क्या समग्र रूप से उत्तराखंड को मंत्रिमंडल में उचित प्रतिनिधित्व मिल पाएगा. क्या गढ़वाल के साथ-साथ कुमाऊं और मैदान को मंत्रिमंडल में उचित भागीदारी मिलेगी. सरकार चाहे कांग्रेस की रही या फिर बीजेपी की देहरादून, नैनीताल और पौड़ी का ही दबदबा ज्यादा रहा है.

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    उत्तराखंड में मौजूदा प्रंचड बहुमत वाली बीजेपी सरकार के शपथ ग्रहण की उल्टी गिनती शुरू हो गई है. सवाल ये है कि क्या समग्र रूप से उत्तराखंड को मंत्रिमंडल में उचित प्रतिनिधित्व मिल पाएगा. क्या गढ़वाल के साथ-साथ कुमाऊं और मैदान को मंत्रिमंडल में उचित भागीदारी मिलेगी. सरकार चाहे कांग्रेस की रही या फिर बीजेपी की देहरादून, नैनीताल और पौड़ी का ही दबदबा ज्यादा रहा है.

    इस बार 70 सदस्यीय उत्तराखंड विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी को 57 सीटें मिली हैं. अटल के बनाए उत्तराखंड को संवारने के वादे पर उसको हर जिले में ही नहीं बल्कि राज्यव्यापी प्रचंड समर्थन मिला है. मुख्यमंत्री चयन से इतर सबकी नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या नई सरकार में समग्र उत्तराखंड को उचित

    प्रतिनिधित्व मिल पाएगा. ये सवाल इसलिए उठ रहा है. क्योंकि पिछले दो चुनावों के बाद स्पष्ट बहुमत के अभाव में निर्दलीय और अन्य दलों के समर्थन से कांग्रेस और बीजेपी की सरकारें गठित हुईं थी, जिनमें समर्थन देने वाले विधायकों की तो चांदी कटी, लेकिन कई जिलों को कैबनिट में रिप्रजेंटेशन हीं नहीं मिल पाया. गठबंधन सरकार की बात छोड़िए स्पष्ट बहुमत वाली नारायण दत्त तिवारी सरकार में भी भारी क्षेत्रीय अंसतुलन रहा था.

    पहली विधानसभा के कार्यकाल में 36 सीटों के साथ नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व में कांग्रस की सरकार बनीं, जिनके पूरे कार्यकाल के दौरान पिथौरागढ, चमोली, रूद्रप्रयाग, उत्तरकाशी और हरिद्वार से एक भी मंत्री नहीं बना जबकि मंत्रिमंडल में देहरादून, नैनीताल और पौडी जिलों का दबदबा रहा.

    साल 2007 यानि दूसरी विधानसभा के कार्यकाल में पहले भुवन चंद्र खंडूरी और फिर रमेश पोखरियाल निशंक के नेतृत्व में निर्दलीय और यूकेडी के समर्थन से बीजेपी की सरकार बनी जिसमें उत्तरकाशी और उधमसिंहनगर जिले पूरी तरह नदारद रहे.

    2012 में हुए तीसरे चुनाव के बाद पहले विजय बहुगुणा और फिर हरीश रावत के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी, जिसमें पिथौरागढ, बागेश्वर, चंपावत, उत्तरकाशी जिलों से एक भी मंत्री नहीं बन पाया, जबकि अकेले देहरादून से 3 और नैनीताल जिले से भी 3 मंत्री रहे.

    वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत का कहना है कि ये कड़वी सच्चाई है, लेकिन नई सरकार को क्षेत्रीय संतुलन के साथ काबिलीयत का भी ख्याल रखना होगा. लिहाजा अब सबकी नजरें मोदी लहर में प्रचंड बहुमत के साथ बनने जा रही बीजेपी सरकार पर हैं.

    Tags: Uttarakhand news

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