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नैनीताल: RTPCR रिपोर्ट का नहीं दिखा असर, पर्यटन स्थलों पर भीड़ में नहीं आई कोई कमी

RTPCR रिपोर्ट चेक करती पुलिस.

RTPCR रिपोर्ट चेक करती पुलिस.

नैनीताल आने वाले पर्यटकों के लिए RTPCR रिपोर्ट जरूरी कर दी गई है. साथ ही होटल बुकिंग होने पर ही शहर में वाहनों को एंट्री दी जा रही है.

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नैनीताल. नैनीताल पुलिस (Nainital Police) की नई व्यवस्था से इस वीकएंड पर जाम से राहत मिली है. शहर से बाहर वाहनों को पार्क करने व अलग- अलग रूट तय करने के बाद शहर में दिक्कतें कम हुई हैं. हालांकि, इस दौरान पर्यटकों को थोड़ी परेशानी जरूर हुई, लेकिन आम शहरी को जाम से राहत मिल सकी है. आपको बता दें कि नैनीताल आने वाले पर्यटकों के लिए RTPCR रिपोर्ट जरूरी कर दी गई है. साथ ही होटल बुकिंग (Hotel Booking) होने पर ही शहर में वाहनों को एंट्री दी जा रही है. वहीं, नैनीताल, भवाली और भीमताल जाने के लिए वाहनों पर भी अलग- अलग स्टीकर जिले के बॉर्डर पर ही लगा दिए जा रहे हैं, जिससे सड़कों पर जाम कम लग रहा है. हालांकि, इसके बाद भी पर्यटन स्थलों पर लोगों की काफी भीड़ दिखी. इस दौरान सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन भी नहीं दिखा. हालांकि, पुलिस आगे भी इसी प्लान से शहर को जाम मुक्त करने की बात कह रही है.

तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि पुलिस गाड़ियों पर नैनिताल का स्टीकर लगा रही है. साथ ही चेकिंग भी कर रही है. पुलिस द्वारा लगातार ट्रैफिक को लेकर अनाउंस किया जा रहा है. वहीं, एक ट्यूरिस्ट ने बताया कि पुलिस परेशान कर रही है. हम फरीदाबाद से सुबह के आये हैं. जबकि, पुलिस का कहना है कि जिनके पास आरटीपीसीआर नहीं है और होटल में बुकिंग नहीं है, उन्हें वापिस भेजा जा रहा है.



हाईकोर्ट ने लगाई थी फटकार
दरअसल, 7 जुलाई को हाईकोर्ट ने पर्यटन स्थलों में भीड़ को लेकर सरकार को जमकर फटकार लगाई थी. इसके बाद राज्य के मुख्य सचिव ने भी सभी जिलों के डीएम और कमिश्नों को कोरोना नियमों का पालन करने के निर्देश दिए थे. हांलाकि, इसके बाद भी पिछले दो दिनों में नैनीताल में इन नियमों का खुला उल्लंघन देखा गया तो मालरोड़ समेत अन्य स्थानों पर मास्क सोशल डिस्टेंस और सेनेटाइजर का छिड़काव नहीं होना साफ दिखा. पर्यटक बेरोकटोक शहर में एंट्री कर रहे थे. हालांकि अब सरकार ने भी पर्यटन स्थलों को लेकर सख्ती दिखानी शुरु कर दी है.

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नैनीताल में पर्यटकों की सबसे पसंदीदा जगह है टिफिन टॉप, कैसे मिला इसे 'डोरोथी सीट' नाम?

टिफिन टॉप पर्यटकों के घूमने के लिए बढ़िया जगह है.

टिफिन टॉप के अलावा इस जगह को डोरोथी सीट के नाम से भी जाना जाता है.

