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School Re-open : आधी-अधूरी तैयारी से क्यों खुले स्कूल? हाई कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार से मांगा पूरा ब्योरा

School Re-open : आधी-अधूरी तैयारी से क्यों खुले स्कूल? हाई कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार से मांगा पूरा ब्योरा

उत्तराखंड में 2 अगस्त से स्कूल खुले.

इस महीने 2 अगस्त से कक्षा 9वीं से लेकर 12वीं तक के छात्रों के लिए स्कूल खोले गए, लेकिन एक जनहित याचिका में चुनौती दी गई कि सरकार ने बच्चों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त इंतज़ाम नहीं किए. कोर्ट ने नोटिस जारी किया है.

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नैनीताल. उत्तराखंड में आधी अधूरी तैयारी के साथ स्कूल खोले जाने के मामले पर हाई कोर्ट ने सरकार को नोटिस जारी कर दिया है. कोर्ट ने सरकार को 17 अगस्त तक शपथ पत्र के साथ जवाब दाखिल करने का आदेश दिया. कोर्ट ने पूछा कि कोरोना संक्रमण के खतरे के बीच स्कूल खोले हैं, तो बच्चों की सुरक्षा और उनके जीवन की रक्षा के लिए सरकार ने क्या तैयारी और इंतज़ाम किए गए. हालांकि कोर्ट ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता से यह भी कहा कि ये पॉलिसी मैटर है और कोर्ट के साथ ही अन्य संस्थान भी तो खुल रहे हैं.

जब कोर्ट ने यह तर्क दिया तो याचिकाकर्ता के वकील की दलील थी कि कोर्ट या अन्य संस्थानों के लोगों ने वैक्सीन ली है, लेकिन बच्चों को अब तक वैक्सीन नहीं दी गई है. ऐसे में स्कूली बच्चों के जीवन से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता. इस तर्क को कोर्ट ने माना और राज्य सरकार से तैयारियों का ब्योरा मांगा. कोर्ट ने सरकार से यह भी पूछा कि व्यवस्था के मुताबिक खाना स्कूल में मिलेगा नहीं और घर से खाने लाने के लिए बच्चों को मना किया गया है तो वो 6 घंटे स्कूल में कैसे रहेंगे.

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सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि स्कूल एक फॉर्म भरकर ले रहे हैं, जिसमें लिखा है कि अगर कोई छात्र स्कूल में संक्रमित होता है, तो स्कूल का कोई कसूर नहीं है. आपको बता दें कि विजयपाल सिंह ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर सरकार के 31 जुलाई के जीओ को चुनौती दी. इस याचिका में कहा गया कि विशेषज्ञों ने तीसरी लहर के प्रकोप की चिंता ज़ाहिर की है, इसके बावजूद सरकार ने आधी अधूरी तैयारी के साथ स्कूल खोल दिए. गौरतलब है कि बीते बुधवार से ही राज्य में बड़ी कक्षाओं के लिए स्कूल खोले गए.

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कैसे बांटी जाएं रोडवेज परिसंपत्तियां? UP-उत्तराखंड के बीच नहीं निकला हल, सैलरी के मुद्दे पर HC ने मांगा जवाब

कैसे बांटी जाएं रोडवेज परिसंपत्तियां? UP-उत्तराखंड के बीच नहीं निकला हल, सैलरी के मुद्दे पर HC ने मांगा जवाब

कहते हैं कि दो हाथियों की लड़ाई में घास ही कुचली जाती है. कोर्ट के आदेश पर केंद्र सरकार के दखल के बावजूद दोनों राज्य किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे. देखिए केंद्र ने कैसे कोर्ट को रिपोर्ट दी और कैसे कर्मचारियों का दर्द बरकरार है.

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नैनीताल. हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी उत्तराखंड और यूपी सरकार के बीच रोडवेज परिसम्पत्तियों के बंटवारे पर कोई नतीजा नहीं निकल सका. केंद्र सरकार ने हाई कोर्ट में दोनों राज्यों की बैठक के मिनट्स पेश करते हुए कहा कि बैठक में दोनों राज्य कोई नतीजे पर नहीं पहुंच सके. केंद्र ने कहा कि उत्तराखंड सरकार मार्किट वैल्यू के आधार पर रकम मांग रही है जबकि यूपी सरकार चाहती है कि रोडवेज़ परि​संपत्तियों का बंटवारा भी वैसे ही हो, जैसे दूसरे विभागों का हुआ. केंद्र ने यह भी बताया कि यूपी सरकार की तरफ से उसे सूचना दी गई है कि इस मामले में यूपी ने सुप्रीम कोर्ट में वाद दाखिल किया है. इस उलझन के बीच, रोडवेज़कर्मियों की सैलरी के मामले पर भी कोर्ट ने चिंता दिखाई.

