ना बिजली, ना पानी और ना ही सड़क, विकास को तरसे उत्तराखंड के ये गांव

Photo: Pradesh18.com
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विकास का पैमाना गांव से शुरू होता है लेकिन उत्तराखंड में शहरीकरण गांव के विकास पर भारी पड़ता दिख रहा है. राजधानी देहरादून से मात्र 70 किलोमीटर दूर टिहरी गढ़वाल की दोगी पट्टी के कई गांव विकास से कोसों दूर है.

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विकास का पैमाना गांव से शुरू होता है लेकिन उत्तराखंड में शहरीकरण गांव के विकास पर भारी पड़ता दिख रहा है. राजधानी देहरादून से मात्र 70 किलोमीटर दूर टिहरी गढ़वाल की दोगी पट्टी के कई गांव विकास से कोसों दूर है.

वैसे तो टिहरी गढ़वाल के नरेन्द्रनगर तहसील की दोगी पट्टी के 18 गांवों में आबादी 20 हजार है. आजादी के 70 सालों बाद भी दोगी पट्टी के इन गांवों में आज भी न बिजली पहुंची है न पानी न ही सड़क.

इलाके में तेली, गबल गांव, कनेती, मनज्याडी समेत कई गांव आज भी सड़क से कोसों दूर हैं. डूबलीयाणा, सालब और माथी सालब समेत कई गांव अंधेरे में हैं, जहां बिजली नहीं पहुच पाई हैं.



अब इसे अधिकारियों की नाकामी ही कहेंगे कि दोगी पट्टी की महिलाओं को 10-10 किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता है. टिहरी जिले के अधिकारी और जनप्रतिनिधि दोगी पट्टी की जनता को भूल गए हैं.
आजादी से पहले भी इस क्षेत्र को अंधेरी दोगी कहा जाता था और आज भी इस क्षेत्र को अन्य जगहों के लोग इसी नाम से जानते हैं. राजधानी देहरादून और तीर्थनगरी ऋषिकेश के करीब होने के बावजूद वर्षों से हो रही अपनी उपेक्षा से ग्रामीण बेहद खफा हैं.

ग्राम प्रधान धूपाणि देवी, ग्रामीण केवल सिंह, तीरथ सिंह का कहना है कि आज भी दोगी पट्टी में महिलाओं को पानी लेने 10-10 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है. गांव से सड़क तक पहुंचने के लिए 10 किलोमीटर पैदल सफर करना पड़ता है.

दोगी पट्टी में सबसे बुरा हाल तो स्वास्थ्य और शिक्षा का है क्षेत्र में लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं के लिए कई किमी पैदल चलकर ऋषिकेश आना पड़ता है. ऐसे में बीमार लोगों को चारपाई में ले जाना पड़ता है. इससे कई लोगों की रास्ते में ही मौत हो जाती है.

ग्रामीण सोबन सिंह कहते हैं कि वर्ष 2016 में 11 लोगों ने अस्पताल ले जाते समय पैदल रास्ते में दम तोड़ दिया था.

यही हाल शिक्षा का भी है क्षेत्र में सरकार ने स्कूल तो खोले है पर उनमें न ही बिजली है न पानी, न शिक्षक और न ही चैकीदार. बैठने को दरी तक स्कूलों में नहीं हैं. ऐसे में मीलों दूर से पढ़ने के लिए स्कूल आने वाले बच्चों को पढाई कम स्कूल की नौकरी ज्यादा करनी पड़ती है.

उत्तराखंड क्रांति के नेता और स्थानीय निवासी सरदार पुण्डीर का कहना है कि इण्टर कॉलेजों में शिक्षक तो दूर चैकीदार तक नहीं है. बिजली और पानी नहीं है.

ऐसे में बच्चे कई किलोमीटर दूर से स्कूल में पानी तक लाते हैं. बच्चे स्कूलों में पढ़ते कम हैं और स्कूल की चैकीदारी ज्यादा कर रहे हैं. ऐसे में साफ लगता है कि दोगी पट्टी के 20 हजार ग्रामीण को टिहरी जिले के अधिकारी भूल गए हैं.

ये हाल उस दोगी पट्टी के गांव का हैं जो देहरादून के बेहद करीब हैं. ऐसे में सीमांत क्षेत्रों के गांव के क्या हाल होंगे. डर यही हैं कि वर्षों बाद भी मुलभूत सुविधावों से महरूम ग्रामीणों के पास पलायन के सिवा कोई चारा नहीं बचा हैं. ऐसे में कहीं गांव वीरान न हो जाएं.
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