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उत्तराखंड के 13 जिलों के DM को क्वारंटाइन सेंटर में करने होंगे ये तेरह इंतजाम!

 (सांकेतिक तस्वीर)

(सांकेतिक तस्वीर)

प्रदेश के क्वारंटाइन सेंटर्स (Quarantine Center) में खराब इंतजाम की खबरों के बीच नैनीताल हाईकोर्ट (Nainital High Court) के सख्त रुख से अब इन सेंटर्स की हालत ठीक होने की उम्मीद जगी है.

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हल्द्वानी (उत्तराखंड). प्रदेश के क्वारंटाइन सेंटर्स में खराब इंतजाम की खबरों के बीच नैनीताल हाईकोर्ट (Nainital High Court) के सख्त रुख से अब इन सेंटर्स की हालत ठीक होने की उम्मीद जगी है. हाईकोर्ट के रुख को देखते हुए राज्य सरकार (State Government) के आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विभाग​ ने 13 जिलों के डीएम को आदेश जारी किए हैं. इन्हें क्वारंटाइन सेंटर्स को 13 तरह की सुविधाओं से लैस करने को कहा गया है. अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली और हरिद्वार निवासी सच्चिदानंद डबराल की जनहित याचिकाओं (PIL) की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने जिला विधिक प्राधिकरण के सचिवों को निर्देश दिए हैं कि वो क्ववारंटाइन सेंटर्स का दौरा कर इनकी हालत पर रिपोर्ट पेश करें. जिसके बाद सरकारी स्तर पर खलबली मची हुई है.

इस कारण देर रात आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विभाग के सचिव शैलेश बगौली ने​ प्रदेश के सभी डीएम को क्वारंटीन सेंटर्स के अपग्रेडेशन का फरमान सुना डाला. जिसके बाद क्वारंटाइन सेंटर्स में 13 तरह की सुविधाएं विकसित की जाएंगी.

व्यवस्था नंबर 1-
बिजली पानी की व्यवस्था
आपदा प्रबंधनएवं पुनर्वास विभाग के सचिव शैलेश बगौली ने 13 जिलों के जिलाधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि हाईकोर्ट के निर्देश पर सभी क्वारंटाइन सेंटर्स को अपग्रेड किया जाना है. जिसमें सबसे पहले सुनिश्चित करना है कि सेंटर में बिजली और पानी की व्यवस्था हो.

व्यवस्था नंबर 2-
पेयजल
हर क्वारंटीन सेंटर में पेयजल की उपलब्धता किसी भी हाल में होनी चाहिए. ताकि क्वारंटाइन किए गए लोग पीने के पानी के लिए परेशान न हों.

व्यवस्था नंबर 3-
स्वच्छता और नियमित सैनिटाइजेशन
सचिव बगौली ने लिखा है कि क्वारंटीन सेंटर्स में सफाई के साथ रेगुलर सैनिटाइजेशन हो. ताकि संक्रमण की रोकथाम हो सके.

व्यवस्था नंबर 4-
स्वच्छ बिस्तर
क्वारंटाइन किए लोगों को सरकार साफ-सुथरा बिस्तर देगी. ताकि संक्रमण का खतरा न हो.

व्यवस्था नंबर 5-
शौचालय और स्नानागार
दरअसल कई सेंटर्स में शौचालय न होने की खबर सामने आ रही थी. जिससे क्वारंटाइन किए लोगों के सामने अजीब सी मुसीबत थी. इसके अलावा स्नानागार यानी बाथरूम न होने की वजह से महिलाओं को विशेष तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था. ऐसे में जहां ये व्यवस्था नहीं है वहां व्यवस्था करनी होगी.

व्यवस्था नंबर 6-
कम के कम तीन समय का पौष्टिक भोजन
सरकार ने तय किया है कि अब क्वारंटीन किए लोगों को कम से कम तीन समय पौष्टिक भोजन दिया जाएगा.

व्यवस्था नंबर 7-
शिकायत हेतु उच्च अधिकारियों के नंबर
क्वारंटाइन सेंटर्स में रखे गए लोगों के पास जिले के उच्च अधिकारियों के नंबर हों. ताकि दिक्कत होने पर वो अपनी शिकायत दर्ज कर सकें.

व्यवस्था नंबर 8-
नियमित करती चिकित्सीय परामर्श
क्वारंटाइन किए गए लोगों का नियमित चैकअप हो. ताकि पता लग सके कि ये लोग कहीं कोरोना संक्रमण की चपेट में तो नहीं आ रहे.


व्यवस्था नंबर 9-
24 घंटे केयरटेकर की उपलब्धता
क्वारंटाइन सेंटर में 24 घंटे केयर टेकर होना चाहिए. ताकि वहां रहने वाले लोगों का ध्यान रखा जा सके.

व्यवस्था नंबर 10-
क्या करना है और क्या नहीं करना है यह लिखे हुए बोर्ड
सेंटर में यह साफ-साफ लिखा होना चाहिए कि क्वारंटाइन के दौरान आपको क्या करना है और क्या नहीं. ताकि लोग जागरूक हो सकें.

व्यवस्था नंबर 11-
मनोरंजन की व्यवस्था
क्वारंटाइन किए गए लोग 10 से 14 दिन तक बोर न हों. इसलिए सेंटर्स में किसी न किसी तरह के मनोरंजन की व्यवस्था करने का निर्णय हुआ है.

व्यवस्था नंबर 12-
मास्क सैनिटाइजर की उपलब्धता
यहां रहने वाले लोगों को सरकार मास्क और सैनेटाइजर उपलब्ध कराएगी.

व्यवस्था नंबर 13-
सामाजिक दूरी के नियमों का अनुपालन
क्वारंटीन सेंटर्स में इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा कि लोग सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें.





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नैनीताल में फिर लौटी रौनक, शुरू हुए एडवेंचर स्पोर्ट्स, जानिए इस बार क्या है खास

क्लाइंबिंग के लिए आर्टिफिशियल वॉल बनाई गई है.

सरोवर नगरी नैनीताल यहां की झील और वादियों के लिए जितनी मशहूर है, उतने ही मशहूर हैं यहां के एडवेंचर स्पोर्ट्स.

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सरोवर नगरी नैनीताल यहां की झील और वादियों के लिए जितनी मशहूर है, उतने ही मशहूर हैं यहां के एडवेंचर स्पोर्ट्स. नैनीताल के मल्लीताल में माउंटेंनियरिंग क्लब स्थित है. रॉक क्लाइंबिंग के लिए यहां आर्टिफिशिअल वॉल लगाई गई है. यहां लोगों को पूरे सुरक्षा उपकरणों के साथ वॉल क्लाइंबिंग की ट्रेनिंग दी जाती है. इसके साथ ही यहां रेपलिंग, जुमारिंग, फ्लाइंग फॉक्स जैसी एक्टिविटीज भी कराई जाती हैं.

माउंटेंनियरिंग क्लब के सचिव राजेश शाह बताते हैं कि पिछले 2-3 साल से यह जगह पर्यटकों के लिए भी खोल दी गई है, जिससे सैलानियों में भी इसको लेकर काफी इंटरेस्ट देखने को मिल रहा है.

नैनीताल के बारापत्थर में पर्यटकों को हॉर्स राइडिंग करने का मौका मिलता है. बारापत्थर से टिफिन टॉप तक घुड़सवारी करते हुए पहुंचा जा सकता है. सातताल घूमने आ रहे पर्यटक काफी तरह के वॉटर स्पोर्ट्स का लुत्फ उठाते हैं. सैलानी वॉटर क्रॉसिंग और वॉटर जंपिंग करना काफी पसंद करते हैं.