कोर्ट ने उत्तराखंड से कौन से सवाल पूछे?
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार को इस मामले में नोटिस जारी कर​ डिटेल्स मांगे हैं और अब जब तक वाद का निपटारा सुप्रीम कोर्ट से नहीं होगा, तब तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकेगा. वहीं, कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार से पूछा है कि उसकी 700 करोड़ रुपयों की मांग का ठोस आधार क्या है? क्या यूपी से इस बारे में कोई पत्राचार किया गया है? रोडवेज कर्मचारियों की सैलरी पर क्या निर्णय लिया गया? चीफ जस्टिस आर एस चौहान और जस्टिस आलोक कुमार की बेंच में हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कैबिनेट बैठक के फैसले के बारे में जानकारी भी मांगी. अब कोर्ट 7 अक्टूबर को इस मामले पर सुनवाई करेगा.

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नैनीताल स्थित हाई कोर्ट भवन. (File Photo)

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आखिर क्या है पूरी कहानी?
दरअसल, उत्तराखंड हाई कोर्ट रोडवेज़ कर्मचारी यूनियन की याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें संगठन ने मांग की है कि समय पर सैलरी दी जाए. याचिका में कहा गया है कि अगर सैलरी को लेकर वो हड़ताल पर जाते हैं, तो उन पर एस्मा के तहत कार्रवाई की जाती है. याचिका में रोडवेज़ कर्मचारियों ने सरकार की 45 लाख के आसपास की देनदारी और यूपी से परिसम्पत्तियों के 700 करोड़ मिलने की बात उठाई थी. हालांकि पिछली सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया था कि दोनों सरकारों के बीच बैठक करके कोई हल निकाला जाए. अब केंद्र ने दोनों राज्यों के बीच सहमति न बन पाने की बात कोर्ट को बताई.

नैनीताल के चार खेत में लकड़ियों से बनाए जाते हैं अलग अलग डिजाइन 

नैनीताल के चार खेत में लकड़ियों से बनाए जाते हैं अलग अलग डिजाइन 

स्थानीय शिल्पकार उमेश चंद्र "कुमाऊँ काष्ठ कला केंद्र " के नाम से स्थानीय लकड़ियां जैसे अखरोट, चिनार, देवदार, चीड़ और बाकी जंगली लकड़ियों का

