लॉकडाउन ने बांधे पिता के पांव, नहीं शरीक हो सके बेटी की शादी में, वीडियो लाइव से किया संतोष
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लॉकडाउन ने बांधे पिता के पांव, नहीं शरीक हो सके बेटी की शादी में, वीडियो लाइव से किया संतोष
हवलदार विजय राम सिंह परमार की बेटी अनामिका की शादी धर्मेंद्र से संपन्‍न हो गई.

18 साल पहले हवलदार विजय राम सिंह (Havildar Vijay Ram Singh) अपनी बेटी के जन्म के समय भी घर पर मौजूद नहीं थे, उस समय वह मणिपुर में तैनात थे. तब अपनी बेटी की पहली झलक पाने के लिए उन्हें आठ महीने इंतजार करना पड़ा था.

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उत्‍तरकाशी. असम राइफल्स (Assam Rifles) की अगरतला यूनिट (Agartala Unit) में तैनात हवलदार विजय राम सिंह परमार की निगाहें उनके मोबाइल की स्क्रीन पर थीं. मोबाइल स्क्रीन पर बदलते रंगों के साथ उनके चेहरे के भाव भी लगातार बदल रहे थे. कभी चेहरे पर मुस्कान आ जाती, तो अगले ही पल उदासी मन को घेर लेती. कभी आंखें भर आतीं तो बाजू से आंखों को पोंछकर फिर मुस्कुराने लग जाते. तभी बगल से एक आवाज आती है, ‘क्या हुआ विजय राम, सब ठीक है न, क्या देख रहा है मोबाइल पर.’ विजय राम सिंह ने पलट कर देखा, हल्का सा मुस्कुराये और कहा– 'कुछ नहीं भाई, आज बड़ी बेटी अनामिका की शादी है, वही वीडियो कॉल पर देख रहा हूं.' दरअसल, लॉकडाउन (Lockdown) की वजह से हवलदार विजय रामसिंह परमार चाहकर भी अपनी लाडली बेटी की शादी में शामिल नहीं हो पाए.

जन्म के समय भी ड्यूटी पर ही थे विजय राम
इतना कह कर विजय राम एक बार फिर मोबाइल की स्क्रीन निहारने लगे. बेटी की शादी लाइव देखते हुए विजय राम को 2 फरवरी 2002 की तारीख याद आ रही थी. घर पर गर्भवती पत्नी को छोड़ उन दिनों वे मणिपुर में तैनात थे. इसी दिन घर से भाई ने फोन कर बताया था - लक्ष्मी आई है लक्ष्मी. यह सुनकर विजय की खुशी सातवें आसमान पर थी. उस समय न मोबाइल था न इंटरनेट. बेटी को देखने की चाहत में 8 महीने का वक्त गुजर गया. इसके बाद जब छुट्टी मिली, तो घर आकर बेटी को देखने की ख्वाहिश पूरी हुई. प्यार से उसका नाम अनामिका रखा.

फर्ज आगे, जज्बात पीछे
समय-साल गुजरने के साथ ही अनामिका बड़ी होती गई. विजय राम बेटी को देख हमेशा यही सोचते कि एक दिन वह घर से विदा हो जाएगी. इसके लिए ख्वाब बुनते. उसकी शादी के लिए विजय राम के मन में कई अरमान थे. लेकिन आज जब बेटी की शादी का वक्त था, तो एक बार फिर फर्ज के आगे जज्बात पीछे रह गए. हवलदार विजय राम अपनी लाडली बेटी की शादी में शामिल नहीं हो पाए.



अरमान पूरा न होने से मायूसी
हवलदार विजय रामसिंह परमार ने बेटी की शादी में न जाने पर अफसोस जताते हुए कहा कि मैं उससे इतनी दूर हूं कि गले लगाकर रो भी नहीं सकता था. दिल में गिला इस बात का भी था कि जब वह पैदा हुई, तब भी वह उसके साथ नहीं थे और जब वह घर से विदा हो रही है, तब भी उसके पास नहीं हूं. विजय राम सिंह परमार ने बेटी की शादी चिन्यालीसौड़ के धर्मेंद्र से तय की थी. शादी की तारीख बहुत सोच-समझ कर अप्रैल में तय की गई थी, ताकि आसानी से छुट्टी मिल जाएगी. सब कुछ ठीक था, छुट्टी भी मिल गई थी और घर जाने के लिए 6 अप्रैल का टिकट भी बुक हो गया था, लेकिन इससे पहले ही कोरोना वायरस (Coronavirus) की रोकथाम को लेकर देश में लॉकडाउन हो गया. अब निगाहें 14 अप्रैल पर थीं, जिस दिन लॉकडाउन खत्म होना था. विजय ने सोचा कि फ्लाइट से पहुंच जाएंगे, लेकिन 14 को जब दोबारा लॉकडाउन बढ़ाने का ऐलान किया गया, तो वह मायूस हो गए.

शादी की तारीख के आड़े आई परंपरा
लॉकडाउन की अवधि बढ़ाए जाने के बाद विजय राम सिंह परमार के सामने अब घर जाने का कोई जरिया नहीं बचा था. कुछ लोगों ने सलाह दी कि शादी की तारीख बढ़वा दो. लेकिन इसमें उत्तराखंड की परंपरा आड़े आ गई. कहा जाता है कि पहाड़ में शादी की तारीख बदलने को बुरा माना जाता है. आखिरकार तय हुआ कि अनामिका की शादी तय तारीख पर ही होगी. विजय के भाई रघु परमार ने डीएम से शादी की सशर्त इजाजत ली. प्रशासन ने 10 लोगों की मौजूदगी में शादी की इजाजत दे दी. चिन्यालीसौड़ के धर्मेंद्र अपने पांच परिजनों के साथ अनामिका के घर पहुंचे. जहां बेहद सादगी से दोनों की शादी हुई और विजय राम की बेटी अनामिका को धर्मेंद्र अपनी अर्धांगिनी बनाकर अपने घर ले गए.

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