पिता ने एक टूर पर थमा दिया था कैमरा, हुनर से मिली पहचान और मिला 'पद्मश्री' सम्मान

अनूप शाह को 2019 में पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया था.

अनूप शाह ने फोटोग्राफी की कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपने हुनर का लोहा मनवाया है.

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नैनीताल के मशहूर फोटोग्राफरों का जिक्र हो और अनूप शाह का नाम न लिया जाए, ऐसा हरगिज नहीं हो सकता. उन्होंने अपने हुनर के बल पर न सिर्फ उत्तराखंड बल्कि भारत का नाम रोशन किया है. अनूप का जन्म 4 अगस्त, 1949 को हुआ था. उन्हें साल 2019 में पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया. उन्होंने बताया कि जब उन्हें इस सम्मान से नवाजे जाने के बारे में पता चला तो वह हैरान रह गए थे.

अनूप शाह एक किस्सा साझा करते हुए बताते हैं कि एक बार उनके पिता ने यात्रियों के एक दल के साथ उन्हें पिंडारी भेज दिया था. पिता ने उन्हें एक कैमरा दिया. वह कई शानदार तस्वीरों के साथ वापस लौटे तो हर किसी ने उनके इस हुनर को सराहा और फिर अनूप ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

अनूप शाह ने फोटोग्राफी की कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपने हुनर का लोहा मनवाया है. साल 1994 में इंडिया इंटरनेशनल फोटोग्राफिक काउंसिल IIPC ने उन्हें प्लैटिनम ग्रेड अवॉर्ड से नवाजा था. साथ ही वह साल 1990, 1995, 2001 और 2003 से 2005 तक इंडिया के टॉप 10 फोटोग्राफरों की फेहरिस्त में शामिल रहे. एक फोटोग्राफर होने के साथ-साथ अनूप एक माउंटेंनियर और पर्यावरण प्रेमी भी हैं.

भीमताल का अनोखा एक्वेरियम कैफे, यहां जाने के लिए चलानी पड़ती है नाव

एक्वेरियम कैफे भीमताल के बीचोंबीच स्थित है.

भीमताल के लेक हिल व्यू होटल ने प्राधिकरण से इस टापू को लीज पर लिया है.

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भीमताल के बीचोंबीच एक टापू स्थित है. इस टापू पर एक एक्वेरियम मौजूद है, जो लॉकडाउन के चलते बंद हो गया था. अब इस टापू को पर्यटकों के लिए खोल दिया गया है. यहां पहुंचने के लिए नाव की सवारी करनी पड़ती है, जो अपने आप में ही खास है.

भीमताल के लेक हिल व्यू होटल ने प्राधिकरण से इस टापू को लीज पर लिया है. करीब 25 लाख रुपये सालाना के हिसाब से इस टापू को 15 साल के लिए लीज पर लिया गया है.

कोरोना लॉकडाउन के चलते काफी चीजों पर रोक लगाई गई, जिसकी वजह से टापू को भी बंद करना पड़ा था. करीब 2 साल बाद इस टापू को फिर से खोल दिया गया है. इस एक्वेरियम कैफे में कई तरह की मछलियां देखी जा सकती हैं.

बताते चलें कि भीमताल में पर्यटन के क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए यहां मॉडर्न एक्वेरियम बनाया गया. यहां करीब 34 तरह के टैंक हैं, जिसमें फ्रेश वॉटर और मरीन वॉटर टैंक मौजूद हैं. मरीन टैंक में स्टार फिश, नेमो जैसी कई मछलियां आपको आसानी से दिख जाएंगी.

उत्तराखंड हाई कोर्ट का अहम फैसला, जासूसी के आरोपी पाकिस्तानी आबिद अली की 7 साल कैद की सज़ा बरकरार

उत्तराखंड हाई कोर्ट भवन

Uttarakhand News : कथित जासूसी का ये मामला 11 साल पुराना है, जिसमें ट्रायल कोर्ट, अपीली कोर्ट और हाई कोर्ट के दखल से कई मोड़ आते रहे. अब जाकर ट्रायल कोर्ट के फैसले पर उच्च न्यायालय ने मुहर लगाई है.

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नैनीताल. हाईकोर्ट में राज्य सरकार की ओर से आबिद अली उर्फ असद अली उर्फ अजीत सिंह निवासी लाहौर (पाकिस्तान) की रिहाई आदेश के खिलाफ दायर विशेष अपील पर पूर्व में हुई सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था. बुधवार को कोर्ट ने अपना निर्णय सुनाते हुए आबिद अली की सजा को बरकरार रखते हुए गिरफ्तार किए जाने के आदेश जारी किए. मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति श्री रवींद्र मैठाणी की एकलपीठ में की गई. इससे पहले इस केस में निचली ट्रायल कोर्ट ने आरोपी आबिद को 7 साल की सज़ा सुनाई थी, जिसे हाई कोर्ट ने बरकरार रखने के आदेश दिए. वहीं, ट्रायल कोर्ट के फैसले के उलट अपीली कोर्ट ने इस मामले में आरोपी को रिहा करने के आदेश भी दिए थे, जिसमें हाई कोर्ट को चार साल पहले भी दखल देना पड़ा था.

क्या था मामला और इल्ज़ाम?
यह मामला 25 जनवरी 2010 का है, जब हरिद्वार के गंगनहर कोतवाली पुलिस ने आबिद को ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट, विदेश एक्ट और पासपोर्ट एक्ट के तहत थाना कोतवाली रुड़की गंगनहर में गिरफ्तार किया था. आबिद के पास से मेरठ, देहरादून, रुड़की और अन्य सैन्य ठिकानों के नक्शे मिले थे. एक पेन ड्राइव व गोपनीय जानकारियों से जुड़े कई दस्तावेज बरामद हुए थे. पुलिस ने रुड़की के मच्छी मुहल्ला स्थित उसके ठिकाने पर छापा मारा था, तो वहां से बिजली फिटिंग के बोर्ड तथा सीलिंग फैन में छिपाकर रखे गए करीब एक दर्जन सिम बरामद हुए थे. 19 दिसंबर 2012 को निचली कोर्ट ने अभियुक्त को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी, जिसको चुनौती देने के लिए अभियुक्त ने हाई कोर्ट में अपील की थी.

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क्या थी आरोपी की दलील?
अभियुक्त के अधिवक्ता ने कोर्ट में दायर अपील में कहा ​था कि आबिद के पते आदि के बारे में सही तथ्य नहीं लिखे गए, जिस पर अपर जिला जज (द्वितीय) हरिद्वार ने अभियुक्त को बरी करने के आदेश पारित किए थे. इसके बाद जेल अधीक्षक के स्तर से कोर्ट तथा एसएसपी को प्रार्थना पत्र देकर बताया गया कि अभियुक्त विदेशी नागरिक है और इसके लिए उसको रिहा करने से पहले उसका व्यक्तिगत बंधपत्र व अन्य औपचारिकताएं पूरी करनी आवश्यक थीं. अभियोजन पक्ष के मुताबिक एसएसपी द्वारा उक्त मामले में गंभीरता न दिखाते हुए उसे रिहा कर दिया था. राज्य की ओर से उक्त रिहाई आदेश के खिलाफ विशेष अपील 33/2014 दायर की गई. इसके बाद हाई कोर्ट के आदेश पर उसे फिर गिरफ्तार किया गया था.