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नैनीताल में ऐसी अनेकों आकृतियाँ हैं जो पर्यटकों को काफी लुभाती हैं.  इन्हीं में से एक है काष्ठ यानि लकड़ी की कला. लकड़ियों में अलग अलग आकृतियाँ देना एक अद्भुत कला है. नैनीताल नगर की कई सजावट भरी दुकानों पर यह कला देखने को मिलती हैं. लेकिन ऐसी कला के पीछे लगती है मेहनत जिसके बारे में लोगों को कम जानकारी होती है. नैनीताल से करीब  8 किमी. की दूरी पर स्थित है खुर्पताल की एक छोटी सी बसावट, जिसका नाम है चार. यहां स्थानीय शिल्पकार उमेश चंद्र \”कुमाऊँ काष्ठ कला केंद्र \” के नाम से स्थानीय लकड़ियां जैसे अखरोट, चिनार, देवदार, चीड़ और बाकी जंगली लकड़ियों का इस्तेमाल करते हुए लकड़ियों से अलग अलग आकृतियां बनाते हैं और उन्हें बेचते हैं. उमेश चंद्र बताते हैं कि उनको यह काम उनके पिताजी से उन्हें विरासत में मिला है. इस काम को करते हुए करीब 70 से 75 साल हो गए हैं. पूर्वजों से मिली इस विरासत में कला को आधुनिक रूप देने के लिए इनके पिताजी श्री रामलाल को साल 1990 में हाथ से बनाई लकड़ी की गणेश की मूर्ती के लिए उत्तर प्रदेश से प्रादेशिक पुरस्कार मिला. इसकी के साथ लकड़ी से बनाई पशुपतिनाथ मंदिर की आकृति के लिए साल 2016 में सरकार से उत्तराखंड राज्य शिल्प पुरस्कार भी मिला. उमेश ने लकड़ी की इन कलाओं की बारीकीयों को अपने पिता से घर के आंगन में ही सीखा है. स्कूल में पढ़ाई के साथ साथ इस कला में उनकी पकड़ बचपन से ही शुरू हो गई थी. रेत, छीजल, आरी, हथोड़ी से खेलने के शौक ने आज उमेश को काष्ठ कला के क्षेत्र में एक अच्छा काष्ठकार बना दिया है.
यहां लकड़ी के अनेकों प्रकार के नमूने देखने को मिलते हैं. नैनीताल में चलने वाली नाव की आकृति, गणेश की प्रतिमा, मशरुम अगरबत्ती स्टैंड, बुल, खाट,आई लव नैनीताल वाली \’की चेन\’, ओल्ड मैन काफी मशहूर हैं. चीड़ के फलों से बनाई आकृतियां भी यहां देखने को मिलती हैं. चीड़ से बनाया पाइन कोन डक का नमूना भी यहां देखने को मिलता है.
नैनीताल आने जाने वाले पर्यटकों को यह कलाकृतियां काफी आकर्षित करती हुई आई हैं लेकिन लॉकडाउन ने इस कला पर काफी असर डाला है. लॉकडाउन होने से यहां पर्यटकों का आना बंद हुआ तो यहां का व्यवसाय ठप हो गया. लॉकडाउन खुलने से थोड़ी बहुत राहत तो मिली लेकिन लगातार हो रहे भूस्खलन ने फिर से पर्यटकों की संख्या में कमी की है. अगर यूही चलता रहा तो बरसों से चली आ रही यह बेहतरीन काष्ठ कला कहीं विलुप्त ही ना हो जाए.

बच्चों को जब नहीं मिलती कोई किताब, तो याद आते हैं नैनीताल के 'मामू'

बच्चों को जब नहीं मिलती कोई किताब, तो याद आते हैं नैनीताल के 'मामू'

मामू ने बताया कि कबाड़ बेचते समय जब भी वह किताबों को कबाड़ में देखते थे तो उन्हें बुरा लगता था.

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नैनीताल व आसपास के जिलों में छात्रों को जब कोई किताब नहीं मिलती तो उन्हें नैनीताल के मामू याद आते हैं. मामू कबाड़ी, बस इतना ही परिचय काफी है. नैनीताल शहर में हर कोई इन्हें इसी नाम से जानता है. मामू किताबें बेचकर ही अपना घर चलाते हैं. वह इस काम को पिछले 30 साल से कर रहे हैं. अगर किसी भी बुक स्टोर में कोई किताब नहीं मिलती तो बच्चे सीधा मामू के पास चले आते हैं.

मामू कबाड़ी का असली नाम राशिद अहमद है. इस नाम से लोग इन्हें बहुत कम ही जानते हैं. राशिद मूल रूप से धामपुर के रहने वाले हैं. छठवीं तक पढ़े राशिद 40 साल पहले धामपुर से नैनीताल आ गए थे और यहां रहकर कबाड़ का काम करने लगे. यहां वह अपनी बहन और भांजों के साथ रहते हैं. राशिद बताते हैं कि भांजों के मामू कहने से बाकी लोग भी उन्हें मामू कहने लगे और आज वह मामू कबाड़ी के नाम से पूरे नैनीताल में मशहूर हैं.

शहर में उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी जब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने थे तो वह इनकी दुकान पर आए थे और इस काम के लिए बधाई दी थी. मामू का कहना है कि कबाड़ बेचते समय जब भी वह किताबों को कबाड़ में देखते थे तो उन्हें बुरा लगता था. जिस वजह से उन्होंने किताबों को बेकार होने के बजाय बच्चों को देना सही समझा.

स्कूल की पढ़ाई कम होने के बावजूद भी मामू को किताबों का सटीक ज्ञान है. कौन सी किताब किस विषय के लिए और किस परीक्षा के लिए होती है, वह इससे अच्छी तरह वाकिफ हैं. यहां पहली कक्षा से लेकर विश्वविद्यालय तक की सभी किताबें मिल जाती हैं. नैनीताल ही नहीं बल्कि हल्द्वानी, अल्मोड़ा, रानीखेत और अन्य जगहों से भी लोग यहां किताब खरीदने आते हैं.

