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बर्ड फ्लू से खतरे में आया पहाड़ का अनोखा त्यौहार 'घुघुति'... यहां जानिए क्यों

बड़ी तादाद में बर्ड फ्लू के कारण कौवों की मौत हो रही है उससे पहाड़ के लोगों को चिंता सता रही है कि आखिर एक दिन बाद आने वाले घुघुति त्यार के दिन उनके यहां कौवे कहां से आएंगे.
बड़ी तादाद में बर्ड फ्लू के कारण कौवों की मौत हो रही है उससे पहाड़ के लोगों को चिंता सता रही है कि आखिर एक दिन बाद आने वाले घुघुति त्यार के दिन उनके यहां कौवे कहां से आएंगे.

इस त्यौहार में खास तौर पर कौवों को घुघुति खाने के लिए पुकारा जाता है

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हल्द्वानी. पहाड़ और प्रकृति का हमेशा से गहरा नाता रहा है. पहाड़ों में रहने वाले उत्तराखंड के लोगों का पशु, पक्षियों के साथ ही प्रकृति से भी अनोखा संबंध है. यही वजह है कि पहाड़ के अधिकतर त्यौहार पर्यावरण और उसकी शान पशु-पक्षियों के ईर्द-गिर्द ही रचे-बसे हैं. ऐसा ही त्यौहार है मकर संक्रांति के मौके पर कुमाऊं के इलाके में मनाया जाने वाला "घुघुति'. इस त्यौहार में खास तौर पर कौवों को घुघुति खाने के लिए पुकारा जाता है लेकिन इस बार बर्ड फ्लू यानी एवियन इंफ्लूएंजा ने पहाड़ के लोगों के सामने एक अजीब सी परेशानी पैदा कर दी है. जिस बड़ी तादात में बर्ड फ्लू के कारण कौवों की मौत हो रही है उससे पहाड़ के लोगों को चिंता सता रही है कि आखिर एक दिन बाद आने वाले घुघुति त्यार के दिन उनके यहां कौवे कहां से आएंगे.

ऐसे मनाते हैं घुघुति

मकर संक्रांति के दिन बच्चे सुबह-सुबह गले में घुघुति माला ले कर छत पर जाते हैं और ''काले कौवा काले, घुघुति माला खा ले'' कहते हुए कौवों को बुलाते हैं. मान्यता है कि बच्चों की पुकार सुनकर कौवे बच्चों द्वारा छत के किसी कोने में रखे घुघुति को खाने पहुंच जाते हैं. जिसे खासा शुभ माना जाता है.



घुघुती खास तौर पर आटे, सौंफ़, घी और गुड़ से गुंदे आटे से हिंदी के चार के आकार में बनाए जाते हैं. इन्हें तेल या  घी में तलकर बनाया जाता है जिन्हें खाने के लिए कौवे आते हैं. इसलिए खास है पहाड़ के लिए कौवा.
घुघुति मनाए जाने के बारे में कई मान्यताएं प्रचलित हैं, हालांकि इनके ऐतिहासिक प्रमाण नहीं हैं.



मान्यता नंबर 1

कौवों को पकवान खिलाने की परंपरा के बारे में चंद्रवंशी राजाओं के समय की एक मान्यता भी प्रचलित है. कहा जाता है कि कुमाऊं में चंद्र वंशी राजाओं का राज-पाट था. इसी वंश के एक राजा थे राजा कल्याण चंद. उनकी कोई संतान नहीं थी. राजा की संतान न होने से उनकी राजसभा का मंत्री भविष्य में राजा बनने का अरमान पाले बैठा था.

एक दिन राजा ने संतान प्राप्ति के लिए पूजा करने का फैसला लिया और राजा-रानी के साथ मिलकर बाघनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना की. जिसके बाद राजा को निर्भय चंद नाम का बेटा पैदा हुआ. राजकुमार निर्भय चंद को उनकी मां पहाड़ की चिड़िया घुघुति के नाम से बुलाती थी.