कुंभ कोरोना टेस्ट फर्जीवाड़ा: कोर्ट से आरोपियों को राहत नहीं, याचिका ने प्रशासन पर खड़े किए सवाल

उत्तराखंड स्थित हाई कोर्ट भवन. (File Photo)

Fake Covid-19 Test Scam : उत्तराखंड में हुए कुंभ मेले के आयोजन के समय फर्जी टेस्ट किए जाने के घोटाले से जुड़ी याचिका की सुनवाई के दौरान आरोपियों ने साफ तौर पर कहा कि जब गड़बड़ी हो रही थी, तब स्वास्थ्य विभाग खामोश क्यों रहा!

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नैनीताल. कुंभ के दौरान कोरोना जांच में फर्जीवाड़े के केस में हाई कोर्ट में सुनवाई जारी है. जस्टिस आरसी खुल्बे की कोर्ट में मंगलवार को कोरोना टेस्टिंग फर्जीवाड़े के मुख्य आरोपी मल्लिका पंत और शरत पंत ने एफआईआर पर गिरफ्तारी पर रोक लगाए जाने व धारा 467 को हटाने की मांग उठाई थी. इस दौरान आरोपियों के वकील ने कोर्ट में दावा किया कि जबकि उन्होंने कोई टेस्ट ही नहीं किए, ऐसे में उनको आरोपी बनाना ठीक नहीं है. मैक्स के दोनों पार्टनरों ने कोर्ट में फिर कहा कि वो सरकार और दोनों लैब्स के बीच सिर्फ मीडियेटर थे. लेकिन कोर्ट ने याचिका पर ही सवाल उठाकर फिलहाल आरोपियों को कोई राहत देने से इनकार कर दिया.

कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील को प्रार्थना पत्र में रिलीफ बिंदु में संशोधन की अनुमति देकर फिर से आवेदन दाखिल करने को कहा. हालांकि सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकार से पूछा कि कोरोना टेस्टिंग के लिए किस किस के बीच एमओयू हुआ था. इस सवाल के जवाब में सरकार ने कोर्ट को बताया कि मैक्स कॉरपोरेट सर्विस और सरकार के बीच एमओयू हुआ, लेकिन बाद में जांच के दौरान पता चला कि मैक्स कॉरपोरेट कंपनी रजिस्टर ही नहीं है. उसने नलवा और लालचंदानी को अपना पार्टनर बताकर ठेका लिया.

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सरकार की सफाई और नलवा लैब की मांग
सरकार ने कोर्ट में जानकारी दी कि आरोपियों ने जांच की रिपोर्ट सरकार के पोर्टल पर भी डाली, जिसमें कई लोग हरिद्वार ही नहीं आये थे और उनकी जांच संबंधी नंबर भी दर्शाए गए. 15 लाख से ज्यादा की धनराशि अब तक इनको जारी की गई और करोड़ों के बिल कंपनी ने दिए. इसके साथ नलवा लैब के मालिक की याचिका पर भी सुनवाई हुई याचिका में नलवा लैब ने कोर्ट से एफआईआर को निरस्त करने की मांग की है. नलवा ने कहा कि उनका इस घोटाले में कोई रोल नहीं फिर भी उन पर एफआईआर दर्ज की गई.

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कुंभ के दौरान कोविड टेस्ट फर्जीवाड़े के मामले में गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग वाली आरोपियों की याचिका पर हाई कोर्ट में सुनवाई चल रही है.

किस याचिका पर हो रही है सुनवाई?
दरअसल हाई कोर्ट के आदेश के बाद हुई जांच में कुंभ में कोरोना टेस्ट में गड़बड़ी होना पाया गया था. जांच के दौरान एक ही मोबाइल नंबर पर कई टेस्टिंग होने की बात सामने आई थी. घोटाला सामने आने के बाद हरिद्वार सीएमओ ने 17 जून 2021 को मुकदमा दर्ज करवाया था. हालांकि उस दौरान हाई कोर्ट ने सभी आरोपियों की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी, लेकिन जांच के दौरान 467 धारा बढ़ने के साथ ही गिरफ्तारी से रोक हट गई. अब फर्जीवाड़े के आरोपी शरत पंत, मल्लिका पंत और नलवा लैब ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर गिरफ्तारी पर रोक व सरकार द्वारा दर्ज मुकदमे को निरस्त करने की मांग की है.

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आरोपियों ने विभाग को ही घेरा
याचिका पर सुनवाई के दौरान कुंभ कोरोना जांच करने वाली मैक्स कॉरपोरेट सर्विसेज़ के मालिक और पार्टनर ने हाई कोर्ट में कहा कि उनकी कंपनी सर्विस प्रोवाइडर है लेकिन कथित कोरोना जांच के दौरान कंपनी का कोई कर्मचारी मौजूद नहीं था. याचिका में यह भी कहा गया कि परीक्षण और डेटा का काम स्थानीय स्वास्थ्य विभाग की निगरानी में किया गया. ‘अगर कोई गड़बड़ी हुई तो कुंभ के दौरान अधिकारी क्यों चुप रहे!’

नैनीताल में खाना-पीना, टैक्सी और होटल सबके रेट बढ़े, घूमने जा रहे हैं तो बढ़ा लें अपना बजट

नैनीताल की फिज़ा का लुत्फ लेते पर्यटक.

Uttarakhand Tourism : उत्तराखंड में कोरोना की मार झेल चुका पर्यटन उद्योग अब महंगाई की मार झेलने पर मजबूर है. नैनीताल में पर्यटन कारोबारियों ने हर चीज के रेट बढ़ा दिए हैं. वो अपनी मजबूरी बता रहे हैं और पर्यटकों के लिए कोई रास्ता नहीं है.

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हल्द्वानी. उत्तराखंड की मशहूर पर्यटन नगरी नैनीताल में घूमना अब पहले से ज्यादा महंगा हो गया है. अगर आप नैनीताल घूमने की प्लानिंग कर रहे हैं, तो आपको अपना बजट बढ़ाना पड़ेगा. नैनीताल के दर्शन कराने वाली टैक्सी से लेकर यहां के होटल, रेस्टोरेंट तक सबने अपनी हर चीज के दाम 25 से 30 फीसदी तक बढ़ा दिए हैं. खाने-पीने, घूमने और मनोरंजन आदि से जुड़े कारोबारियों या सेक्टरों की दलील है कि हर चीज़ महंगी हो चुकी है, लिहाजा उनकी मजबूरी है कि वो भी दरें बढ़ाएं. टैक्सियों के रेट तो तीन चौथाई के हिसाब तक महंगे हो चुके हैं. राहत की बात सिर्फ यही है कि होटल कारोबारियों ने होटल्स के कमरों के रेट अभी नहीं बढ़ाए हैं. वो डिटेल्स जानिए जिनसे आप नैनीताल के लिए अपने बजट को तैयार कर सकते हैं.

पर्यटन कारोबारियों ने नैनीताल के टूर पैकेज का रेट सीधे-सीधे बढ़ा दिया है. कार से नैनीताल घूमने के पहले जहां 1200 रुपये लिए जाते थे, वहीं अब इसके लिए 1500 से 2000 रुपए देने होंगे. कुमाऊं मंडल विकास निगम द्वारा स्नो व्यू रोपवे का चार्ज 230 से बढ़ाकर 300 और केव गार्डन विजिट का चार्ज 60 रुपए से 100 रुपये कर दिया गया है. इसके अलावा होटलों, ढाबों और रेस्टोरेंट में खाने-पीने के दाम 30 से 40 तक बढ़ाए जा चुके हैं.