Uttarakhand Chardham Yatra: नैन‍ीताल HC का बड़ा फैसला, चारधाम यात्रा पर लगी रोक हटाई, लेकिन कुछ शर्तें

Uttarakhand Chardham Yatra: नैन‍ीताल HC का बड़ा फैसला, चारधाम यात्रा पर लगी रोक हटाई, लेकिन कुछ शर्तें

बड़ा फैसला देते हुए उत्तराखंड हाई कोर्ट ने चार धाम यात्रा शुरू किए जाने को सशर्त मंज़ूरी दे दी है. जानिए क्यों ढाई महीने से लटका हुआ था यह मामला और किस तरह इस यात्रा के बंद होने से स्थानीय लोगों के सामने भारी संकट की स्थिति थी.

  • News18Hindi
  • LAST UPDATED : September 16, 2021, 15:44 IST
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नैनीताल. उत्तराखंड से बड़ी खबर आई कि करीब ढाई महीने के गतिरोध के बाद चार धाम यात्रा पर लगी रोक हटा दी गई. अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में हाई कोर्ट ने कुछ प्रतिबंधों के साथ यह रोक हटा दी. 28 जून को हाई कोर्ट ने कोविड 19 संबंधी पर्याप्त इंतज़ाम न होने के कारण उत्तराखंड की इस महत्वपूर्ण तीर्थ यात्रा पर रोक लगाई थी. इसे हटाने के लिए राज्य सरकार लगातार कोशिशें कर रही थी और राज्य में सियासत भी गरमा गई थी. पिछले दिनों सरकार के सुप्रीम कोर्ट से याचिका वापिस लेने के बाद उत्तराखंड हाई कोर्ट में इस मामले पर सुनवाई हो सकी और आज गुरुवार को हाई कोर्ट ने यात्रा के लिए रास्ता साफ कर दिया.

इन शर्तों के साथ मंज़ूरी
हाई कोर्ट के आदेश के मुताबिक बद्रीनाथ धाम में 1200 भक्त या यात्रियों, केदारनाथ धाम में 800, गंगोत्री में 600 और यमुनोत्री धाम में कुल 400 यात्रियों के लिए इजाज़त दी गई है. साथ ही कोर्ट ने प्रत्येक धाम पर पहुंचने वाले हर भक्त या यात्री के लिए कोविड नेगेटिव रिपोर्ट और वैक्सीन के दोनों डोज़ का सर्टिफिकेट भी अनिवार्य किया है. यही नहीं, हाईकोर्ट ने चमोली, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी ज़िलों में ज़रूरत के मुताबिक पुलिस फोर्स लगाने को कहा है. साथ ही निर्देश हैं कि भक्त किसी भी कुंड में स्नान नहीं कर सकेंगे.

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चारधाम यात्रा शुरू करने के लिए 10 सितंबर को सरकार ने कोर्ट से मामले की जल्द सुनवाई किए जाने के लिए आवेदन दिया था, जिस पर कोर्ट ने 16 सितंबर का दिन मुकर्रर किया था. मुख्य न्यायाधीश आरएस चौहान एवं न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ में इस मामले पर हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यात्रा को कोरोना संक्रमण के लिहाज़ से गाइडलाइन फॉलो किए जाने संबंधी सशर्त मंज़ूरी दे दी. इस यात्रा को लेकर मामला कैसे उलझ और भड़क गया था, जानिए.

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हाई कोर्ट ने चार धाम यात्रा पर लगी रोक हटाई.

सरकार चली गई थी सुप्रीम कोर्ट
जून के आखिरी हफ्ते में जब हाई कोर्ट ने सरकार के निर्णय को पलटते हुए चार धाम यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया था, तो उसके बाद उत्तराखंड सरकार सुप्रीम कोर्ट की शरण में पहुंच गई थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिल सकी और इस प्रक्रिया में समय गुज़र गया. समय के साथ कोरोना संक्रमण को लेकर हालात काफी काबू में दिखे और सरकार ने दलील दी कि जीवन पटरी पर लौट रहा है इसलिए यात्रा को मंज़ूरी दी जाना चाहिए. तब हाई कोर्ट ने कहा था कि जब तक याचिका सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है, वह इस मामले में दखल नहीं देगा. इस पर पिछले दिनों प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से एसएलपी वापस ले ली थी.