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नैनीताल की हसीन वादियों में घूमने के लिए बहुत कुछ है. यहां पहाड़ों की ऊंची चढ़ाई चढ़ने के बाद अलग-अलग सुंदर नजारे देखने को मिलते हैं. ऐसी ही नैनीताल के अयारपट्टा पहाड़ की एक ऊंची जगह है टिफिन टॉप. इसके नाम में ही इसकी खासियत है. लंबी सी चढ़ाई चढ़ने के बाद यहां कोई भी सुकून से बैठकर अपने टिफिन का आनंद ले सकता है.

टिफिन टॉप नैनीताल शहर से करीब 5 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थित है. यहां पहुंचने के लिए सूखाताल से रास्ता जाता है. रास्ता पूरा पैदल है लेकिन घोड़े की सवारी करके भी यहां पहुंचा जा सकता है. यह करीब 7520 फीट की ऊंचाई पर स्थित है.

टिफिन टॉप की ओर जाते समय रास्ते में जंगलों के बीच में एक छोटा मैदान पड़ता है. स्थानीय लोग बताते हैं कि यहां कभी स्कूल के बच्चे आते थे और खेलने के बाद अपना टिफिन खाते थे, जिस वजह से इस जगह का नाम टिफिन टॉप पड़ गया.

टिफिन टॉप के अलावा इस जगह को डोरोथी सीट के नाम से भी जाना जाता है. कहा जाता है कि इस जगह पर एक अंग्रेज महिला केलेट डोरोथी की हवाई दुर्घटना में मौत हो गई थी, जिसके बाद उनके पति ने इस जगह को यह नाम दिया था.

टिफिन टॉप से राजभवन, नैनीताल का मशहूर सेंट जोसेफ स्कूल और हिमालय पर्वत का सुंदर नजारा भी दिखाई देता है. लॉकडाउन में ढील मिलने के बाद काफी संख्या में सैलानी नैनीताल का रुख कर रहे हैं.

कैसे बांटी जाएं रोडवेज परिसंपत्तियां? UP-उत्तराखंड के बीच नहीं निकला हल, सैलरी के मुद्दे पर HC ने मांगा जवाब

उत्तराखंड रोडवेज कर्मचारियों की सैलरी के मुद्दे पर कोर्ट में सुनवाई चल रही है. (File Photo)

कहते हैं कि दो हाथियों की लड़ाई में घास ही कुचली जाती है. कोर्ट के आदेश पर केंद्र सरकार के दखल के बावजूद दोनों राज्य किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे. देखिए केंद्र ने कैसे कोर्ट को रिपोर्ट दी और कैसे कर्मचारियों का दर्द बरकरार है.

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नैनीताल. हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी उत्तराखंड और यूपी सरकार के बीच रोडवेज परिसम्पत्तियों के बंटवारे पर कोई नतीजा नहीं निकल सका. केंद्र सरकार ने हाई कोर्ट में दोनों राज्यों की बैठक के मिनट्स पेश करते हुए कहा कि बैठक में दोनों राज्य कोई नतीजे पर नहीं पहुंच सके. केंद्र ने कहा कि उत्तराखंड सरकार मार्किट वैल्यू के आधार पर रकम मांग रही है जबकि यूपी सरकार चाहती है कि रोडवेज़ परि​संपत्तियों का बंटवारा भी वैसे ही हो, जैसे दूसरे विभागों का हुआ. केंद्र ने यह भी बताया कि यूपी सरकार की तरफ से उसे सूचना दी गई है कि इस मामले में यूपी ने सुप्रीम कोर्ट में वाद दाखिल किया है. इस उलझन के बीच, रोडवेज़कर्मियों की सैलरी के मामले पर भी कोर्ट ने चिंता दिखाई.