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नैनीताल में पर्यटन कारोबार से जुड़ी कई चीज़ों के रेट काफी बढ़ चुके हैं.

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टैक्सी के रेट बढ़ाने पर नैनीताल टूर एंड टैक्सी एसोसिएशन के अध्यक्ष नीरज जोशी की दलील है कि पेट्रोल-डीज़ल के रेट काफी बढ़ चुके हैं, लिहाज़ा चार्ज बढ़ाना मजबूरी है. इसी तरह की दलील खाने-पीने का काम करने वाले होटल और रेस्टोरेंट मालिकों की भी है. उनके मुताबिक तेल से लेकर दूध और सिलेंडर तक सब कुछ महंगा है. होटल इंडस्ट्री में खाने-पीने का काम फायदेमंद माना जाता है लेकिन महंगाई के कारण यह काम घाटे का सौदा साबित हो रहा है. इसलिए खाने-पीने की चीज़ों के दाम बढ़ाए गए हैं.

नंदा देवी महोत्सव : मूर्ति विसर्जन पर श्रद्धालुओं को नाव की मुफ्त सवारी कराते हैं नंदलाल

नंदलाल पिछले 40 साल से नाव चला रहे हैं.

नैनीताल के नाव चालक नंदलाल डोला विसर्जन के दिन सभी को झील की सवारी मुफ्त कराते हैं.

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नैनीताल में नंदा देवी महोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है. मां नंदा-सुनंदा के डोला विसर्जन के साथ ही महोत्सव को संपन्न किया जाता है. हजारों की तादाद में भक्त मां नंदा-सुनंदा की मूर्ति के दर्शन के लिए आते हैं और श्रद्धा भाव से मां को विदा करते हैं. वहीं देवी मां के प्रति एक शख्स की श्रद्धा ऐसी भी है, जो सभी को हैरत में डालती है.

नैनीताल के नाव चालक नंदलाल डोला विसर्जन के दिन सभी को झील की सवारी मुफ्त कराते हैं. यहां के लोग उन्हें प्यार से नंद दा बुलाते हैं.

मूल रूप से अल्मोड़ा के रहने वाले नंदलाल 62 साल के हैं. वह पिछले 40 साल से नैनीताल में नाव चला रहे हैं. नंद दा मां नयना देवी के प्रति बेहद श्रद्धा रखते हैं.

करीब 10 साल से वह नंदा देवी महोत्सव में डोला विसर्जन के दिन सुबह से डोला विसर्जित होने तक, भक्तों को फ्री में तल्लीताल से मल्लीताल तक नाव की सवारी कराते हैं.

उनका मानना है कि साल में केवल एक दिन अगर मां नंदा के भक्तों को दे दिया जाए तो कोई हर्ज की बात नहीं. वह कहते हैं कि खाना-कमाना तो रोज ही होता है. माता रानी के नाम पर एक दिन भक्तों की सेवा करने से उन्हें काफी अच्छा महसूस होता है.

नैनीताल : कैलाश मानसरोवर जल के समान है 'नैनी झील का पानी', जानिए वजह

नैनीताल की झील का आकार आम जैसा है.

नैनीताल की खोज करने वाले पीटर बैरन ने 1842 में इस झील में पहली बार नाव चलाई थी.

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उत्तराखंड में वैसे तो बेहद खूबसूरत पर्यटन स्थल हैं लेकिन सरोवर नगरी नैनीताल की बात ही कुछ और है. विदेशी सैलानियों की जुबान पर भी नैनीताल का नाम रहता है. अंग्रेजों ने नैनीताल को छोटी विलायत का दर्जा दिया था. नैनीताल के इतना मशहूर होने की एक वजह यहां स्थित नैनी झील भी है. दूरदराज से पर्यटक इस झील को देखने के लिए आते हैं.

नैनी झील 7 पहाड़ियों- अयारपाटा, देवपाटा, हांडी बांडी, चीना पीक, आल्मा पीक, लड़िया कांटा और शेर का डांडा से घिरी है. नैनीताल की खोज करने वाले पीटर बैरन ने 1842 में इस झील में पहली बार नाव चलाई थी.

सिंचाई विभाग के अधिकारियों ने बताया कि नैनी झील की गहराई करीब 26 मीटर है. इसकी लंबाई करीब 2 किलोमीटर है. यह झील तल्लीताल से मल्लीताल को जोड़ती है. नैनीताल की सबसे ऊंची चोटी नैना पीक से देखने पर इस झील का आकार आम जैसा दिखाई देता है.

नैनीताल आएं तो तिब्बत मार्केट जरूर जाएं, जानिए क्यों मशहूर है ये बाजार?

तिब्बती बाउल मेडिटेशन के काम आता है.

नंदा देवी मंदिर के पास वांगदी आर्ट्स के नाम से एक मशहूर तिब्बती दुकान है.

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नैनीताल में मां नंदा देवी मंदिर के पास स्थित है सरोवर नगरी की सबसे मशहूर तिब्बत मार्केट. नैनीताल आने वाले पर्यटक इस बाजार में भी घूमने जरूर जाते हैं. इस मार्केट को भोटिया बाजार के नाम से भी जाना जाता है. यह मार्केट कपड़ों के लिए काफी मशहूर है. तिब्बती बाजार में बेची जाने वाली कुछ बेहतरीन चीजों में शॉल, मफलर, हिमालयन बैग और तिब्बती हस्तशिल्प शामिल हैं.

नंदा देवी मंदिर के पास वांगदी आर्ट्स के नाम से एक मशहूर तिब्बती दुकान है. वांगदी भूटान के एक छोटे से गांव का नाम है, जो तिब्बती आर्ट के लिए प्रसिद्ध है. गांव के नाम पर ही दुकान का नाम रखा गया है. इस दुकान में नेपाल, तिब्बत, भूटान और म्यांमार से लाई गईं अनेकों खास चीजें बिक्री के लिए उपलब्ध हैं.

दुकान के मालिक मुकेश ने बताया कि करीब 60 से 70 फीसदी चीजें यहां तिब्बत से लाई गई हैं. दुकान में रखा तिब्बती मास्क नजर उतारने के काम आता है. इसके अलावा यहां की मशहूर तिब्बती बाउल पर्यटकों को काफी लुभाती है. मेडिटेशन के लिए इस बाउल का इस्तेमाल किया जाता है.

खाने की बात करें तो नैनीताल के तिब्बत मार्केट में सोनम फास्टफूड की दुकान बेहद मशहूर है. 35 साल से ज्यादा पुरानी यह दुकान मोमो और थुक्पा के लिए जानी जाती हैं. आप यहां किसी भी समय चलें जाएं, हर समय दुकान आपको ग्राहकों से घिरी नजर आएगी.

साल 1880 का वह दिन, जिसने बदल दिया था नैनीताल का नक्शा! 

नैनीताल का DSA मैदान भूस्खलन के बाद बना था.

नैनी झील इस हादसे से पहले वर्तमान के मुकाबले काफी बड़ी हुआ करती थी.

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नैनीताल का मल्लीताल आज जैसा दिखता है, शायद वह कभी वैसा था ही नहीं. 18 सितंबर,1880 का वह दिन नैनीताल के इतिहास में सबसे दर्दनाक दिनों में से एक था, जिसके बारे में लोग आज भी सोचते हैं तो कांप उठते हैं. 1880 में आए उस भूस्खलन ने नैनीताल के लोगों की दुनिया ही बदल दी. 43 ब्रिटिश नागरिकों समेत कुल 151 लोगों ने उस हादसे में अपनी जान गवाई थी.