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कांग्रेसियों ने दी थीं गिरफ्तारियां
चार धाम यात्रा शुरू किए जाने को लेकर प्रदेश में सियासत भी गरमा गई थी. कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने लगातार इस यात्रा को मुद्दा बनाते हुए प्रदेश भर में प्रदर्शन किए थे और हाल में ही पुलिस के साथ झड़प होने के बाद गिरफ्तारियां भी दे दी थीं. कांग्रेस के राज्य स्तरीय नेताओं ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए राज्य सरकार पर आरोप लगाया था कि यात्रा शुरू करवाने को लेकर गंभीरता नहीं दिखाने से स्थानीय लोगों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है. गौरतलब है कि तीन ज़िलों में इस यात्रा की वजह से होने वाले पर्यटन पर ही हज़ारों स्थानीय लोगों का रोज़गार टिका है.

तलवार और ढाल के बिना अधूरा है छोलिया नृत्य, जानिए कैसे 'छल' से मिला ये नाम

तलवार और ढाल के बिना अधूरा है छोलिया नृत्य, जानिए कैसे 'छल' से मिला ये नाम

नैनीताल के नंदा देवी महोत्सव में इस बार छोलिया की चार टीम भाग ले रही हैं.

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नैनीताल में नंदा देवी महोत्सव को कोरोना नियमों को ध्यान में रखते हुए धूमधाम से मनाया जा रहा है. ज्योलीकोट से केले के पेड़ को लाकर नैना देवी प्रांगण में मूर्ति निर्माण किया गया. ब्रह्म मुहूर्त में देवी मां की प्राण प्रतिष्ठा करके मूर्तियों को स्थापित किया गया. इस बीच मेले में कुमाऊं का लोक नृत्य छोलिया भी देखने को मिल रहा है.

हाथों में तलवार और ढाल लेकर, रंग-बिरंगे कपड़ों में नृत्य कर रहे कलाकार महोत्सव में चार चांद लगा रहे हैं. यह नृत्य उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र के सरौ, पौणा नृत्य की तरह है. यह नगराज, नरसिंह और पांडव लीलाओं पर आधारित नृत्य है. इसमें नृत्य के जरिए संगीत का आनंद भी लिया जाता है.

नंदा देवी महोत्सव में इस बार छोलिया की चार टीम भाग ले रही हैं. ओखलकांडा, रामगढ़, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा से यह टीम आई हैं. हर दल में करीब 10 से 15 लोगों की टोली मिलकर नृत्य करती है. कहा जाता है कि यह नृत्य करीब डेढ़ से दो हजार साल पुराना है.

नाचने वालों की इस टोली में गाने-बजाने वालों का एक दल अलग से चलता है, जो ढोल, दमाऊ, रणसिंघा, तुरही लेकर साथ-साथ चलते हैं. कलाकारों के नाचने का तरीका कुछ इस तरह होता है कि जैसे वह युद्ध में अपने प्रतिद्वंद्वी के दांव-पेंचों की नकल करते हैं और छल के जरिए अपने दुश्मन को मात देते हैं.

बताया जाता है कि इस वजह से ही इस नृत्य का नाम छोलिया पड़ा था. छोलिया टीम के सदस्यों के कपड़े भी काफी आकर्षक होते हैं. लाल, नीला, हरा और सफेद रंग से बनी इनकी पोशाकें इस नृत्य में चार चांद लगा देती हैं.

नैनीताल का 'बकिंघम पैलेस' है राजभवन, सुल्ताना डाकू से जुड़ा है एक रोचक किस्सा

नैनीताल का 'बकिंघम पैलेस' है राजभवन, सुल्ताना डाकू से जुड़ा है एक रोचक किस्सा

नैनीताल स्थित राजभवन को बनाने के लिए स्थानीय पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है.

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भारत में ऐसे बहुत कम राज्य हैं, जहां दो राजभवन स्थित हैं. उत्तराखंड उन्हीं राज्यों में से एक है. यहां दो राजभवन देखने को मिलेंगे. एक देहरादून के त्रिवेणी नगर में मौजूद है और दूसरा है नैनीताल के तल्लीताल में. नैनीताल के राजभवन की बात करें तो यह पर्यटकों के घूमने के लिए काफी अच्छी जगह है. टिकट लेकर अंदर जा सकते हैं.

