पौड़ी: कांग्रेसी उम्मीदवार को पिता का आशीर्वाद तो है, लेकिन पिता खुद बीजेपी में हैं

News18Hindi
Updated: May 15, 2019, 2:31 PM IST
पौड़ी: कांग्रेसी उम्मीदवार को पिता का आशीर्वाद तो है, लेकिन पिता खुद बीजेपी में हैं
मनीष खंडूड़ी

पौड़ी गढ़वाल देश की एक ऐसी सीट बन गई है, जहां धर्मयुद्ध चल रहा है. पिता भीष्म जैसी स्थिति में हैं.

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पौड़ी गढ़वाल देश की एक ऐसी सीट बन गई है, जहां धर्मयुद्ध चल रहा है. पिता भीष्म जैसी स्थिति में हैं. मतलब हैं तो बीजेपी में लेकिन आशीर्वाद विरोधी पार्टी के उम्मीदवार को दे रहे हैं. जी यही सीट है जिसे बीजेपी के भुवन चंद खंडूड़ी की सीट के तौर पर जाना जाता था. उनके बेटे मनीष खंडूड़ी इस सीट की विरासत के लिए लड़ तो रहे हैं लेकिन कांग्रेस पार्टी से. दो बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री और बीजेपी से इस लोक सभा में सांसद खंडूडी के एक राजनीतिक शिष्य तीरथ सिंह रावत बीजेपी से मैदान में हैं.

ग्रामीण मतदाताओं की अहमियत

गढ़वाल के नाम से मशहूर इस सीट का विस्तार काफी लंबा चौड़ा है. भारत के आखिरी गांव माणा से लेकर रामनगर यानी जिम कार्बेट के गेट तक फैले इस सीट पर 1269083 मतदाता हैं. इसमें 84 प्रतिशत शहरी और 16 प्रतिशत ग्रामीण मतदाता हैं. अगर जातिगत समीकरणों की बात की जाय तो यहां पर अनुसूचित जाति के लोगों की संख्या 18.7 फीसदी है, जबकि अनुसूचित जनजाति की आबादी 1.1 प्रतिशत है.
5 जिलों वाली इस सीट में तीन पर्वतीय जिले पौड़ी, चमोली और रुद्रप्रयाग के अलावा टिहरी के दो विधानसभा क्षेत्र देवप्रयाग और नरेंद्रनगर हैं जबकि नैनीताल जिले का रामनगर क्षेत्र भी इसी सीट में आता है.

नरेंद्र नगर को छोड़ दिया जाए तो बाकी इलाके पर्यटन के लिहाजा से अहम है. बदरीनाथ और केदारनाथ भी इसी लोकसभा सीट के तहत आता है. फिर भी यहां के मतदाता क्षेत्र का विकास न होने पर नाराजगी जताते रहे हैं. हालांकि शहरी क्षेत्र में खंडूडी के कार्यकाल में कुछ काम जरूर हुआ है.

केदारनाथ मंदिर


सीट का विस्तार भी चुनौती
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इस फैले हुई सीट पर हर जगह पहुंच पाना ही प्रत्याशियों के लिए एक बड़ी चुनौती होती है. हालांकि सेना से रिटायर भुवन चंद्र खंडूडी का क्षेत्र में अच्छा असर रहा है. चूंकि बीजेपी और कांग्रेस दोनों बड़ी पार्टियों के प्रत्याशी खंडूडी के लिए प्रचार करते ही रहे हैं लिहाजा ये नहीं कहा जा सकता कि मतदाताओं के बीच किसकी कितनी पहचान और पहुंच है.

पूर्व सैनिकों का बोलबाला

इस सीट पर पूर्व सैनिकों की संख्या अच्छी खासी है. इस कारण वे हमेशा निर्णायक भूमिका में रहते हैं. वोट देने से ज्यादा उम्मीदवारों के बारे में राय बनाने में उनकी भूमिका बहुत अहम होती है. इस लिहाज से माना जा रहा था कि इस सीट पर सीमा पर होने वाली हरकतों का सीधा असर पड़ता है. इस लिहाज से सर्जिकल स्टाइक से लेकर पुलवामा तक हर घटना चुनावी मुद्दा रही है.

2014 के चुनाव नतीजे

2014 में इस सीट से उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूडी ने शानदार जीत हासिल की. खंडूडी ने अपने निकटत्तम प्रतिद्वन्दी कांग्रेस के हरक सिंह रावत को 1 लाख 84 हजार 526 वोटों से हराया. खंडूरी को चार लाख 5 हजार 690 वोट मिले जबकि हरक सिंह रावत को 2 लाख 21 हजार 164 वोट मिले. 2014 के आम चुनाव में यहां 53.74 फीसदी वोटिंग हुई थी.

भुवन चंद्र खंडूड़ी


कांग्रेस-बीजेपी में सीधी लड़ाई

वैसे तो इस सीट पर कुल नौ प्रत्याशी मैदान में हैं. इसमें कांग्रेस-बीजेपी के अलावा उत्तराखंड क्रांति दल डेमोक्रेटिक से धीरेंद्र पाल सिंह, सोसलिस्ट यूनिटी सेंटर ऑफ इंडिया कम्यूनिस्ट से डॉ. मुकेश, उत्तराखंड क्रांत दल से शांति प्रसाद भट्ट के लड़ रहे हैं. इसके अलावा चार निर्दल उम्मीदवार भी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं. फिर भी मुख्य लड़ाई बीजेपी और कांग्रेस के बीच ही मानी जा रही है. कांग्रेस उम्मीदवार के पास ये कहने के लिए हैं – “मेरे पास पिता जी का आशीर्वाद है.” लेकिन आशीर्वाद का ये संदेश जनरल खंडूडी की ओर से मतदाताओं तक ठीक ठीक पहुंचा है इसे पुख्ता तौर पर नहीं कहा जा सकता. जबकि बीजेपी प्रत्याशी के पास कहने को तो है कि उसके साथ पार्टी का पूरा अमला जमला है, लेकिन पार्टी का वही अमला कुछ समय पहले तक खंडूडी के लिए काम कर रहा था.

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First published: May 15, 2019, 2:31 PM IST
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