नैनीताल का डीएसए मैदान, जिसमें आज अलग-अलग खेल खेले जाते हैं, यह भी उसी भूस्खलन की वजह से ही बना था. नैनी झील इस हादसे से पहले वर्तमान के मुकाबले काफी बड़ी हुआ करती थी. नैना देवी मंदिर भी तब वर्तमान के बोट हाउस क्लब में मौजूद था, जो उस भूस्खलन की वजह से वहीं दब गया था. जिसके बाद उस मंदिर को वर्तमान के मौजूदा स्थान पर बनवाया गया.

कुमाऊं विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के प्रोफेसर गिरीश रंजन तिवारी बताते हैं कि उस भूस्खलन की बारीकी को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने नैनीताल की पारिस्थिकी को मजबूत करने के लिए बहुत सारे उपाय किए थे. अंग्रेजों ने बहुत सारे नाले बनवाए, जिससे बरसात का पानी नालों से होकर झील में चला जाए. हिल सेफ्टी को लेकर उन्होंने काफी अलग-अलग कोशिशें भी कीं.

अंग्रेजों के देश छोड़ने के बाद काफी साल तक उस हादसे को ध्यान में रखकर इन सभी प्रोटोकॉल का पालन किया गया, जिस वजह से नैनीताल में इस तरह की त्रासदी की कभी पुनरावृत्ति नहीं हुई है.

Uttarakhand School Reopening: उत्तराखंड में इस तारीख से खुल रहे 5वीं तक के स्कूल, इन नियमों का करना होगा पालन

Uttarakhand School Reopening: उत्तराखंड में 21 सितंबर से फिर से पढ़ाई के लिए खुल रहा कक्षा 5वीं तक का स्कूल.

Uttarakhand  School Reopening: उत्तराखंड में राज्य सरकार ने 5वीं कक्षा तक से स्कूलों को फिर से पढ़ाई के लिए खोलने की अनुमति दे दी है. इस संबंध में राज्य सरकार ने विस्तृत दिशा-निर्देश भी जारी किया है.

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  • LAST UPDATED : September 19, 2021, 09:20 IST
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नई दिल्ली. Uttarakhand School Reopening: कोरोना की दूसरी लहर के कारण बंद किए गए स्कूल अब फिर से पढ़ाई के लिए खुलने लगें हैं. कई राज्यों में स्कूलों को फिर से पढ़ाई के लिए खोल दिया गया है. उत्तराखंड में कक्षा 1 से 5वीं तक के स्कूल फिर से पढ़ाई के (Uttarakhand  School Reopening) लिए 21 सितंबर 2021 से खोले जाएंगे. इस संबंध में राज्य सरकार ने विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं.

बता दें कि राज्य में 16 अगस्त 2021 से कक्षा 6 से 8वीं के स्कूलों को फिर से पढ़ाई लिए खोला जा चुका है. जारी निर्देश के अनुसार स्कूलों में सिर्फ 3 घंटे की कक्षाओं का संचालन किया जाएगा.  इन दौरान ऑनलाइन कक्षाएं जारी रहेगी. यह नियम राज्य के सभी सरकारी और प्राइवेट स्कूलों पर लागू होगा. प्राइवेट स्कूल में 20 सितंबर से पहली से तीसरी कक्षा तक के स्कूल फिर से पढ़ाई के लिए खोल सकते है. स्कूल आने के लिए बच्चों को अपने अभिभावक से लिखित में अनुमति लेनी होगी. इसके बिना वह स्कूल नहीं आ सकते हैं.

Uttarakhand  School Reopening: इन नियमों का करना होगा पालन
-बच्चों को स्कूल आने के लिए अभिभावक से लिखित में अनुमति लेनी होगी.
-स्कूलों में उपस्थिति अनिवार्य नहीं है.
-सभी बच्चों को मास्क लगाकर स्कूल आना अनिवार्य किया गया है.
-स्कूल में कक्षाओं का संचालन केवल 3 घंटे की होगा.
– बच्चें एक दूसरे से लंच बॉक्स नहीं साझा करेंगे.
– सोशल डिस्टेसिंग का पालन सख्ती से पालन करना होगा.
– सभी शिक्षक मास्क लगाकर ही स्कूल आएंगे.

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नैनीताल में पर्यटकों की सबसे पसंदीदा जगह है टिफिन टॉप, कैसे मिला इसे 'डोरोथी सीट' नाम?

टिफिन टॉप पर्यटकों के घूमने के लिए बढ़िया जगह है.

टिफिन टॉप के अलावा इस जगह को डोरोथी सीट के नाम से भी जाना जाता है.

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नैनीताल की हसीन वादियों में घूमने के लिए बहुत कुछ है. यहां पहाड़ों की ऊंची चढ़ाई चढ़ने के बाद अलग-अलग सुंदर नजारे देखने को मिलते हैं. ऐसी ही नैनीताल के अयारपट्टा पहाड़ की एक ऊंची जगह है टिफिन टॉप. इसके नाम में ही इसकी खासियत है. लंबी सी चढ़ाई चढ़ने के बाद यहां कोई भी सुकून से बैठकर अपने टिफिन का आनंद ले सकता है.

टिफिन टॉप नैनीताल शहर से करीब 5 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थित है. यहां पहुंचने के लिए सूखाताल से रास्ता जाता है. रास्ता पूरा पैदल है लेकिन घोड़े की सवारी करके भी यहां पहुंचा जा सकता है. यह करीब 7520 फीट की ऊंचाई पर स्थित है.

टिफिन टॉप की ओर जाते समय रास्ते में जंगलों के बीच में एक छोटा मैदान पड़ता है. स्थानीय लोग बताते हैं कि यहां कभी स्कूल के बच्चे आते थे और खेलने के बाद अपना टिफिन खाते थे, जिस वजह से इस जगह का नाम टिफिन टॉप पड़ गया.

टिफिन टॉप के अलावा इस जगह को डोरोथी सीट के नाम से भी जाना जाता है. कहा जाता है कि इस जगह पर एक अंग्रेज महिला केलेट डोरोथी की हवाई दुर्घटना में मौत हो गई थी, जिसके बाद उनके पति ने इस जगह को यह नाम दिया था.

टिफिन टॉप से राजभवन, नैनीताल का मशहूर सेंट जोसेफ स्कूल और हिमालय पर्वत का सुंदर नजारा भी दिखाई देता है. लॉकडाउन में ढील मिलने के बाद काफी संख्या में सैलानी नैनीताल का रुख कर रहे हैं.

कैसे बांटी जाएं रोडवेज परिसंपत्तियां? UP-उत्तराखंड के बीच नहीं निकला हल, सैलरी के मुद्दे पर HC ने मांगा जवाब

उत्तराखंड रोडवेज कर्मचारियों की सैलरी के मुद्दे पर कोर्ट में सुनवाई चल रही है. (File Photo)

कहते हैं कि दो हाथियों की लड़ाई में घास ही कुचली जाती है. कोर्ट के आदेश पर केंद्र सरकार के दखल के बावजूद दोनों राज्य किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे. देखिए केंद्र ने कैसे कोर्ट को रिपोर्ट दी और कैसे कर्मचारियों का दर्द बरकरार है.