राजभवन घूमने जाने वाले पर्यटकों के साथ एक गाइड को भेजा जाता है. अंदर जाते ही बाईं तरफ एक पुलिस सुरक्षा भवन है. यहां बॉलीवुड की सुपरहिट फिल्म कोई मिल गया की शूटिंग हुई थी.

बताते चलें कि यह राजभवन स्कॉटिश गौथिक शैली का बना है. इसके डिजाइनर अर्किटेक्ट स्टीवेंस और अधिशासी अभियंता एफ.ओ. डब्ल्यू औरेटेल थे. राजभवन का आर्किटेक्चर लंदन के बकिंघम पैलेस से मिलता-जुलता है.

इतिहासकार अजय रावत बताते हैं कि इस राजभवन को बनाने के लिए स्थानीय पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है. स्थानीय पत्थरों की वजह से नैनीताल का राजभवन गौथिक शैली का बना हुआ है. इसकी खासियत यह है कि यह अपने बैकग्राउंड से काफी मिलता है.

राजभवन में कुल 85 कमरे हैं, जिसमें 13 बेडरूम हैं. राजभवन के अंदर ब्रिटिश जमाने के मेंडल्स देखने को मिलेंगे. भीतर सुल्ताना डाकू के कई औजार भी रखे हुए हैं. वहीं अंग्रेजों के जमाने का एक पियानो भी अंदर मौजूद है, जो उनकी आखिरी विरासत है.

नैनीताल : छोटी सी उम्र में किया बड़ा कमाल, 13 साल के लड़के ने लिख दी नॉवेल

नैनीताल : छोटी सी उम्र में किया बड़ा कमाल, 13 साल के लड़के ने लिख दी नॉवेल

नैनीताल के सेंट जोसेफ स्कूल में पढ़ने वाले 8वीं के छात्र विपुल जोशी ने एक नॉवेल लिखी है.

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नैनीताल के एक लड़के ने कम उम्र में बड़ा कमाल कर दिखाया है. सेंट जोसेफ स्कूल में पढ़ने वाले 8वीं के छात्र विपुल जोशी ने एक नॉवेल लिख दी है, जिसका नाम है \’गेरीज एडवेंचर द एलिक्सजिर ऑफ इम्मोरटालिटी\’. यह नॉवेल 19 साल के एक बच्चे पर आधारित है.

इस नॉवेल में जादुई दुनिया, दोस्ती, धोखाधड़ी, एडवेंचर से जुड़ी कहानी पढ़ने को मिलेगी. विपुल ने यह नॉवेल लॉकडाउन के दौरान लिखी थी. विपुल को कविताएं लिखने का भी शौक है. उनकी लिखी एक कविता इस नॉवेल में भी पढ़ने को मिलेगी.

नैनीताल : केले के पेड़ से ही क्यों बनाई जाती है मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमा?

नैनीताल : केले के पेड़ से ही क्यों बनाई जाती है मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमा?

मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमा बनाने के लिए नैनीताल के ज्योलीकोट से केले के पेड़ लाए गए.

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नैनीताल में कोरोना नियमों को ध्यान में रखते हुए नंदा देवी महोत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है. हर साल भद्रमास की पंचमी से यह मेला शुरू होता है. मेले के दौरान मां नंदा-सुनंदा का पूजन होता है. केले के पेड़ से उनकी प्रतिमाएं बनाई जाती हैं और स्थानीय कलाकारों द्वारा उनका श्रृंगार किया जाता है.

मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमा बनाने के लिए नैनीताल के ज्योलीकोट से केले के पेड़ लाए गए. मूर्तियां बनाने के लिए केले के पेड़ का ही इस्तेमाल क्यों किया जाता है, इसके पीछे स्थानीय लोगों की अलग-अलग मान्यताएं हैं.

उन्होंने बताया कि नंदा-सुनंदा दो बहनें थीं. जब वे अपने ससुराल जा रही थीं, तब एक भैंसा उनके पीछे दौड़ने लगा. दोनों अपनी जान बचाने के लिए केले के खेत में छिप गईं. एक बकरे ने केले के पत्ते खा लिए और भैंसे ने केले के खेत में उनकी हत्या कर दी.