कोर्ट ने उत्तराखंड से कौन से सवाल पूछे?
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार को इस मामले में नोटिस जारी कर​ डिटेल्स मांगे हैं और अब जब तक वाद का निपटारा सुप्रीम कोर्ट से नहीं होगा, तब तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकेगा. वहीं, कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार से पूछा है कि उसकी 700 करोड़ रुपयों की मांग का ठोस आधार क्या है? क्या यूपी से इस बारे में कोई पत्राचार किया गया है? रोडवेज कर्मचारियों की सैलरी पर क्या निर्णय लिया गया? चीफ जस्टिस आर एस चौहान और जस्टिस आलोक कुमार की बेंच में हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कैबिनेट बैठक के फैसले के बारे में जानकारी भी मांगी. अब कोर्ट 7 अक्टूबर को इस मामले पर सुनवाई करेगा.

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नैनीताल स्थित हाई कोर्ट भवन. (File Photo)

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आखिर क्या है पूरी कहानी?
दरअसल, उत्तराखंड हाई कोर्ट रोडवेज़ कर्मचारी यूनियन की याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें संगठन ने मांग की है कि समय पर सैलरी दी जाए. याचिका में कहा गया है कि अगर सैलरी को लेकर वो हड़ताल पर जाते हैं, तो उन पर एस्मा के तहत कार्रवाई की जाती है. याचिका में रोडवेज़ कर्मचारियों ने सरकार की 45 लाख के आसपास की देनदारी और यूपी से परिसम्पत्तियों के 700 करोड़ मिलने की बात उठाई थी. हालांकि पिछली सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया था कि दोनों सरकारों के बीच बैठक करके कोई हल निकाला जाए. अब केंद्र ने दोनों राज्यों के बीच सहमति न बन पाने की बात कोर्ट को बताई.

नैनीताल के चार खेत में लकड़ियों से बनाए जाते हैं अलग अलग डिजाइन 

पाइन कोन डक है काफी मशहूर 

स्थानीय शिल्पकार उमेश चंद्र "कुमाऊँ काष्ठ कला केंद्र " के नाम से स्थानीय लकड़ियां जैसे अखरोट, चिनार, देवदार, चीड़ और बाकी जंगली लकड़ियों का

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नैनीताल में ऐसी अनेकों आकृतियाँ हैं जो पर्यटकों को काफी लुभाती हैं.  इन्हीं में से एक है काष्ठ यानि लकड़ी की कला. लकड़ियों में अलग अलग आकृतियाँ देना एक अद्भुत कला है. नैनीताल नगर की कई सजावट भरी दुकानों पर यह कला देखने को मिलती हैं. लेकिन ऐसी कला के पीछे लगती है मेहनत जिसके बारे में लोगों को कम जानकारी होती है. नैनीताल से करीब  8 किमी. की दूरी पर स्थित है खुर्पताल की एक छोटी सी बसावट, जिसका नाम है चार. यहां स्थानीय शिल्पकार उमेश चंद्र \”कुमाऊँ काष्ठ कला केंद्र \” के नाम से स्थानीय लकड़ियां जैसे अखरोट, चिनार, देवदार, चीड़ और बाकी जंगली लकड़ियों का इस्तेमाल करते हुए लकड़ियों से अलग अलग आकृतियां बनाते हैं और उन्हें बेचते हैं. उमेश चंद्र बताते हैं कि उनको यह काम उनके पिताजी से उन्हें विरासत में मिला है. इस काम को करते हुए करीब 70 से 75 साल हो गए हैं. पूर्वजों से मिली इस विरासत में कला को आधुनिक रूप देने के लिए इनके पिताजी श्री रामलाल को साल 1990 में हाथ से बनाई लकड़ी की गणेश की मूर्ती के लिए उत्तर प्रदेश से प्रादेशिक पुरस्कार मिला. इसकी के साथ लकड़ी से बनाई पशुपतिनाथ मंदिर की आकृति के लिए साल 2016 में सरकार से उत्तराखंड राज्य शिल्प पुरस्कार भी मिला. उमेश ने लकड़ी की इन कलाओं की बारीकीयों को अपने पिता से घर के आंगन में ही सीखा है. स्कूल में पढ़ाई के साथ साथ इस कला में उनकी पकड़ बचपन से ही शुरू हो गई थी. रेत, छीजल, आरी, हथोड़ी से खेलने के शौक ने आज उमेश को काष्ठ कला के क्षेत्र में एक अच्छा काष्ठकार बना दिया है.
यहां लकड़ी के अनेकों प्रकार के नमूने देखने को मिलते हैं. नैनीताल में चलने वाली नाव की आकृति, गणेश की प्रतिमा, मशरुम अगरबत्ती स्टैंड, बुल, खाट,आई लव नैनीताल वाली \’की चेन\’, ओल्ड मैन काफी मशहूर हैं. चीड़ के फलों से बनाई आकृतियां भी यहां देखने को मिलती हैं. चीड़ से बनाया पाइन कोन डक का नमूना भी यहां देखने को मिलता है.
नैनीताल आने जाने वाले पर्यटकों को यह कलाकृतियां काफी आकर्षित करती हुई आई हैं लेकिन लॉकडाउन ने इस कला पर काफी असर डाला है. लॉकडाउन होने से यहां पर्यटकों का आना बंद हुआ तो यहां का व्यवसाय ठप हो गया. लॉकडाउन खुलने से थोड़ी बहुत राहत तो मिली लेकिन लगातार हो रहे भूस्खलन ने फिर से पर्यटकों की संख्या में कमी की है. अगर यूही चलता रहा तो बरसों से चली आ रही यह बेहतरीन काष्ठ कला कहीं विलुप्त ही ना हो जाए.

