IMA के रणबांकुरों ने दिखाया कारगिल में दम, मेजर राजेश सिंह अधिकारी ने छुड़ा दिए थे दुश्‍मनों के छक्‍के

कारगिल वो जंग जिसने देश के इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ दी और जो अब तक की सबसे बड़ी जंग साबित हुई. यूं तो कारगिल की जंग में मातृभूमि की रक्षा में कई वीर योद्दाओं ने अपनी शहादत दी थी, जिनकी कुर्बानी को देश कभी नहीं भुला सकता है.
कारगिल वो जंग जिसने देश के इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ दी और जो अब तक की सबसे बड़ी जंग साबित हुई. यूं तो कारगिल की जंग में मातृभूमि की रक्षा में कई वीर योद्दाओं ने अपनी शहादत दी थी, जिनकी कुर्बानी को देश कभी नहीं भुला सकता है.

कारगिल वो जंग जिसने देश के इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ दी और जो अब तक की सबसे बड़ी जंग साबित हुई. यूं तो कारगिल की जंग में मातृभूमि की रक्षा में कई वीर योद्दाओं ने अपनी शहादत दी थी, जिनकी कुर्बानी को देश कभी नहीं भुला सकता है.

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कारगिल वो जंग जिसने देश के इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ दी और जो अब तक की सबसे बड़ी जंग साबित हुई. यूं तो कारगिल की जंग में मातृभूमि की रक्षा में कई वीर योद्दाओं ने अपनी शहादत दी थी, जिनकी कुर्बानी को देश कभी नहीं भुला सकता है.

कारगिल के इस किले को फतह करने में भारतीय सैन्य अकादमी के रणबांकुरों ने भी अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी. इन्‍हीं में से एक थे मेजर राजेश सिंह अधिकारी जिन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से नवाजा गया.

यूं तो सैनिक बाहुल्य प्रदेश उत्तराखण्ड की रग-रग में देश भक्ति और सेना के प्रति एक अटूट रिश्ता रहा है, लेकिन समय-समय पर यहां के वीर सपूतों ने मातृभूमि की हिफाजत में अपने प्राण तक दांव पर लगा दिए. कारगिल युद्ध के दौरान उत्तराखण्ड के इन वीर योद्धाओं ने अपनी दिलेरी का परिचय देते हुए मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी और हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गए.



इस युद्ध में देवभूमि के 74 जांबाज सैनिक शहीद हुए थे. इन्‍हीं में से एक थे कारगिल शहीद मेजर राजेश सिंह अधिकारी. इनका जन्‍म 25 दिसंबर 1970 को नैनीताल में हुआ था. राजेश की स्‍कूली शिक्षा नैनीताल से ही हुई और कुमाऊं यूनिवर्सिटी से उन्होंने ग्रेजुएशन की. शुरुआत से ही सेना के प्रति राजेश का जो जब्जा था वो उन्हें प्रतिष्ठित भारतीय सैन्य अकादमी में ले आया और 11 दिसंबर 1993 को मेजर राजेश सिंह अधिकारी भारतीय सैन्य अकादमी से ग्रेनेडियर में कमिशन हुए. कारगिल युद्ध अपने चरम पर था.
भारतीय सेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी पहाड़ की ऊंची चोटियों पर बैठे घुसपैठिए जिन्हें पाकिस्तानी सेना की पूरी बैक सपोर्ट थी. तोलोलिंग पर कब्जा करना भारतीय सेना की प्राथमिकता थी, जहां की चोटियों पर बैठकर दुश्मन लगातार हमारी सेना पर हमले कर रहा था और मेन हाईवे को तोड़ने की कोशिशें कर रहा था.

30 मई 1999 को मेजर राजेश सिहं अधिकारी को आदेश मिला कि तोलोलिंग पर कब्जे के लिए आगे की जमीन तैयार की जाए. सामने 15 हजार फीट की ऊंचाई पर बैठा दुश्मन था जो लगातार भारतीय सेना के मूवमेंट पर नजरें टिकाए था. मिशन की ओर आगे बढ़ते हुए मेजर राजेश सिंह अधिकारी को दो बंकर और यूनिवर्सल मशीन गन की चुनौती का सामना करना पड़ा.

मौका गंवाए बिना तत्काल मेजर राजेश सिंह अधिकारी ने दोनों बंकर को रॉकेट लॉन्‍चर की मदद से उलझाए रखा और फौरन बंकर में धावा बोलकर दो घुसपैठियों को मार गिराया. इसके बाद मेजर राजेश सिहं अधिकारी ने मीडियम मशीनगन के जरिए दुश्मन को उलझाए रखा और हमला पार्टी के साथ आगे बढ़ते रहे. शरीर पर गोलियां लगने के बावजूद मेजर राजेश सिहं ने हार नहीं मानी और गंभीर हालात में आगे बढ़ते हुए दूसरे बंकर पर धावा बोलकर एक और घुसपैठिए को मार गिराया.

इसके बाद प्वाइंट 4590 पर कब्जा करने में काफी मदद मिली और यह तोलोलिंग पर कब्जे की एक मजबूत बुनियाद साबित हुई. इस जंग के दौरान मेजर राजेश सिंह अधिकारी शहीद हो गए और उनके बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया.
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