बालक घुघुति के गले में मोतियों की माला पहनाई गई थी. जिसकी खनक से घुघुति खुश हो जाता था. कभी-कभी घुघुति जिद करता तो मां कौवों को पुकार कर शरारती राजकुमार को शांत करती थी. रानी बेटे राजकुमार को शांत करने के लिए अक्सर कहती थी ''काले कौवा काले, घुघुति माला खाले''. माला छिनने के डर से राजकुमार शरारत बंद कर देते थे.

जब मां के कहने पर कौवे आ जाते तो उन्हें रानी खाने के लिए कुछ न कुछ देती थी जिससे राजकुमार और कौवों में दोस्ती हो गई. इस बीच राजा की संतान होने के बाद राजा बनने का सपना पाने बैठे मंत्री के मन में षडयंत्र चलने लगे. उसने राजकुमार घुघुति का अपहरण कर उसे मारने की साजिश रच डाली. मंत्री घुघुति को हत्या के इरादे से जंगल में ले गया जहां कौवों ने उसे घेर लिया. कौवों ने मंत्री और उसके साथियों को बुरी तरह नोच डाला.

इस बीच राजकुमार के गायब होने से राजमहल में कोहराम मच गया. इसी दौरान जंगल में से एक कौवा राजकुमार घुघुली के गले में लगी मोतियों की माला लेकर कांव-कांव करते हुए रानी के कक्ष में आ गया. रानी को समझते देर नहीं लगी कि येहउनके बेटे घुघुती की माला है और यह कौवा मुझे कोई इशारा कर रहा है.

रानी ने सैनिकों से तुरंत कौवे के पीछे जाने को कहा. सैनिक जंगल में गए. जहां घुघुती एक पेड़ के नीचे पड़ा हुआ था. मान्यता है कि राजकुमार घुघुति की सकुशल घर वापसी पर रानी ने खूब पकवान बनाए जिसे कौवों को खिलाया गया. तभी से घुघुति त्यौहार की मान्यता शुरु हो गई. ​

मान्यता नंबर 2

एक लोककथा के मुताबिक सदियों पहले कुमाऊं में घुघुत नाम का एक राजा हुआ करता था. एक ज्योतिष ने उसे बताया कि मकर संक्रांति की सुबह कौवे उसकी हत्या कर देंगे. राजा को उसकी मौत से बचाने के लिए उसके सलाहकारों ने कौवों को व्यस्त रखने की योजना बनाई ताकि राजा की मौत की बुरी घड़ी टल जाए.

उन्होंने राज्य में घोषणा कर दी कि सब लोग घरों में गुड़ मिले आटे के विशेष प्रकार के पकवान बनाकर कौवों को पुकारेंगे. पुकारने का काम बच्चे करेंगे. इन पकवानों का आकर सांप जैसा रखने को कहा गया ताकि कौवे इस पर लालच की वजह से झपटें. इसीलिए प्रजा ने इस त्यौहार को घुघुति नाम दे दिया.

मान्यता नंबर 3

इसी तरह दूसरी कहानी ये है कि एक राजा को ज्योतिष ने बताया कि वह अपनी ग्रह दशा टालने के लिए कौवों को मकर सक्रांति के दिन मीट खिलाएं. लेकिन राजा बड़ा धार्मिक था. उससे मकर संक्रांति के दिन जीव हत्या का पाप मोल न लेने का प्रण लिया.

इसके बाद राजा ने गुड़ मिले आटे से सांप नुना प्रतीकात्मक घुघुते बनाए. तभी से यह त्यौहार चलन में आ गया.

मान्यता नंबर 4

कौवों को पकवान खिलाने के बारे में एक और मान्यता है पहाड़ में ठंड के कारण अधिकतर पक्षी गर्म मैदानी इलाकों में चले जाते हैं लेकिन कौवा पहाड़ में ही रहता है. इसलिए कौवे के सम्मान में पहाड़ के लोग उन्हें पकवान खिलाते हैं.
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