बच्चों को जब नहीं मिलती कोई किताब, तो याद आते हैं नैनीताल के 'मामू'

मामू की दुकान पर हजारों किताबें उपलब्ध हैं.

मामू ने बताया कि कबाड़ बेचते समय जब भी वह किताबों को कबाड़ में देखते थे तो उन्हें बुरा लगता था.

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नैनीताल व आसपास के जिलों में छात्रों को जब कोई किताब नहीं मिलती तो उन्हें नैनीताल के मामू याद आते हैं. मामू कबाड़ी, बस इतना ही परिचय काफी है. नैनीताल शहर में हर कोई इन्हें इसी नाम से जानता है. मामू किताबें बेचकर ही अपना घर चलाते हैं. वह इस काम को पिछले 30 साल से कर रहे हैं. अगर किसी भी बुक स्टोर में कोई किताब नहीं मिलती तो बच्चे सीधा मामू के पास चले आते हैं.

मामू कबाड़ी का असली नाम राशिद अहमद है. इस नाम से लोग इन्हें बहुत कम ही जानते हैं. राशिद मूल रूप से धामपुर के रहने वाले हैं. छठवीं तक पढ़े राशिद 40 साल पहले धामपुर से नैनीताल आ गए थे और यहां रहकर कबाड़ का काम करने लगे. यहां वह अपनी बहन और भांजों के साथ रहते हैं. राशिद बताते हैं कि भांजों के मामू कहने से बाकी लोग भी उन्हें मामू कहने लगे और आज वह मामू कबाड़ी के नाम से पूरे नैनीताल में मशहूर हैं.

शहर में उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी जब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने थे तो वह इनकी दुकान पर आए थे और इस काम के लिए बधाई दी थी. मामू का कहना है कि कबाड़ बेचते समय जब भी वह किताबों को कबाड़ में देखते थे तो उन्हें बुरा लगता था. जिस वजह से उन्होंने किताबों को बेकार होने के बजाय बच्चों को देना सही समझा.

स्कूल की पढ़ाई कम होने के बावजूद भी मामू को किताबों का सटीक ज्ञान है. कौन सी किताब किस विषय के लिए और किस परीक्षा के लिए होती है, वह इससे अच्छी तरह वाकिफ हैं. यहां पहली कक्षा से लेकर विश्वविद्यालय तक की सभी किताबें मिल जाती हैं. नैनीताल ही नहीं बल्कि हल्द्वानी, अल्मोड़ा, रानीखेत और अन्य जगहों से भी लोग यहां किताब खरीदने आते हैं.

