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इतना आसान नहीं होता पूरी सभ्यता को डुबोकर, नई दुनिया बसाना

Sunil Navprabhat | News18India
Updated: September 26, 2017, 4:46 PM IST
इतना आसान नहीं होता पूरी सभ्यता को डुबोकर, नई दुनिया बसाना
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  • Last Updated: September 26, 2017, 4:46 PM IST
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भारत नेपाल सीमा पर काली नदी पर प्रस्तावित पंचेश्वर बांध को लेकर न सिर्फ स्थानीय लोग बल्कि पर्यावरणविद और वैज्ञानिक भी आशंकित हैं. सिविल सोसायटी समेत इन तमाम लोगों का कहना है कि दुनिया का दूसरे नंबर का यह सबसे बड़ा बांध भू-गर्भीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील उत्तराखंड के लिए खतरनाक साबित होगा.

5040 मेगावाट क्षमता की इस जलविद्युत परियोजना की झील उत्तराखंड के तीन जिलों पिथौरागढ़, चम्पावत और अल्मोड़ा के क्षेत्र में बनेगी.

करीब 230 किमी लम्बी महाकाली नदी पर बनने वाले पंचेश्वर बांध से कुल 134 गांवों का विस्थापन होगा, जिसमें  पिथौरागढ़ के 87 , चम्पावत के 26 और अल्मोड़ा के 21 गांवों के करीब 29,436 परिवार शामिल हैं.

लोगों का कहना है कि एशिया के सबसे बड़े टिहरी बांध बनने के एक दशक बाद भी बांध के जलाशय के कारण पूरे क्षेत्र में भू-स्खलन की समस्या लगातार गहराती जा रही है. आज भी एक के बाद एक परिवार विस्थापन के लिए भटक रहे हैं. लोगों को आशंका है कि अब विश्व का दूसरा बड़ा बांध बनाए जाने से हज़ारों-हज़ार लोगों को एक बार फिर परेशानी का सामना करना पड़ेगा.

स्थानीय लोगों समेत सिविल सोसायटी का कहना है कि हजारों-हजार लोगों को विस्थापित करने का निर्णय लेने से पहले सही तरीके से जनसुनवाई होनी चाहिए. भू-गर्भीय द़ष्टि से जोन-4 और 5 के इस क्षेत्र में इतना बड़ा कदम उठाने से पहले उसका वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाना जरूरी है.

दूसरी ओर, सरकार का दावा है कि ये एक बहुद्देशीय परियोजना है. प्रदेश को इससे बिजली मिलेगी, बाढ़ पर नियंत्रण होगा और सिंचाई पानी की उपलब्धता के साथ ही रोजगार के अवसर भी प्राप्त होंगे.

लेकिन बांध बनने के प्रभाव क्या होंगे, इनका निदान कैसे होगा, इसका रिपोर्ट में कहीं जिक्र नहीं है. एक पूरी सभ्यता, संस्कृति, विरासत को डुबोकर नई जगह पर नए सिरे से जिंदगी शुरू करना इतना आसान भी नहीं. 

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First published: September 26, 2017, 4:46 PM IST
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