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नैनीताल. हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी उत्तराखंड और यूपी सरकार के बीच रोडवेज परिसम्पत्तियों के बंटवारे पर कोई नतीजा नहीं निकल सका. केंद्र सरकार ने हाई कोर्ट में दोनों राज्यों की बैठक के मिनट्स पेश करते हुए कहा कि बैठक में दोनों राज्य कोई नतीजे पर नहीं पहुंच सके. केंद्र ने कहा कि उत्तराखंड सरकार मार्किट वैल्यू के आधार पर रकम मांग रही है जबकि यूपी सरकार चाहती है कि रोडवेज़ परि​संपत्तियों का बंटवारा भी वैसे ही हो, जैसे दूसरे विभागों का हुआ. केंद्र ने यह भी बताया कि यूपी सरकार की तरफ से उसे सूचना दी गई है कि इस मामले में यूपी ने सुप्रीम कोर्ट में वाद दाखिल किया है. इस उलझन के बीच, रोडवेज़कर्मियों की सैलरी के मामले पर भी कोर्ट ने चिंता दिखाई.

कोर्ट ने उत्तराखंड से कौन से सवाल पूछे?
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार को इस मामले में नोटिस जारी कर​ डिटेल्स मांगे हैं और अब जब तक वाद का निपटारा सुप्रीम कोर्ट से नहीं होगा, तब तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकेगा. वहीं, कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार से पूछा है कि उसकी 700 करोड़ रुपयों की मांग का ठोस आधार क्या है? क्या यूपी से इस बारे में कोई पत्राचार किया गया है? रोडवेज कर्मचारियों की सैलरी पर क्या निर्णय लिया गया? चीफ जस्टिस आर एस चौहान और जस्टिस आलोक कुमार की बेंच में हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कैबिनेट बैठक के फैसले के बारे में जानकारी भी मांगी. अब कोर्ट 7 अक्टूबर को इस मामले पर सुनवाई करेगा.

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नैनीताल स्थित हाई कोर्ट भवन. (File Photo)

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आखिर क्या है पूरी कहानी?
दरअसल, उत्तराखंड हाई कोर्ट रोडवेज़ कर्मचारी यूनियन की याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें संगठन ने मांग की है कि समय पर सैलरी दी जाए. याचिका में कहा गया है कि अगर सैलरी को लेकर वो हड़ताल पर जाते हैं, तो उन पर एस्मा के तहत कार्रवाई की जाती है. याचिका में रोडवेज़ कर्मचारियों ने सरकार की 45 लाख के आसपास की देनदारी और यूपी से परिसम्पत्तियों के 700 करोड़ मिलने की बात उठाई थी. हालांकि पिछली सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया था कि दोनों सरकारों के बीच बैठक करके कोई हल निकाला जाए. अब केंद्र ने दोनों राज्यों के बीच सहमति न बन पाने की बात कोर्ट को बताई.

नैनीताल के चार खेत में लकड़ियों से बनाए जाते हैं अलग अलग डिजाइन 

पाइन कोन डक है काफी मशहूर 

स्थानीय शिल्पकार उमेश चंद्र "कुमाऊँ काष्ठ कला केंद्र " के नाम से स्थानीय लकड़ियां जैसे अखरोट, चिनार, देवदार, चीड़ और बाकी जंगली लकड़ियों का

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नैनीताल में ऐसी अनेकों आकृतियाँ हैं जो पर्यटकों को काफी लुभाती हैं.  इन्हीं में से एक है काष्ठ यानि लकड़ी की कला. लकड़ियों में अलग अलग आकृतियाँ देना एक अद्भुत कला है. नैनीताल नगर की कई सजावट भरी दुकानों पर यह कला देखने को मिलती हैं. लेकिन ऐसी कला के पीछे लगती है मेहनत जिसके बारे में लोगों को कम जानकारी होती है. नैनीताल से करीब  8 किमी. की दूरी पर स्थित है खुर्पताल की एक छोटी सी बसावट, जिसका नाम है चार. यहां स्थानीय शिल्पकार उमेश चंद्र \”कुमाऊँ काष्ठ कला केंद्र \” के नाम से स्थानीय लकड़ियां जैसे अखरोट, चिनार, देवदार, चीड़ और बाकी जंगली लकड़ियों का इस्तेमाल करते हुए लकड़ियों से अलग अलग आकृतियां बनाते हैं और उन्हें बेचते हैं. उमेश चंद्र बताते हैं कि उनको यह काम उनके पिताजी से उन्हें विरासत में मिला है. इस काम को करते हुए करीब 70 से 75 साल हो गए हैं. पूर्वजों से मिली इस विरासत में कला को आधुनिक रूप देने के लिए इनके पिताजी श्री रामलाल को साल 1990 में हाथ से बनाई लकड़ी की गणेश की मूर्ती के लिए उत्तर प्रदेश से प्रादेशिक पुरस्कार मिला. इसकी के साथ लकड़ी से बनाई पशुपतिनाथ मंदिर की आकृति के लिए साल 2016 में सरकार से उत्तराखंड राज्य शिल्प पुरस्कार भी मिला. उमेश ने लकड़ी की इन कलाओं की बारीकीयों को अपने पिता से घर के आंगन में ही सीखा है. स्कूल में पढ़ाई के साथ साथ इस कला में उनकी पकड़ बचपन से ही शुरू हो गई थी. रेत, छीजल, आरी, हथोड़ी से खेलने के शौक ने आज उमेश को काष्ठ कला के क्षेत्र में एक अच्छा काष्ठकार बना दिया है.
यहां लकड़ी के अनेकों प्रकार के नमूने देखने को मिलते हैं. नैनीताल में चलने वाली नाव की आकृति, गणेश की प्रतिमा, मशरुम अगरबत्ती स्टैंड, बुल, खाट,आई लव नैनीताल वाली \’की चेन\’, ओल्ड मैन काफी मशहूर हैं. चीड़ के फलों से बनाई आकृतियां भी यहां देखने को मिलती हैं. चीड़ से बनाया पाइन कोन डक का नमूना भी यहां देखने को मिलता है.
नैनीताल आने जाने वाले पर्यटकों को यह कलाकृतियां काफी आकर्षित करती हुई आई हैं लेकिन लॉकडाउन ने इस कला पर काफी असर डाला है. लॉकडाउन होने से यहां पर्यटकों का आना बंद हुआ तो यहां का व्यवसाय ठप हो गया. लॉकडाउन खुलने से थोड़ी बहुत राहत तो मिली लेकिन लगातार हो रहे भूस्खलन ने फिर से पर्यटकों की संख्या में कमी की है. अगर यूही चलता रहा तो बरसों से चली आ रही यह बेहतरीन काष्ठ कला कहीं विलुप्त ही ना हो जाए.

बच्चों को जब नहीं मिलती कोई किताब, तो याद आते हैं नैनीताल के 'मामू'

मामू की दुकान पर हजारों किताबें उपलब्ध हैं.

मामू ने बताया कि कबाड़ बेचते समय जब भी वह किताबों को कबाड़ में देखते थे तो उन्हें बुरा लगता था.

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नैनीताल व आसपास के जिलों में छात्रों को जब कोई किताब नहीं मिलती तो उन्हें नैनीताल के मामू याद आते हैं. मामू कबाड़ी, बस इतना ही परिचय काफी है. नैनीताल शहर में हर कोई इन्हें इसी नाम से जानता है. मामू किताबें बेचकर ही अपना घर चलाते हैं. वह इस काम को पिछले 30 साल से कर रहे हैं. अगर किसी भी बुक स्टोर में कोई किताब नहीं मिलती तो बच्चे सीधा मामू के पास चले आते हैं.

