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अंबरीश कुमार: इनके बिना हरिद्वार के चुनावी मैदान में कभी नहीं टिक पाई कांग्रेस

अंबरीश कुमार हरिद्वार में कांग्रेस टिकट पर मैदान में हैं.

अंबरीश कुमार हरिद्वार में कांग्रेस टिकट पर मैदान में हैं.

हरिद्वार में उनकी राजनीतिक ज़मीन के कितनी मजबूत रही है यह इससे पता चलता है कि आठ में से 6 चुनावों में दूसरे नंबर पर रहे.

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यूपी में मंत्री रहे, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री और मौजूदा सांसद रमेश पोखरियाल निशंक को चुनौती देने वाले कांग्रेसी नेता अंबरीश 50 साल से राजनीति में सक्रिय हैं. लेकिन इस मंझे हुए राजनेता के बारे में लोग हाल ही में राजनीति में उतरे दूसरे कांग्रेसी मनीष खंडूड़ी से भी कम जानते हैं. सत्तर साल से ज़्यादा उम्र के अंबरीश आठ बार चुनाव लड़ चुके हैं. अगर कांग्रेस ने चार बार उनका टिकट न काटा होता तो यह आंकड़ा और बड़ा होता. लेकिन आठ बार में वह जीते हैं सिर्फ एक बार. हरिद्वार में उनकी राजनीतिक ज़मीन कितनी मजबूत रही है, यह इससे पता चलता है कि आठ में से 6 चुनावों में दूसरे नंबर पर रहे. कांग्रेस से शुरू हुआ उनका राजनीतिक सफ़र जनता दल और समाजवादी पार्टी होते हुए फिर से कांग्रेस में उन्हें ले आया है. हरीश रावत के बाद वह उत्तराखंड कांग्रेस के ऐसे दूसरे नेता हैं जिन्होंने इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और राहुल गांधी तीनों के नेतृत्व में चुनाव लड़ा है.

हरिद्वार के अच्छे कपड़ा व्यापारी परिवार में जन्मे अंबरीश कुमार ने 1971 में तभी कांग्रेस जॉइन किया था जब पूरे देश में इंदिरा गांधी से प्रभावित होकर नौजवानों ने कांग्रेस का हाथ थामा था. सालभर के भीतर ही 1972 में वे हरिद्वार के यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष बने. कांग्रेस के प्रति झुकाव उन्हें परिवार से विरासत में मिला था. अंबरीश बताते हैं कि उनके चाचा ओमप्रकाश स्वतंत्रता सेनानी और महात्मा गांधी के बेटे प्रभुलाल गांधी के बेहद करीबी थे लेकिन अंबरीश को राजनीति की असली शिक्षा मिली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता राजेन्द्र कुमार गर्ग से.

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गर्ग कांग्रेस के समर्थन 1974 का यूपी विधानसभा का चुनाव हरिद्वार से लड़े थे. गर्ग ही वे शख्स थे जिनके जरिए अंबरीश दिल्ली में बड़े कांग्रेसी नेताओं के सम्पर्क में आ सके. अंबरीश याद करते हैं कि इमरजेन्सी के बाद 1977 में जब इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की हार हुई तो इसके बाद इंदिरा की पहली रैली उन्होंने ही हरिद्वार में मैनेज की थी. तब इंदिरा गांधी ने उन जैसे चार-पांच युवा नेताओं से लगभग आधे घण्टे अकेले में बात की थी. तब उन्होंने कहा था कि विरोधी सिर्फ इंदिरा गांधी को हटाने का षडयंत्र रच रहे हैं. इसी बातचीत में इंदिरा ने कहा था कि जनता पार्टी के नेता एण्टी नेशनल रहे हैं. इसी बातचीत का असर रहा कि जनता पार्टी की सरकार के दौरान वह कई बार गिरफ्तार भी हुए.

