नैनीताल आने से पहले जान लें यहां का इतिहास, कैसे और कब दुनिया के सामने आया यह शहर

नैनीताल से करीब 18 किलोमीटर दूर भीमताल झील है. (फाइल फोटो)
नैनीताल से करीब 18 किलोमीटर दूर भीमताल झील है. (फाइल फोटो)

नैनीताल से करीब 18 किलोमीटर दूर भीमताल झील है. नैनीताल से यहां पहुंचना आसान है. टैक्सी से भीमताल जाने के बाद नौकुचियाताल व सातताल (Naukuchiatal And Satatal) की भी यात्रा की जा सकती है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 17, 2020, 8:16 PM IST
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नैनीताल. सरोवर नगरी नैनीताल (Nainital) देश ही नहीं पूरी दुनियां का पसंदीता टूरिस्ट प्लेस (Tourist Place) है. यहां लोग घूमने फिरने के साथ हनीमून मनाने के लिये आते हैं. यहां का मौसम सबसे ज्यादा गर्मियों के दौरान सैलानियों को भाता है. नैनीताल की खूबसूरती और ठंडी आबोहवा की वजह से सैलानी अपने आप यहां खींचे चले आते हैं. कहा जाता है कि नैनीताल में स्वर्ग जैसा अहसास होता है. हालांकि, एक दौर में नैनीताल के आसपास 60 से अधिक झीलें थीं और इस शहर को छकाता (Chhakta) के नाम जाना जाता था. इसे 60 तालों का शहर भी बुलाते हैं. लेकिन अब कुछ झीलें अपनी अस्तित्व खो चुकी हैं. जो झीलें हैं भी उनको भी बचाने की चुनौती खड़ी है.

 नैनीताल का इतिहास: दरअसल, नैनीताल का इतिहास बड़ा ही रोचक रहा है. कहा जाता है कि साल 1841 में पीटर बैरन ने नैनीताल को खोजा था. लेकिन इससे पहले साल 1823 में ट्रेल यहां आये थे. लेकिन ट्रेल ने इसकी जानकारी किसी को नहीं दी, ताकि इसकी खूबसूरती को ग्रहण नहीं लगे. लेकिन बाद में 1841 में अंग्रेज व्यवपारी पीटर बैरन ने इस खूबसूरत शहर को दुनियां के सामने रखा. तब से इस शहर की खोज का श्रेय पीटर बैरन को दिया जाता है. कहा जाता है कि जब पीटर बैरन यहां पहुंचे थे तो नर सिंह थोकदार के पास नैनीताल का पूरा स्वामित्व था. अंग्रेज व्यापारी पीटर बैरन ने नर सिंह थोकदार को झील के बीच लेजाकर उन्हें डराया और धमकाया, इसके बाद इस शहर को अपने नाम पर कर लिया. 1842 के बाद अंग्रेजों ने नैनीताल को न सिर्फ अपनी ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाई, बल्कि इसको छोटी विलायत का  दर्जा भी दे दिया .

नैनीताल का ये रहा काला अध्याय: दरअसल, नैनीताल में लोगों की बसावट के बाद साल 1867 में पहला भूकम्प आया था. इसमें कोई भी हताहत नहीं हुआ था. इसके बाद 1880 में यहां भारी भूस्खलन हुआ था, जिसमें 151 लोगों को अपनी जान गवानी पड़ी थी. भूस्खलन इतना खतरनाक था कि नैनीताल का बड़ा हिस्सा झील में समा गया और बड़ा खेल मैदान भी उसी की देन है. हालांकि, इसके बाद अंग्रेजों ने इस शहर को सुरक्षित रखने के लिये 64 छोटे- बड़े नालों का निर्माण करवाया. लेकिन वक्त के साथ ये पूरा शहर कंक्रीट के जंगल में बदल गया. अब अतिक्रमण से इस शहर के अस्तित्व पर फिर खतरा मंडरा रहा है. इतिहासकार अजय रावत बताते हैं कि इस शहर को बचाने के लिये इन नालों का महत्वपूर्ण योगदान है जिनको नैनीताल की धमनियां कहा जाता है.