मामू कबाड़ी का असली नाम राशिद अहमद है. इस नाम से लोग इन्हें बहुत कम ही जानते हैं. राशिद मूल रूप से धामपुर के रहने वाले हैं. छठवीं तक पढ़े राशिद 40 साल पहले धामपुर से नैनीताल आ गए थे और यहां रहकर कबाड़ का काम करने लगे. यहां वह अपनी बहन और भांजों के साथ रहते हैं. राशिद बताते हैं कि भांजों के मामू कहने से बाकी लोग भी उन्हें मामू कहने लगे और आज वह मामू कबाड़ी के नाम से पूरे नैनीताल में मशहूर हैं.

शहर में उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी जब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने थे तो वह इनकी दुकान पर आए थे और इस काम के लिए बधाई दी थी. मामू का कहना है कि कबाड़ बेचते समय जब भी वह किताबों को कबाड़ में देखते थे तो उन्हें बुरा लगता था. जिस वजह से उन्होंने किताबों को बेकार होने के बजाय बच्चों को देना सही समझा.

स्कूल की पढ़ाई कम होने के बावजूद भी मामू को किताबों का सटीक ज्ञान है. कौन सी किताब किस विषय के लिए और किस परीक्षा के लिए होती है, वह इससे अच्छी तरह वाकिफ हैं. यहां पहली कक्षा से लेकर विश्वविद्यालय तक की सभी किताबें मिल जाती हैं. नैनीताल ही नहीं बल्कि हल्द्वानी, अल्मोड़ा, रानीखेत और अन्य जगहों से भी लोग यहां किताब खरीदने आते हैं.

Uttarakhand Chardham Yatra: नैन‍ीताल HC का बड़ा फैसला, चारधाम यात्रा पर लगी रोक हटाई, लेकिन कुछ शर्तें

चार धाम यात्रा से रोक हटी.

बड़ा फैसला देते हुए उत्तराखंड हाई कोर्ट ने चार धाम यात्रा शुरू किए जाने को सशर्त मंज़ूरी दे दी है. जानिए क्यों ढाई महीने से लटका हुआ था यह मामला और किस तरह इस यात्रा के बंद होने से स्थानीय लोगों के सामने भारी संकट की स्थिति थी.

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  • LAST UPDATED : September 16, 2021, 15:44 IST
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नैनीताल. उत्तराखंड से बड़ी खबर आई कि करीब ढाई महीने के गतिरोध के बाद चार धाम यात्रा पर लगी रोक हटा दी गई. अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में हाई कोर्ट ने कुछ प्रतिबंधों के साथ यह रोक हटा दी. 28 जून को हाई कोर्ट ने कोविड 19 संबंधी पर्याप्त इंतज़ाम न होने के कारण उत्तराखंड की इस महत्वपूर्ण तीर्थ यात्रा पर रोक लगाई थी. इसे हटाने के लिए राज्य सरकार लगातार कोशिशें कर रही थी और राज्य में सियासत भी गरमा गई थी. पिछले दिनों सरकार के सुप्रीम कोर्ट से याचिका वापिस लेने के बाद उत्तराखंड हाई कोर्ट में इस मामले पर सुनवाई हो सकी और आज गुरुवार को हाई कोर्ट ने यात्रा के लिए रास्ता साफ कर दिया.

इन शर्तों के साथ मंज़ूरी
हाई कोर्ट के आदेश के मुताबिक बद्रीनाथ धाम में 1200 भक्त या यात्रियों, केदारनाथ धाम में 800, गंगोत्री में 600 और यमुनोत्री धाम में कुल 400 यात्रियों के लिए इजाज़त दी गई है. साथ ही कोर्ट ने प्रत्येक धाम पर पहुंचने वाले हर भक्त या यात्री के लिए कोविड नेगेटिव रिपोर्ट और वैक्सीन के दोनों डोज़ का सर्टिफिकेट भी अनिवार्य किया है. यही नहीं, हाईकोर्ट ने चमोली, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी ज़िलों में ज़रूरत के मुताबिक पुलिस फोर्स लगाने को कहा है. साथ ही निर्देश हैं कि भक्त किसी भी कुंड में स्नान नहीं कर सकेंगे.

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चारधाम यात्रा शुरू करने के लिए 10 सितंबर को सरकार ने कोर्ट से मामले की जल्द सुनवाई किए जाने के लिए आवेदन दिया था, जिस पर कोर्ट ने 16 सितंबर का दिन मुकर्रर किया था. मुख्य न्यायाधीश आरएस चौहान एवं न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ में इस मामले पर हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यात्रा को कोरोना संक्रमण के लिहाज़ से गाइडलाइन फॉलो किए जाने संबंधी सशर्त मंज़ूरी दे दी. इस यात्रा को लेकर मामला कैसे उलझ और भड़क गया था, जानिए.

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हाई कोर्ट ने चार धाम यात्रा पर लगी रोक हटाई.

सरकार चली गई थी सुप्रीम कोर्ट
जून के आखिरी हफ्ते में जब हाई कोर्ट ने सरकार के निर्णय को पलटते हुए चार धाम यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया था, तो उसके बाद उत्तराखंड सरकार सुप्रीम कोर्ट की शरण में पहुंच गई थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिल सकी और इस प्रक्रिया में समय गुज़र गया. समय के साथ कोरोना संक्रमण को लेकर हालात काफी काबू में दिखे और सरकार ने दलील दी कि जीवन पटरी पर लौट रहा है इसलिए यात्रा को मंज़ूरी दी जाना चाहिए. तब हाई कोर्ट ने कहा था कि जब तक याचिका सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है, वह इस मामले में दखल नहीं देगा. इस पर पिछले दिनों प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से एसएलपी वापस ले ली थी.

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कांग्रेसियों ने दी थीं गिरफ्तारियां
चार धाम यात्रा शुरू किए जाने को लेकर प्रदेश में सियासत भी गरमा गई थी. कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने लगातार इस यात्रा को मुद्दा बनाते हुए प्रदेश भर में प्रदर्शन किए थे और हाल में ही पुलिस के साथ झड़प होने के बाद गिरफ्तारियां भी दे दी थीं. कांग्रेस के राज्य स्तरीय नेताओं ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए राज्य सरकार पर आरोप लगाया था कि यात्रा शुरू करवाने को लेकर गंभीरता नहीं दिखाने से स्थानीय लोगों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है. गौरतलब है कि तीन ज़िलों में इस यात्रा की वजह से होने वाले पर्यटन पर ही हज़ारों स्थानीय लोगों का रोज़गार टिका है.

तलवार और ढाल के बिना अधूरा है छोलिया नृत्य, जानिए कैसे 'छल' से मिला ये नाम

इस बार नंदा देवी महोत्सव में 4 छोलिया दलों ने हिस्सा लिया है.

नैनीताल के नंदा देवी महोत्सव में इस बार छोलिया की चार टीम भाग ले रही हैं.

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नैनीताल में नंदा देवी महोत्सव को कोरोना नियमों को ध्यान में रखते हुए धूमधाम से मनाया जा रहा है. ज्योलीकोट से केले के पेड़ को लाकर नैना देवी प्रांगण में मूर्ति निर्माण किया गया. ब्रह्म मुहूर्त में देवी मां की प्राण प्रतिष्ठा करके मूर्तियों को स्थापित किया गया. इस बीच मेले में कुमाऊं का लोक नृत्य छोलिया भी देखने को मिल रहा है.