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अंबरीश कुमार हरिद्वार के चुनाव को स्थानीय बनाम बाहरी बनाने की कोशिश की है.


1970 से 1980 तक संघर्ष करने के बाद अंबरीश के मन में भी चुनाव लड़ने की इच्छा हिलोरें मारने लगीं. 1980 में यूपी में विधानसभा के चुनाव होने थे और अंबरीश ने हरिद्वार से कांग्रेस के टिकट पर दावेदारी ठोक दी. उन्हें मुंह की खानी पड़ी और टिकट ले उड़े राम यश सिंह. तब इंदिरा गांधी के करीबी रे यशपाल कपूर ने अंबरीश का टिकट काट दिया. वह खून का घूंट पीकर रह गये. फिर आया 1985. अंबरीश ने फिर दावेदारी की लेकिन फिर टिकट नहीं मिला. इस बार वीपी सिंह ने कास्ट कॉम्बिनेशन का हवाला देते हुए उनका टिकट काट दिया.

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अंबरीश आपे से बाहर हो गए. उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और इसी चुनाव में बागी के तौर पर निर्दलीय पर्चा भर दिया. किस्मत देखिए कि वे कांग्रेस कैण्डिडेट से 71 वोट से हार गए. अंबरीश कहते हैं कि मतगणना में कांग्रेस ने बेईमानी कराई थी. 2000 से ज्यादा वोटों को अवैध करार दे दिया गया था. खैर 1985 के चुनाव में उन्होंने अपनी ताकत का प्रदर्शन कर दिया था.

अंबरीश की हरिद्वार में राजनीतिक हैसियत देखकर कांग्रेसी नेताओं के काम खड़े हो गए थे. दो साल बाद ही 1987 में हरिद्वार में उप चुनाव होना था. तब यूपी के सीएम रहे वीर बहादुर सिंह ने अंबरीश को खास तौर पर मिलने के लिए बुलाया और चुनाव में कांग्रेस की मदद करने के लिए कहा. अंबरीश मान गए और कांग्रेस ज्वाइन कर कांग्रेस उम्मीद्वार राम सिंह की मदद की. उन्हें दिल्ली में राजीव गांधी ने पार्टी ज्वाइन कराया था.

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दो साल बाद फिर अंबरीश की परीक्षा की घड़ी आ गई. 1989 में यूपी के विधानसभा के चुनाव में अंबरीश को फिर कांग्रेस ने गच्चा दे दिया. इस बार यूपी के सीएम रह चुके कमलापति त्रिपाठी के बेटे लोकपति त्रिपाठी ने अंबरीश का टिकट काटकर पारस जैन को टिकट दे दिया. हताश अंबरीश ने फिर कांग्रेस छोड़ दी. इसी साल उन्होंने जनता दल ज्वाइन किया जिसका जन्म जनता पार्टी के टूटे हुए नेताओं के साथ आने से हुआ था.

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अंबरीश कुमार


1991 और 93 का विधानसभा चुनाव उन्होंने हरिद्वार से जनता दल के टिकट पर लड़ा लेकिन जीत नहीं पाए. दोनों बार वे दूसरे नम्बर पर रहे. आखिरकार जनता दल में एक और टूट हुई और अंबरीश मुलायम सिंह के साथ समाजवादी पार्टी में आ गए. अंबरीश 1996 का विधानसभा चुनाव सपा के टिकट पर लड़े और पहली बार उन्हें विधायक बनने का सौभाग्य मिला. 64 हजार वोट पाकर उन्होंने भाजपा के मुनि जगदीश को हराया. कांग्रेस की तो इस चुनाव में हवा ही खराब हो गई थी.

विधायक बनने के बाद अंबरीश की दूसरी परीक्षा शुरु हो गई. चार साल बाद ही उत्तराखण्ड अलग राज्य बन गया. राज्य आंदोलन के समय समाजवादी पार्टी सरकार की भूमिका किसी से छुपी नहीं है. लिहाज़ा पार्टी के साथ साथ अंबरीश भी हाशिये पर चले गए. 2002 में उत्तराखण्ड में पहला चुनाव हुआ. अंबरीश कुमार दो सीटों लालढांग और हरिद्वार से लड़े और दोनों जगहों से बुरी तरह हारे.