नैनीताल का धार्मिक महत्व: ऐसा नहीं है कि नैनीताल पीटर बैरन की खोज से पहले न हो. साल 1841 में ये शहर जरुर दुनियां के नजरों में आया, लेकिन इससे पहले इस स्थान को पवित्र भूमि माना जाता था, जिसका उल्लेख स्कंद पुराण के मानस खंड़ में मिलता है. इस स्थान को त्रि-ऋषि सरोवर कहा गया है. कहा जाता है कि इस स्थान पर तीन ऋषि- अत्री, पुलस्थ्य और पुलाहा ने तपस्या की थी. कहा ये भी जाता है कि जब उन्हें कहीं पानी नहीं मिला तो उन्होंने यहां पर एक बड़ा गड्डा बनाया. इसके बाद उसमें मानसरोवर का जल भर दिया. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस झील में आज भी नहाने से मानसरोवर जैसा पुण्य मिलता है. इसके साथ ही यहां झील के किनारे बसी नयना मां का मंदिर भी लोगों की आस्था का केन्द्र है. 64 शक्तिपीठों में सामिल इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि जब भगवान शिव अपनी पत्नी सती का अधजला शव लेकर आकाश मार्ग से जा रहे थे तो इस दौरान मां सती की आंख यहां गिरी थी. तभी यहां नयना देवी की स्थापना की गई. और शहर का नाम भी नैनीताल रखा गया.
नैनीताल में रुकने की ये है व्यवस्था: नैनीताल आने से पहले रुकने की चिंता लोगों को सताती है, लेकिन नैनीताल में ठहरने की व्यवस्था है. नैनीताल में राज्य अतिथि गृह यानि नैनीताल कल्ब है. यहां कुमाऊं मण्डल विकास निगम के भी दो रेस्ट हाउस सैलानियों के लिये हैं. इसके अलावा शहर में 200 से ज्यादा होटलों में रहने की व्यवस्था उचित दामों पर उपलब्ध है. हालांकि, नैनीताल शहर के आसपास भवाली, भीमताल, पंगूट, सिकरी और मुक्तेश्वर समेत अन्य स्थानों पर भी होटलों की भरमार हैं जहां ऑनलाइन या फिर ऑफलाइन बुकिंग की जा सकती है.

नैनीताल में सैर-सपाटे की जगहें:  नैनीताल पहुंचने के बाद सैर सपाटे के लिये बहुत से स्थान हैं. माल रोड सैलानियों के घूमने के लिए अच्छी जगह है. वहीं, बैंड स्टैंड पर लोगों की आवाजाही काफी ज्यादा रहती है. इसके साथ ही नैनीताल का तिब्बति बाजार और बड़ा बाजार में भी पर्यटकों की बहुत आवाजाही रहती है. इसके साथ ही आप नैनीताल में हिमालय दर्शन करने के अलावा पंगूट, किलबरी, खुर्पाताल, सडियाताल झरना, स्नोव्यूह और हनुमानगढ़ी में भी आसानी से घूम सकते हैं. नैनीताल से अगर बाहर जाना है तो श्यामखेत टी गार्ड़न, घोड़ाखाल गोल्ज्यू मंदिर, कैंची धाम मन्दिर और काकडीघाट जैसे पर्यटन स्थल हैं.

केबिल कार से भी नैनीताल के दर्शन: नैनीताल के हसीन वादियों के दर्शन केबिल कार यानि रोप वे से भी किया जा सकता है. कुमाऊं मण्डल विकास निगम से संचालित रोपवे को अब हाईटेक किया गया है, जिसमें रात को भी सैलानियों को नैनीताल को लाइट की रोशनी में निहारने का मौका मिलता है. करीब 1 किलोमीटर की दूरी के लिये बने इस रोपवे में आने- जाने के लिये 2 से 3 मिनट का ही समय लगाता है. और 10 से 12 सवारियां एक बार में एक साइड से आ -जा सकते हैं.

घोड़े की सवारी: नैनीताल में हॉर्स राइडिंग भी पर्यटकों की पंसद रही है. बारापत्थर से होने वाली घुड़सवारी को लेकर भी यहां पर्यटक पहुंचते हैं. साथ ही टिफिनटॉप के लिये घोड़े की सवारी करते हैं. इसके लिये पर्यटकों को 700 रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं. लेकिन ठंडा मौसम और रमणीक स्थल होने के चलते सैलानियों के लिये ये एक रोचक यात्रा भी होती है.

