नैनीताल में 24 घंटे से धधक रहे हैं जंगल, तेजी से फैल रही आग में लाखों की वन संपदा नष्ट

नैनीताल के जंगलों में आग से लाखों का नुकसान.

नैनीताल के जंगलों में आग से लाखों का नुकसान.

उत्तराखंड सरकार ने जंगल की आग बुझाने के लिए 10000 वन प्रहरियों की नियुक्ति का फैसला लिया है, लेकिन पिछले 24 घंटों से अधिक समय से नैनीताल की पहाड़ियों पर जंगल में लगी आग बुझाने का इंतजाम अभी तक नहीं हो सका है.

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नैनीताल. एक दिन पहले ही उत्तराखंड सरकार ने प्रदेश के जंगलों को आग से बचाने के लिए 10000 वन प्रहरियों की तैनाती का फैसला लिया. गर्मी का मौसम आने से पहले सरकार सभी इंतजाम कर लेना चाहती है, लेकिन नैनीताल वन प्रभाग कोसी रेंज के जंगल आग से धधक रहे हैं. पिछले 24 घंटे से अधिक समय से जंगलों में आग लगी हुई है, लेकिन शिकायत के बाद भी वन विभाग की टीम मौके पर नहीं पहुंच सकी है. तेजी से फैल रही आग से लाखों की वन संपदा जलकर राख हो चुकी है, वन्य जीवों पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं. इसके बावजूद वन विभाग इस आग को बुझाने के लिए कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है.

प्रदेश के गढ़वाल और कुमाऊं मंडल के जंगल एक बार फिर आग की चपेट में हैं. जंगल की आग विकराल रूप धारण करती जा रही है. इस आग की वजह से एक तरफ जहां वन संपदा और वन्यजीवों को नुकसान पहुंच रहा है, वहीं इंसान भी अछूते नहीं हैं. वन विभाग की रिपोर्ट की मानें तो जंगल की आग के कारण अभी तक 4 लोगों की जान जा चुकी है. इस साल अब तक जंगल में आग लगने की 657 घटनाओं के बाद भी वन विभाग या सरकार अब तक सचेत नहीं हुए हैं. जानकारी के मुताबिक जंगल की आग से इस वर्ष 814 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली वन संपदाएं प्रभावित हुई हैं. गौर करने की बात यह है कि आग से प्रभावित 39 हेक्टेयर का क्षेत्र ऐसा है, जहां हाल ही में पौधरोपण किया गया था.

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जंगल में आग लगने से आर्थिक घाटे की अगर बात की जाए तो इस साल 28 लाख रुपए का नुकसान हो चुका है. जंगल में आग लगने की घटनाएं सबसे ज्यादा गढ़वाल मंडल में सामने आई हैं. इस क्षेत्र में आग लगने की 232 घटनाएं हुई हैं, जबकि कुमाऊं रीजन में अभी तक जंगल में आग की 152 घटनाएं दर्ज की गई हैं. जंगल में आग लगने से संरक्षित वन्यजीवों को भी नुकसान पहुंचने की बातें सामने आ रही हैं. वन विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक संरक्षित अभयारण्यों में आग लगने की 9 घटनाएं अब तक हुई हैं. अगर जल्द ही प्रदेश सरकार ने जंगल में आग लगने की घटनाओं के रोकथाम की कोशिश नहीं की, तो हरे-भरे उत्तराखंड को खतरा हो सकता है.
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