Uttarakhand Chardham Yatra: नैन‍ीताल HC का बड़ा फैसला, चारधाम यात्रा पर लगी रोक हटाई, लेकिन कुछ शर्तें

चार धाम यात्रा से रोक हटी.

बड़ा फैसला देते हुए उत्तराखंड हाई कोर्ट ने चार धाम यात्रा शुरू किए जाने को सशर्त मंज़ूरी दे दी है. जानिए क्यों ढाई महीने से लटका हुआ था यह मामला और किस तरह इस यात्रा के बंद होने से स्थानीय लोगों के सामने भारी संकट की स्थिति थी.

  • News18Hindi
  • LAST UPDATED : September 16, 2021, 15:44 IST
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नैनीताल. उत्तराखंड से बड़ी खबर आई कि करीब ढाई महीने के गतिरोध के बाद चार धाम यात्रा पर लगी रोक हटा दी गई. अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में हाई कोर्ट ने कुछ प्रतिबंधों के साथ यह रोक हटा दी. 28 जून को हाई कोर्ट ने कोविड 19 संबंधी पर्याप्त इंतज़ाम न होने के कारण उत्तराखंड की इस महत्वपूर्ण तीर्थ यात्रा पर रोक लगाई थी. इसे हटाने के लिए राज्य सरकार लगातार कोशिशें कर रही थी और राज्य में सियासत भी गरमा गई थी. पिछले दिनों सरकार के सुप्रीम कोर्ट से याचिका वापिस लेने के बाद उत्तराखंड हाई कोर्ट में इस मामले पर सुनवाई हो सकी और आज गुरुवार को हाई कोर्ट ने यात्रा के लिए रास्ता साफ कर दिया.

इन शर्तों के साथ मंज़ूरी
हाई कोर्ट के आदेश के मुताबिक बद्रीनाथ धाम में 1200 भक्त या यात्रियों, केदारनाथ धाम में 800, गंगोत्री में 600 और यमुनोत्री धाम में कुल 400 यात्रियों के लिए इजाज़त दी गई है. साथ ही कोर्ट ने प्रत्येक धाम पर पहुंचने वाले हर भक्त या यात्री के लिए कोविड नेगेटिव रिपोर्ट और वैक्सीन के दोनों डोज़ का सर्टिफिकेट भी अनिवार्य किया है. यही नहीं, हाईकोर्ट ने चमोली, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी ज़िलों में ज़रूरत के मुताबिक पुलिस फोर्स लगाने को कहा है. साथ ही निर्देश हैं कि भक्त किसी भी कुंड में स्नान नहीं कर सकेंगे.

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चारधाम यात्रा शुरू करने के लिए 10 सितंबर को सरकार ने कोर्ट से मामले की जल्द सुनवाई किए जाने के लिए आवेदन दिया था, जिस पर कोर्ट ने 16 सितंबर का दिन मुकर्रर किया था. मुख्य न्यायाधीश आरएस चौहान एवं न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ में इस मामले पर हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यात्रा को कोरोना संक्रमण के लिहाज़ से गाइडलाइन फॉलो किए जाने संबंधी सशर्त मंज़ूरी दे दी. इस यात्रा को लेकर मामला कैसे उलझ और भड़क गया था, जानिए.

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हाई कोर्ट ने चार धाम यात्रा पर लगी रोक हटाई.

सरकार चली गई थी सुप्रीम कोर्ट
जून के आखिरी हफ्ते में जब हाई कोर्ट ने सरकार के निर्णय को पलटते हुए चार धाम यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया था, तो उसके बाद उत्तराखंड सरकार सुप्रीम कोर्ट की शरण में पहुंच गई थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिल सकी और इस प्रक्रिया में समय गुज़र गया. समय के साथ कोरोना संक्रमण को लेकर हालात काफी काबू में दिखे और सरकार ने दलील दी कि जीवन पटरी पर लौट रहा है इसलिए यात्रा को मंज़ूरी दी जाना चाहिए. तब हाई कोर्ट ने कहा था कि जब तक याचिका सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है, वह इस मामले में दखल नहीं देगा. इस पर पिछले दिनों प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से एसएलपी वापस ले ली थी.