इसी वजह से केले के पेड़ से ही मां नंदा-सुनंदा की मूर्ति बनाने की रवायत चली आ रही है. दूसरी ओर कई साल से मेले के दौरान बकरे की बलि की प्रथा भी चली आ रही थी लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इस पर रोक जारी है.

कुछ लोगों का मानना है कि केला एक पवित्र पेड़ है. देश में केले को धार्मिक रूप में काफी महत्वता दी गई है, जिस वजह से इसे मूर्ति के निर्माण में लाया जाता है.

देवी मां की प्रतिमा बनाने के लिए केले के पेड़, रुई और बांस की लकड़ी इस्तेमाल में लाई जाती है. मूर्ति निर्माण के संयोजक चंद्र प्रकाश शाह बताते हैं कि इन्हें बनाने के लिए सभी प्राकृतिक चीजों का प्रयोग किया जाता है. यहां तक रंग भी नैचुरल इस्तेमाल किए जाते हैं.

उत्तराखंड से माओवाद का खात्मा: इनामी भास्कर पांडे की गिरफ्तारी के बाद पुलिस का दावा

उत्तराखंड से माओवाद का खात्मा: इनामी भास्कर पांडे की गिरफ्तारी के बाद पुलिस का दावा

Uttarakhand Police : कई साल से फरार चल रहे इनामी माओवादी भास्कर पांडे को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. पुलिस का दावा है कि इसके साथ ही उत्तराखंड से माओवाद का खात्मा हो गया है. प्रदेश में अभी तक करीब 24 माओवादियों के सरगनाओं को पुलिस ने जेल की सलाखों के पीछे भेजा है.

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नैनीताल. उत्तराखंड (Uttarakhand) से माओवाद (Maoist) का खात्मा हो गया है. पुलिस का दावा है कि इनामी माओवादी भास्कर पांडे  (Bhaskar Pandey) के पकड़े जाने के बाद राज्य में माओवाद का चैप्टर क्लोज कर दिया गया है. प्रदेश में अभी तक करीब 24 माओवादियों के सरगनाओं को पुलिस ने जेल की सलाखों के पीछे भेजा है, जो राज्य में माओवाद की जड़ें मजबूत करना चाह रहे थे.

प्रदेश में माओवादियों का नाता कुमाऊं क्षेत्र में ज्यादा देखने को मिलता है. राज्य में साल 2004 में पहली बार माओवाद प्रकाश में आया था. उस समय नानक मत्था थाना क्षेत्र के जंगलों में माओवाद का आर्म ट्रेनिंग कैंप की सुचना मिली थी. जिस पर पुलिस ने पहली कार्रवाई की और कैंप को खत्म किया था. इस कार्रवाई के बाद माओवाद अल्मोड़ा, चम्पावत, पिथोरागढ़, नैनीताल और उधमसिंह नगर में सक्रिय हुआ. यहां माओवादियों ने अपना रंग दिखाना शुरू किया, जिन पर 33 मुकदमे अभी तक दर्ज हुए हैं और 24 माओवादियों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है.

माओवादियों पर पुलिस कार्रवाई

साल 2004 में 9 मुकदमे दर्ज हुए.
साल 2005 में 5 मुकदमे दर्ज हुए.
साल 2006 से 2009 तक हर साल 1 मुकदमा
साल 2014 में 6 मुकदमे.
साल 2015 से 2016 तक 2 मुकदमे हर साल
साल 2015 में 5 मुकदमे दर्ज हुए.

खीम सिंह बोरा बरेली से हुआ था गिरफ्तार

इसके साथ ही साल 2006 में जब माओवाद संगठन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुदा था तो जोनल कमेटी खीम सिंह बोरा का राज्य के माओवाद में बड़ा नाम था. इसे जिसको पुलिस ने बरेली से गिरफ्तार किया था.

भाष्कर पांडे था राज्य का अंतिम माओवादी

लंबे समय से फरार चल रहे माओवादी भास्कर पांडे की गिरफ्तारी पूरे उत्तराखंड की पुलिस के लिए बहुत बड़ी चुनौती थी. इस पर 20 हजार का इनाम भी था. भास्कर पांडे पर साल 2017 में चुनाव को प्रभावित करने का आरोप था और भास्कर राज्य में अंतिम माओवादी था. इसे पकड़ने के लिए पुलिस लम्बे समय से तलाश कर रही थी. वहीं पूछताछ में एरिया कमांडर भास्कर का कहना है कि वो राज्य में माओवाद की जड़ों को एक बार फिर मजबूत करने की जिम्मेदारी उस पर थी. पुलिस की मानें तो साल 2022 के चुनाव को प्रभावित करना भी भास्कर पांडे का मकसद था.