हाथों में तलवार और ढाल लेकर, रंग-बिरंगे कपड़ों में नृत्य कर रहे कलाकार महोत्सव में चार चांद लगा रहे हैं. यह नृत्य उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र के सरौ, पौणा नृत्य की तरह है. यह नगराज, नरसिंह और पांडव लीलाओं पर आधारित नृत्य है. इसमें नृत्य के जरिए संगीत का आनंद भी लिया जाता है.

नंदा देवी महोत्सव में इस बार छोलिया की चार टीम भाग ले रही हैं. ओखलकांडा, रामगढ़, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा से यह टीम आई हैं. हर दल में करीब 10 से 15 लोगों की टोली मिलकर नृत्य करती है. कहा जाता है कि यह नृत्य करीब डेढ़ से दो हजार साल पुराना है.

नाचने वालों की इस टोली में गाने-बजाने वालों का एक दल अलग से चलता है, जो ढोल, दमाऊ, रणसिंघा, तुरही लेकर साथ-साथ चलते हैं. कलाकारों के नाचने का तरीका कुछ इस तरह होता है कि जैसे वह युद्ध में अपने प्रतिद्वंद्वी के दांव-पेंचों की नकल करते हैं और छल के जरिए अपने दुश्मन को मात देते हैं.

बताया जाता है कि इस वजह से ही इस नृत्य का नाम छोलिया पड़ा था. छोलिया टीम के सदस्यों के कपड़े भी काफी आकर्षक होते हैं. लाल, नीला, हरा और सफेद रंग से बनी इनकी पोशाकें इस नृत्य में चार चांद लगा देती हैं.

नैनीताल का 'बकिंघम पैलेस' है राजभवन, सुल्ताना डाकू से जुड़ा है एक रोचक किस्सा

नैनीताल स्थित राजभवन में कुल 85 कमरे हैं.

नैनीताल स्थित राजभवन को बनाने के लिए स्थानीय पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है.

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भारत में ऐसे बहुत कम राज्य हैं, जहां दो राजभवन स्थित हैं. उत्तराखंड उन्हीं राज्यों में से एक है. यहां दो राजभवन देखने को मिलेंगे. एक देहरादून के त्रिवेणी नगर में मौजूद है और दूसरा है नैनीताल के तल्लीताल में. नैनीताल के राजभवन की बात करें तो यह पर्यटकों के घूमने के लिए काफी अच्छी जगह है. टिकट लेकर अंदर जा सकते हैं.

राजभवन घूमने जाने वाले पर्यटकों के साथ एक गाइड को भेजा जाता है. अंदर जाते ही बाईं तरफ एक पुलिस सुरक्षा भवन है. यहां बॉलीवुड की सुपरहिट फिल्म कोई मिल गया की शूटिंग हुई थी.

बताते चलें कि यह राजभवन स्कॉटिश गौथिक शैली का बना है. इसके डिजाइनर अर्किटेक्ट स्टीवेंस और अधिशासी अभियंता एफ.ओ. डब्ल्यू औरेटेल थे. राजभवन का आर्किटेक्चर लंदन के बकिंघम पैलेस से मिलता-जुलता है.

इतिहासकार अजय रावत बताते हैं कि इस राजभवन को बनाने के लिए स्थानीय पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है. स्थानीय पत्थरों की वजह से नैनीताल का राजभवन गौथिक शैली का बना हुआ है. इसकी खासियत यह है कि यह अपने बैकग्राउंड से काफी मिलता है.

राजभवन में कुल 85 कमरे हैं, जिसमें 13 बेडरूम हैं. राजभवन के अंदर ब्रिटिश जमाने के मेंडल्स देखने को मिलेंगे. भीतर सुल्ताना डाकू के कई औजार भी रखे हुए हैं. वहीं अंग्रेजों के जमाने का एक पियानो भी अंदर मौजूद है, जो उनकी आखिरी विरासत है.

नैनीताल : छोटी सी उम्र में किया बड़ा कमाल, 13 साल के लड़के ने लिख दी नॉवेल

नॉवेल के साथ विपुल जोशी.

नैनीताल के सेंट जोसेफ स्कूल में पढ़ने वाले 8वीं के छात्र विपुल जोशी ने एक नॉवेल लिखी है.

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नैनीताल के एक लड़के ने कम उम्र में बड़ा कमाल कर दिखाया है. सेंट जोसेफ स्कूल में पढ़ने वाले 8वीं के छात्र विपुल जोशी ने एक नॉवेल लिख दी है, जिसका नाम है \’गेरीज एडवेंचर द एलिक्सजिर ऑफ इम्मोरटालिटी\’. यह नॉवेल 19 साल के एक बच्चे पर आधारित है.

इस नॉवेल में जादुई दुनिया, दोस्ती, धोखाधड़ी, एडवेंचर से जुड़ी कहानी पढ़ने को मिलेगी. विपुल ने यह नॉवेल लॉकडाउन के दौरान लिखी थी. विपुल को कविताएं लिखने का भी शौक है. उनकी लिखी एक कविता इस नॉवेल में भी पढ़ने को मिलेगी.

नैनीताल : केले के पेड़ से ही क्यों बनाई जाती है मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमा?

स्थानीय कलाकार मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमा को सजाते हैं.

मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमा बनाने के लिए नैनीताल के ज्योलीकोट से केले के पेड़ लाए गए.

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नैनीताल में कोरोना नियमों को ध्यान में रखते हुए नंदा देवी महोत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है. हर साल भद्रमास की पंचमी से यह मेला शुरू होता है. मेले के दौरान मां नंदा-सुनंदा का पूजन होता है. केले के पेड़ से उनकी प्रतिमाएं बनाई जाती हैं और स्थानीय कलाकारों द्वारा उनका श्रृंगार किया जाता है.

मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमा बनाने के लिए नैनीताल के ज्योलीकोट से केले के पेड़ लाए गए. मूर्तियां बनाने के लिए केले के पेड़ का ही इस्तेमाल क्यों किया जाता है, इसके पीछे स्थानीय लोगों की अलग-अलग मान्यताएं हैं.

उन्होंने बताया कि नंदा-सुनंदा दो बहनें थीं. जब वे अपने ससुराल जा रही थीं, तब एक भैंसा उनके पीछे दौड़ने लगा. दोनों अपनी जान बचाने के लिए केले के खेत में छिप गईं. एक बकरे ने केले के पत्ते खा लिए और भैंसे ने केले के खेत में उनकी हत्या कर दी.

इसी वजह से केले के पेड़ से ही मां नंदा-सुनंदा की मूर्ति बनाने की रवायत चली आ रही है. दूसरी ओर कई साल से मेले के दौरान बकरे की बलि की प्रथा भी चली आ रही थी लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इस पर रोक जारी है.

कुछ लोगों का मानना है कि केला एक पवित्र पेड़ है. देश में केले को धार्मिक रूप में काफी महत्वता दी गई है, जिस वजह से इसे मूर्ति के निर्माण में लाया जाता है.

देवी मां की प्रतिमा बनाने के लिए केले के पेड़, रुई और बांस की लकड़ी इस्तेमाल में लाई जाती है. मूर्ति निर्माण के संयोजक चंद्र प्रकाश शाह बताते हैं कि इन्हें बनाने के लिए सभी प्राकृतिक चीजों का प्रयोग किया जाता है. यहां तक रंग भी नैचुरल इस्तेमाल किए जाते हैं.

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