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नैनीताल की इन कब्रों में दफन हैं अंग्रेजी दौर के राज, अपनों को जानने आज भी आते हैं विदेशी

नैनीताल के पाइंस में कई अंग्रेजों की कब्र है.

नैनीताल के पाइंस में कई अंग्रेजों की कब्र है.

उत्तराखंड के नैनीताल (Nainital) के पाइंस के कब्रिस्तान में विदेशी अपनों को याद करने जरूर आते हैं. अपने पूर्वजों की कब्रों के पास कुछ घंटे बिताकर ये विदेशी नागरिक उनके जीवन को जानने का मौका खोजते हैं.

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नैनीताल. कौन चाहेगा कि वो कब्रिस्तान में जाए, लेकिन हम आपको ऐसी कहानी बताने जा रहे हैं जहां विदेशी ना सिर्फ अपनों की खोज में आज भी आते हैं. बल्कि ये हिंदुस्तान का वो कोना है, जहां कई विदेशी अपने पूर्वजों का जीवन दर्शन क्या रहा और उनका जीवन कैसा गुजरा इन तमाम सवालों को खोजने आते हैं. उत्तराखंड (Uttarakhand) के नैनीताल (Nainital) के पाइंस का कब्रिस्तान में विदेशी अपनों को याद करने जरूर आते हैं. अपने पूर्वजों आबाद कब्रों में कुछ घंटे इस स्थान पर बिताकर वो उनके जीवन को जानने का मौका खोजते हैं.

आजादी से पहले 1895 में बने ये कब्रिस्तान अंग्रेज फौजियों की कहानी को कहते हैं तो नैनीताल में उस दौर में रहे दूसरे विश्वयुद्ध के योद्धाओं और खेल से जुड़े अंग्रेजों खिलाडियों को भी यहीं पर जन्नत मिली है. सिर्फ पाइंस ही नहीं बल्कि सूखाताल कब्रिस्तान में तो नैनीताल शहर को बसाने वाले पहले अंग्रेज कमिश्नर लूसिंगटन, जिम कार्बेट के मां-पिता की यादें बसी हैं. 1880 के भूकंप में मरे 151 लोगों में से कई लोगों को दफन किया गया है. अग्रेजी दौर की कहानी कहती इन कब्रों में आज भी यूरोपियन आकर अपनों की खोज जरुर करते हैं.

19वीं शताब्दी में बना था कब्रिस्तान


इतिहासकार अजय रावत कहते हैं कि इन कब्रिस्तानों का निर्माण 19वीं शताब्दी में हुआ था. अंग्रेजी दौर के पाइंस कब्रिस्तान का आर्मी के लोगों के लिये बना है, जिसमें दूसरे विश्वयुद्ध के सैनिक यानि जिनको नैनीताल में रखा गया था उनको दफन किया गया है. इतिहासकार रावत कहते हैं कि ये इसलिये महत्वपूर्ण भी है कि आजादी 1857 की क्रान्ति के दौरान अंग्रेजों ने इस स्थान पर सरण भी ली थी. इस कब्रिस्तान में पोलो के खिलाड़ियों को भी दफन किया गया है. नैनीताल और रानीखेत में 1992 से 1933 तक के खिलाड़ियों को भी दफन किया गया है. अजय रावत कहते हैं कि दूसरे बोअर वाॅर 1899 से 1900 के कैदियों को भी भीमताल लाया गया, जिनको भी इस स्थान पर दफ्नाया गया है. 1951 तक यहां पर लोगों को दफन किया जाता रहा है, लेकिन अब शहर से बाहर लोगों को दफन किया जाता है.

पूर्वजों की याद में आते हैं अंग्रेज


दरअसल नैनीताल, रानीखेत, मसूरी समेत अन्य स्थानों पर ऐसे कब्रिस्तान हैं, जहां ब्रिटिशकाल के दौरान जीवन के अंतिम दिन बिताने वाले अधिकारियों व सैनिकों की कब्रें हैं. जिनकी खोज करते हुए यूरोपियन उत्तराखण्ड के इन स्थानों पर अमूमन आते-जाते रहते हैं. हालांकि इन ऐतिहासिक स्थानों को बेहतर करने की मांग करने वाले व शोध से जुड़े युवा दीपक बिष्ट कहते हैं कि सूखाताल में जिम कार्बेट की माता-पिता के साथ नैनीताल को बसाने वाले लूसिंगटन के साथ कई महत्वपूर्ण लोगों को दफनाया गया है. लिहाजा ऐसे स्थानों को लोगों के जानने के लिये खोला जाना चाहिये और इनको संवारा जाना चाहिये. वहीं नैनीताल जिला पर्यटन अधिकारी अरविंद गौड़ कहते हैं कि इस बार पर्यटन विभाग का लक्ष्य है कि कब्रिस्तान को बेहतर किया जायेगा, ताकि विदेश से आने वाले लोग अपने पूर्वजों को आसानी से खोज सकें और उनकी कब्र पर प्रार्थना कर सकें.
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