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तलवार और ढाल के बिना अधूरा है छोलिया नृत्य, जानिए कैसे 'छल' से मिला ये नाम

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इस बार नंदा देवी महोत्सव में 4 छोलिया दलों ने हिस्सा लिया है.

नैनीताल के नंदा देवी महोत्सव में इस बार छोलिया की चार टीम भाग ले रही हैं.

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    नैनीताल में नंदा देवी महोत्सव को कोरोना नियमों को ध्यान में रखते हुए धूमधाम से मनाया जा रहा है. ज्योलीकोट से केले के पेड़ को लाकर नैना देवी प्रांगण में मूर्ति निर्माण किया गया. ब्रह्म मुहूर्त में देवी मां की प्राण प्रतिष्ठा करके मूर्तियों को स्थापित किया गया. इस बीच मेले में कुमाऊं का लोक नृत्य छोलिया भी देखने को मिल रहा है.

    हाथों में तलवार और ढाल लेकर, रंग-बिरंगे कपड़ों में नृत्य कर रहे कलाकार महोत्सव में चार चांद लगा रहे हैं. यह नृत्य उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र के सरौ, पौणा नृत्य की तरह है. यह नगराज, नरसिंह और पांडव लीलाओं पर आधारित नृत्य है. इसमें नृत्य के जरिए संगीत का आनंद भी लिया जाता है.

    नंदा देवी महोत्सव में इस बार छोलिया की चार टीम भाग ले रही हैं. ओखलकांडा, रामगढ़, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा से यह टीम आई हैं. हर दल में करीब 10 से 15 लोगों की टोली मिलकर नृत्य करती है. कहा जाता है कि यह नृत्य करीब डेढ़ से दो हजार साल पुराना है.

    नाचने वालों की इस टोली में गाने-बजाने वालों का एक दल अलग से चलता है, जो ढोल, दमाऊ, रणसिंघा, तुरही लेकर साथ-साथ चलते हैं. कलाकारों के नाचने का तरीका कुछ इस तरह होता है कि जैसे वह युद्ध में अपने प्रतिद्वंद्वी के दांव-पेंचों की नकल करते हैं और छल के जरिए अपने दुश्मन को मात देते हैं.

    बताया जाता है कि इस वजह से ही इस नृत्य का नाम छोलिया पड़ा था. छोलिया टीम के सदस्यों के कपड़े भी काफी आकर्षक होते हैं. लाल, नीला, हरा और सफेद रंग से बनी इनकी पोशाकें इस नृत्य में चार चांद लगा देती हैं.

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