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कांग्रेसियों ने दी थीं गिरफ्तारियां
चार धाम यात्रा शुरू किए जाने को लेकर प्रदेश में सियासत भी गरमा गई थी. कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने लगातार इस यात्रा को मुद्दा बनाते हुए प्रदेश भर में प्रदर्शन किए थे और हाल में ही पुलिस के साथ झड़प होने के बाद गिरफ्तारियां भी दे दी थीं. कांग्रेस के राज्य स्तरीय नेताओं ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए राज्य सरकार पर आरोप लगाया था कि यात्रा शुरू करवाने को लेकर गंभीरता नहीं दिखाने से स्थानीय लोगों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है. गौरतलब है कि तीन ज़िलों में इस यात्रा की वजह से होने वाले पर्यटन पर ही हज़ारों स्थानीय लोगों का रोज़गार टिका है.

तलवार और ढाल के बिना अधूरा है छोलिया नृत्य, जानिए कैसे 'छल' से मिला ये नाम

इस बार नंदा देवी महोत्सव में 4 छोलिया दलों ने हिस्सा लिया है.

नैनीताल के नंदा देवी महोत्सव में इस बार छोलिया की चार टीम भाग ले रही हैं.

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नैनीताल में नंदा देवी महोत्सव को कोरोना नियमों को ध्यान में रखते हुए धूमधाम से मनाया जा रहा है. ज्योलीकोट से केले के पेड़ को लाकर नैना देवी प्रांगण में मूर्ति निर्माण किया गया. ब्रह्म मुहूर्त में देवी मां की प्राण प्रतिष्ठा करके मूर्तियों को स्थापित किया गया. इस बीच मेले में कुमाऊं का लोक नृत्य छोलिया भी देखने को मिल रहा है.

हाथों में तलवार और ढाल लेकर, रंग-बिरंगे कपड़ों में नृत्य कर रहे कलाकार महोत्सव में चार चांद लगा रहे हैं. यह नृत्य उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र के सरौ, पौणा नृत्य की तरह है. यह नगराज, नरसिंह और पांडव लीलाओं पर आधारित नृत्य है. इसमें नृत्य के जरिए संगीत का आनंद भी लिया जाता है.

नंदा देवी महोत्सव में इस बार छोलिया की चार टीम भाग ले रही हैं. ओखलकांडा, रामगढ़, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा से यह टीम आई हैं. हर दल में करीब 10 से 15 लोगों की टोली मिलकर नृत्य करती है. कहा जाता है कि यह नृत्य करीब डेढ़ से दो हजार साल पुराना है.

नाचने वालों की इस टोली में गाने-बजाने वालों का एक दल अलग से चलता है, जो ढोल, दमाऊ, रणसिंघा, तुरही लेकर साथ-साथ चलते हैं. कलाकारों के नाचने का तरीका कुछ इस तरह होता है कि जैसे वह युद्ध में अपने प्रतिद्वंद्वी के दांव-पेंचों की नकल करते हैं और छल के जरिए अपने दुश्मन को मात देते हैं.

बताया जाता है कि इस वजह से ही इस नृत्य का नाम छोलिया पड़ा था. छोलिया टीम के सदस्यों के कपड़े भी काफी आकर्षक होते हैं. लाल, नीला, हरा और सफेद रंग से बनी इनकी पोशाकें इस नृत्य में चार चांद लगा देती हैं.

नैनीताल का 'बकिंघम पैलेस' है राजभवन, सुल्ताना डाकू से जुड़ा है एक रोचक किस्सा

नैनीताल स्थित राजभवन में कुल 85 कमरे हैं.