डीजीपी अशोक कुमार के अनुसार प्रदेश के सभी माओवादियों को जेल भेज दिया गया है. हाल फिलहाल कोई भी माओवादी राज्य में नहीं है. यानि की माओवाद पर ये राज्य की बड़ी कामयाबी है.

नैनीताल मालरोड जाम पर पुलिस की सख्ती: गाड़ी चलाने और पार्किंग के ये नियम न माने तो कार्रवाई

नैनीताल मालरोड जाम पर पुलिस की सख्ती: गाड़ी चलाने और पार्किंग के ये नियम न माने तो कार्रवाई

Nainital News : डीआईजी नीलेश आनंद ने कहा कि नैनीताल के चौराहों से लेफ्ट ओपन के साथ अतिक्रमण को हटाया जायेगा. सड़कों पर पार्किंग प्रतिबंधित होगी. इसके साथ ही किसी भी वाहन को चार बार एक ही सड़क पर घुमाने की अनुमति नहीं होगी. पार्किंग में भी 7 दिन से अधिक गाड़ी पार्क नहीं की जा सकेगी.

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नैनीताल. नैनीताल (Nainital) शहर को जाम के झाम से निकालने के लिये अब एक और यातायात प्लान पर काम शुरु किया गया है. पुलिस ने नैनीताल शहर की सड़कों पर खड़े वाहनों को हटाने का निर्णय लिया है. इसके लिये डीआईजी नीलेश आनंद (DIG Nilesh Anand) ने दिशा निर्देश भी जारी किए हैं. इसमें सड़कों पर लगने वाले जाम की समस्या को दूर करने के लिए किनारों पर वाहनों की पार्किंग पर सख्ती बरतने की तैयारी है.

सड़क जाम की समस्या पर बातचीत के दौरान डीआईजी ने बताया कि नैनीताल के चौराहों से लेफ्ट ओपन के साथ चौराहों से अतिक्रमण को हटाया जायेगा. साथ ही सड़कों पर पार्किंग बैन किया जायेगा. डीआईजी ने कहा कि पर्यटन सीजन के साथ वीक एंड़ पर पर्यटकों को पार्किंग की सही जानकारी के लिये जीपीएस बारकोड लोकेशन सिस्टम तैयार किया जा रहा है, जिससे वाहन चालक सीधे पार्किंग में जाकर गाड़ियां खड़ी कर सकें. वहीं डीआईजी ने कहा कि किसी भी पार्किंग में 7 दिनों से ज्यादा गाडियों को खड़ा करने की अनुमति नहीं होगी. अगर कोई वाहन 7 दिनों से ज्यादा खड़ी मिली तो उस पर भी पुलिस कार्रवाई करेगी.

नैनीताल में बेवजह घूमने वालों पर होगी कार्रवाई

नैनीताल में गाडियों को बेवजह सड़कों पर घुमाने पर अब कानूनी कार्रवाई भी झेलनी पड़ेगी. डीआईजी नीलेश आनंद ने कहा कि बार बार गाड़ी को सड़क पर घुमाने वालों पर पुलिस की नजर रहेगी. अगर तीन से 4 बार गाड़ी घूमती हुई मिली तो उस पर कार्रवाई की जायेगी. इसके साथ ही डीआईजी ने कहा कि मालरोड पर खास तौर पर पुलिस का फोकस है और यहां किसी भी तरह से वाहनों की पार्किन ही होने दी जायेगी.

डीआईजी ने कहा कि पंत पार्क से भी पार्किंग को हटाने के साथ मालरोड़ में एंट्री करने पर ही गाड़ी मालिक या ड्राइवर को एक पर्चा दिया जायेगा. इसमें पार्किंग के साथ मालरोड में गाड़ी पार्किग करने पर क्या कानूनी कार्रवाई हो सकती है इसकी पूरी जानकारी होगी. अगर इसके बाद भी कोई गाड़ी को मालरोड पर खड़ी करेगा तो उस पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी. डीआईजी ने कहा कि शहर के आस पास छोटे पार्किंग स्थल चिन्हित कर रहे हैं जिससे जनता और पर्यटकों को लाभ मिल सके।

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