राजभवन: गौरतलब है कि नैनीताल का राजभवन गौथिक शैली में बनाया गया है. दिल को छूने वाले इस राजभवन में कुदरती खुबसूरती ऐसी समाई है कि इसे लंदन के बकिंघम पैलेस की संज्ञा दी जाती है. 220 एकड़ में फैले इस राजभवन में 115 कमरे हैं तो 50 एकड़ में गोल्फ ग्राउंड भी है. 1900 में तैयार हुए इस राजभवन के चारों ओर फैली हरियाली और फूलों से सजी क्यारियां भी अपनी ओर सैलानीयों को बर्बल खिच लाती हैं. 1 जून 2001 से शुरू हुये राजभवन दर्शन को 2011 में हालांकि बंद कर दिया गया था. इसके बाद 2013 में इसे पर्यटन के लिहाज से अहम मानते हुये फिर से सैलानीयों के लिये खोल दिया गया. पर्यटकों को राजभवन की यात्रा कराने के दौरान सुल्ताना डांकू की गुफा को जानने की भी रोचकता रहती है.

हनुमानगढी: नैनीताल शहर से हनुमानगढी 3 किलोमीटर दूर है. यहां से सन राइज व सन सेट का बेहतर नराजा सैलानियों को देखने को मिलता है. हालांकि, शहर के लोग पैदल ही यहां तक पहुंचते हैं. और पास में ही बने हनुमान के मन्दिर पर भी लोगों की काफी आस्था है.

नौकुचियाताल व भीमताल: नैनीताल से करीब 18 किलोमीटर दूर भीमताल झील है. नैनीताल से यहां पहुंचना आसान है. टैक्सी से भीमताल जाने के बाद नौकुचियाताल व सातताल की भी यात्रा की जा सकती है. और लौटते वक्त भवाली से कैंची धाम के दर्शन करते हुए गोल्ज्यू मंदिर और श्यामखेत टी-गार्ड़न का भी सैर किया जा सकता है.

हिमालय दर्शनः नैनीताल के हिमालय दर्शन शहर से 6 किलोमीटर दूर है. यहां आने -जाने के लिये टैक्सी सेवा उपलब्ध है. या फिर ट्रैकिंग भी की जा सकती है. दिसंबर से जनवरी तक यहां से हिमालय के खुबसूरत नजारों के दर्शन होते हैं. इसी लिये यहां साल भर पर्यटकों की आवाजाही बनी रहती है.

रामगढ़ मुक्तेश्वर: नैनीताल से 60 किलोमीटर की दूरी पर मुक्तेश्वर पर्यटन स्थल मौजूद है. यहां की शांत वादियां और सामने हिमालय के दर्शन भी लोगों को खासा आकृषित करते हैं. मुक्तेश्वर और रामगढ़ फल बागानों के रुप में भी विख्यात है. यहां पर सेब, आडू और पूलम के साथ- साथ पहाड़ी फलों से लदे हुए बागान हैं. इसके साथ ही इस इलाके में स्नोफाल के दौरान लोगों की आवाजाही ज्यादा बढ़ जाती है.

कैची धाम: नैनीताल से 15 किलोमीटर दूर किस्मत बदलने वाले बाबा कैंची धाम का मन्दिर है. कहा जाता है कि स्टीव जाॉब और मार्क जुकरबर्ग समेत कई विदेशी लोगों को इस मन्दिर से कामयाबी का रास्ता मिला है. इस मंन्दिर की स्थापना के बारे में कहा जाता है कि कैची के धर्मानन्द तिवाड़ी नैनीताल से घर लौट रहे थे. रास्ते में उनको काफी देर होने से भूत का डर सताने लगा था. तभी रास्ते में एक बाबा कम्बल ओड़े हुए मिले. बाबा ने उनसे पूछा कि कहां जाना है. आपको अभी गाड़ी मिल जायेगी. डरते हुये जब धर्मानन्द ने ये पूछा कि बाबा अब कब दर्शन होगें. इसके बाद बाबा 20 साल बाद कहकर ओझल हो गये. जब बाबा 20 साल बाद रानीखेत से लौट रहे थे तो तिवाड़ी परिवार ने बाबा नीब करौरी को नहीं पहचाना. इसके बाद बाबा ने 20 साल पुरानी कहानी सुनाई और इस स्थान पर मंन्दिर निर्माण करने की बात कही. तब से हर साल यहां 15 जून को बाबा नीब करौरी की स्थापना दिवस मनाया जाता है.
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