मां की चिता करती रही लॉक डाउन में फंसे बेटों का इंतजार, आखिरकार रिश्‍तेदारों को देनी पड़ी मुखाग्नि
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मां की चिता करती रही लॉक डाउन में फंसे बेटों का इंतजार, आखिरकार रिश्‍तेदारों को देनी पड़ी मुखाग्नि
वासुदेव के आंसुओं के सामने झुकने को मजबूर हुआ नेपाल प्रशासन.

मां के निधन (Death of Mother) की सूचना मिलने के बाद, उन्होंने नेपाल (Nepal) भेजे जाने की कई बार फरियाद की. लेकिन उनकी फरियाद का कोई नतीजा नही निकला.

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पिथौरागढ़. नेपाल बॉर्डर (Nepal Border) से सटे पिथौरागढ़ जिले में लॉकडाउन (Lockdown) के बाद डेढ़ हजार से अधिक नेपाली नागरिक फंसे हैं. लाख कोशिशों के बाद भी फंसे नेपालियों की स्वदेश वापसी नही हो पाई है. लेकिन वासुदेव भट्ट के आंसुओ के आगे आखिरकार दोनों मुल्कों को झुकना पड़ा. असल में वासुदेव बीते 20 दिनों से नेपाल से सटे भारतीय सीमा पर मौजूद बलुआकोट राहत शिविर में रुके थे.

14 अप्रैल को उन्हें मां का निधन होने की सूचना मिली. उनकी मां का निधन नेपाल के दार्चुला में हुआ था. मां के निधन की सूचना मिलने के बाद, उन्होंने नेपाल भेजे जाने की कई बार फरियाद की. लेकिन उनकी फरियाद का कोई नतीजा नही निकला. वासुदेव के साथ भारतीय शिविर में उनके 2 भाई भी थे. जिस कारण, मां गोमती देवी की चिता को आग बेटों से नही मिल पाई. आखिरकार परिजनों ने ही गोमती की चिता को आग दी. लेकिन इस घटना के बाद वासुदेव इस कदर दुखी हो गए कि उनके आंसू थमने का नाम नही ले रहे थे.



वासुदेव की हालत को देख एसडीएम धारचूला अनिल शुक्ला ने उन्हें नेपाल भेजने की कोशिश शुरू की. एसडीएम शुक्ला ने इस मामले को लेकर नेपाल के अधिकारियों के साथ तो वार्ता की ही, साथ ही SSB और पिथौरागढ़ के डीएम को भी मामले से रूबरू कराया. आखिरकार 5 दिनों तक चली कवायद के बाद दोनों मुल्कों के अधिकारी इस बात पर राजी हुए कि सिर्फ वासुदेव को नेपाल भेजा जाएगा.



वासुदेव को नेपाल भेजने के लिए दोनों मुल्कों ने कुछ पल के  लिए अंतरराष्ट्रीय बलुआकोट झूला पुल खोला. नेपाल वापसी नही हो पाने के कारण वासुदेव ने बलुआकोट राहत शिविर में ही क्रिया-कर्म करना भी शुरू कर दिया था. एसडीएम धारचूला अनिल शुक्ला का कहना है कि दो मुल्कों का मामला होने के कारण वासुदेव को नेपाल भेजने में समय लगा. इस प्रक्रिया में नेपाल के अधिकारियों के साथ ही भारत के शीर्ष अधिकारियों की अनुमति जरूरी थी.

 

 

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