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हरिद्वार और लालढ़ांग से तो उन्हें इतने भी वोट नहीं मिले जितने मार्जिन से वह 1996 का चुनाव जीते थे. दोनों सीटों पर वह चौथे नम्बर पर रहे. बुरी हार और पार्टी की उत्तराखण्ड विरोधी छवि के बावजूद उन्होंने सपा नहीं छोड़ी और 2007 का अगला उत्तराखण्ड विधानसभा का चुनाव भी उन्होंने साइकिल के निशान पर ही लड़ा. जनाधार देखिए कि वह दूसरे नम्बर पर रहे. इस चुनाव में भी उन्हें कांग्रेस से ज्यादा ही वोट मिले.

अंबरीश बताते हैं कि चुनाव से ऐन पहले 2006 में सपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हरिद्वार में हुई थी. रमज़ान का महीना चल रहा था. पार्टी ने वीआईपी घाट पर इफ्तार पार्टी दी थी. इसी को आधार बनाकर दूसरी पार्टियों ने पूरे चुनाव का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कर दिया था.

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अंबरीश कुमार


आखिरकार अंबरीश ने सपा छोड़ दी. वह कहते हैं कि हरीश रावत ने 2012 में उन्हें मनाकर कांग्रेस जॉयन करवाया लेकिन उन्हीं का टिकट काट दिया. अंबरीश फिर बागी हो गए और इस बार रानीपुर से निर्दलीय चुनाव लड़े. 20 हजार वोट पाकर वह दूसरे नम्बर पर रहे. भले ही अंबरीश चुनाव लड़ते और हारते रहे लेकिन यह सच्चाई है कि न तो कांग्रेस और न ही अंबरीश को एक दूसरे के बिना चैन मिला. लिहाज़ा अंबरीश ने 2017 से पहले फिर कांग्रेस जॉयन कर ली. वह रानीपुर से चुनाव लड़े लेकिन, फिर हार गए.

इतना तो तय है कि हरिद्वार में कांग्रेस का ग्राफ तभी ऊपर रहा जब उसका झण्डा अंबरीश के हाथों में रहा. अंबरीश ने जब जब कांग्रेस से अलग होकर चुनाव लड़ा पार्टी की बुरी पराजय हुई. इसी को देखते हुए इस बार के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी की टीम ने उन्हें हरिद्वार से उम्मीद्वार बनाया. जिस कांग्रेस ने उनका चार बार टिकट काटा उसी पार्टी ने इस बार दौड़कर उन्हें टिकट दिया. अंबरीश कहते हैं कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस एक बदली हुई पार्टी लगती है.

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राजनीति में उन्हें कितना मिला कितना छूट गया यह तो अलग बात है लेकिन, उनके मन में एक टीस हमेशा बनी रहती है कि वह फौज की नौकरी नहीं कर पाए. 1964 से लेकर 1970 तक अंबरीश ने फौज में जाने की जीतोड़ मेहनत की थी लेकिन, उनका ये सपना अधूरा रह गया. बचपन के दिनों के बारे में वह बताते हैं कि कुछ दिनों के लिए उन्होंने अपने परिवार की कपड़े की दुकान भी संभाली थी. अंबरीश दावा करते हैं कि उनकी आय का एक मात्र स्रोत विधायक रहने के एवज में मिलने वाली पेंशन है. उनकी पूरी पढ़ाई हरिद्वार से हुई लेकिन, एलएलबी करने के लिए वह देहरादून के डीएवी कॉलेज आया करते थे. उनकी एक बेटी हैं जो अमेरिका के सिएटल में सेटेल हैं.

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