नैनीताल स्थित राजभवन को बनाने के लिए स्थानीय पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है.

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भारत में ऐसे बहुत कम राज्य हैं, जहां दो राजभवन स्थित हैं. उत्तराखंड उन्हीं राज्यों में से एक है. यहां दो राजभवन देखने को मिलेंगे. एक देहरादून के त्रिवेणी नगर में मौजूद है और दूसरा है नैनीताल के तल्लीताल में. नैनीताल के राजभवन की बात करें तो यह पर्यटकों के घूमने के लिए काफी अच्छी जगह है. टिकट लेकर अंदर जा सकते हैं.

राजभवन घूमने जाने वाले पर्यटकों के साथ एक गाइड को भेजा जाता है. अंदर जाते ही बाईं तरफ एक पुलिस सुरक्षा भवन है. यहां बॉलीवुड की सुपरहिट फिल्म कोई मिल गया की शूटिंग हुई थी.

बताते चलें कि यह राजभवन स्कॉटिश गौथिक शैली का बना है. इसके डिजाइनर अर्किटेक्ट स्टीवेंस और अधिशासी अभियंता एफ.ओ. डब्ल्यू औरेटेल थे. राजभवन का आर्किटेक्चर लंदन के बकिंघम पैलेस से मिलता-जुलता है.

इतिहासकार अजय रावत बताते हैं कि इस राजभवन को बनाने के लिए स्थानीय पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है. स्थानीय पत्थरों की वजह से नैनीताल का राजभवन गौथिक शैली का बना हुआ है. इसकी खासियत यह है कि यह अपने बैकग्राउंड से काफी मिलता है.

राजभवन में कुल 85 कमरे हैं, जिसमें 13 बेडरूम हैं. राजभवन के अंदर ब्रिटिश जमाने के मेंडल्स देखने को मिलेंगे. भीतर सुल्ताना डाकू के कई औजार भी रखे हुए हैं. वहीं अंग्रेजों के जमाने का एक पियानो भी अंदर मौजूद है, जो उनकी आखिरी विरासत है.

नैनीताल : छोटी सी उम्र में किया बड़ा कमाल, 13 साल के लड़के ने लिख दी नॉवेल

नॉवेल के साथ विपुल जोशी.

नैनीताल के सेंट जोसेफ स्कूल में पढ़ने वाले 8वीं के छात्र विपुल जोशी ने एक नॉवेल लिखी है.

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नैनीताल के एक लड़के ने कम उम्र में बड़ा कमाल कर दिखाया है. सेंट जोसेफ स्कूल में पढ़ने वाले 8वीं के छात्र विपुल जोशी ने एक नॉवेल लिख दी है, जिसका नाम है \’गेरीज एडवेंचर द एलिक्सजिर ऑफ इम्मोरटालिटी\’. यह नॉवेल 19 साल के एक बच्चे पर आधारित है.

इस नॉवेल में जादुई दुनिया, दोस्ती, धोखाधड़ी, एडवेंचर से जुड़ी कहानी पढ़ने को मिलेगी. विपुल ने यह नॉवेल लॉकडाउन के दौरान लिखी थी. विपुल को कविताएं लिखने का भी शौक है. उनकी लिखी एक कविता इस नॉवेल में भी पढ़ने को मिलेगी.

नैनीताल : केले के पेड़ से ही क्यों बनाई जाती है मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमा?

स्थानीय कलाकार मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमा को सजाते हैं.

मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमा बनाने के लिए नैनीताल के ज्योलीकोट से केले के पेड़ लाए गए.

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नैनीताल में कोरोना नियमों को ध्यान में रखते हुए नंदा देवी महोत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है. हर साल भद्रमास की पंचमी से यह मेला शुरू होता है. मेले के दौरान मां नंदा-सुनंदा का पूजन होता है. केले के पेड़ से उनकी प्रतिमाएं बनाई जाती हैं और स्थानीय कलाकारों द्वारा उनका श्रृंगार किया जाता है.

मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमा बनाने के लिए नैनीताल के ज्योलीकोट से केले के पेड़ लाए गए. मूर्तियां बनाने के लिए केले के पेड़ का ही इस्तेमाल क्यों किया जाता है, इसके पीछे स्थानीय लोगों की अलग-अलग मान्यताएं हैं.

उन्होंने बताया कि नंदा-सुनंदा दो बहनें थीं. जब वे अपने ससुराल जा रही थीं, तब एक भैंसा उनके पीछे दौड़ने लगा. दोनों अपनी जान बचाने के लिए केले के खेत में छिप गईं. एक बकरे ने केले के पत्ते खा लिए और भैंसे ने केले के खेत में उनकी हत्या कर दी.

इसी वजह से केले के पेड़ से ही मां नंदा-सुनंदा की मूर्ति बनाने की रवायत चली आ रही है. दूसरी ओर कई साल से मेले के दौरान बकरे की बलि की प्रथा भी चली आ रही थी लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इस पर रोक जारी है.

कुछ लोगों का मानना है कि केला एक पवित्र पेड़ है. देश में केले को धार्मिक रूप में काफी महत्वता दी गई है, जिस वजह से इसे मूर्ति के निर्माण में लाया जाता है.

देवी मां की प्रतिमा बनाने के लिए केले के पेड़, रुई और बांस की लकड़ी इस्तेमाल में लाई जाती है. मूर्ति निर्माण के संयोजक चंद्र प्रकाश शाह बताते हैं कि इन्हें बनाने के लिए सभी प्राकृतिक चीजों का प्रयोग किया जाता है. यहां तक रंग भी नैचुरल इस्तेमाल किए जाते हैं.

उत्तराखंड से माओवाद का खात्मा: इनामी भास्कर पांडे की गिरफ्तारी के बाद पुलिस का दावा

इनामी माओवादी भाष्कर पांडे को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया.

Uttarakhand Police : कई साल से फरार चल रहे इनामी माओवादी भास्कर पांडे को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. पुलिस का दावा है कि इसके साथ ही उत्तराखंड से माओवाद का खात्मा हो गया है. प्रदेश में अभी तक करीब 24 माओवादियों के सरगनाओं को पुलिस ने जेल की सलाखों के पीछे भेजा है.

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नैनीताल. उत्तराखंड (Uttarakhand) से माओवाद (Maoist) का खात्मा हो गया है. पुलिस का दावा है कि इनामी माओवादी भास्कर पांडे  (Bhaskar Pandey) के पकड़े जाने के बाद राज्य में माओवाद का चैप्टर क्लोज कर दिया गया है. प्रदेश में अभी तक करीब 24 माओवादियों के सरगनाओं को पुलिस ने जेल की सलाखों के पीछे भेजा है, जो राज्य में माओवाद की जड़ें मजबूत करना चाह रहे थे.

प्रदेश में माओवादियों का नाता कुमाऊं क्षेत्र में ज्यादा देखने को मिलता है. राज्य में साल 2004 में पहली बार माओवाद प्रकाश में आया था. उस समय नानक मत्था थाना क्षेत्र के जंगलों में माओवाद का आर्म ट्रेनिंग कैंप की सुचना मिली थी. जिस पर पुलिस ने पहली कार्रवाई की और कैंप को खत्म किया था. इस कार्रवाई के बाद माओवाद अल्मोड़ा, चम्पावत, पिथोरागढ़, नैनीताल और उधमसिंह नगर में सक्रिय हुआ. यहां माओवादियों ने अपना रंग दिखाना शुरू किया, जिन पर 33 मुकदमे अभी तक दर्ज हुए हैं और 24 माओवादियों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है.

माओवादियों पर पुलिस कार्रवाई

साल 2004 में 9 मुकदमे दर्ज हुए.
साल 2005 में 5 मुकदमे दर्ज हुए.
साल 2006 से 2009 तक हर साल 1 मुकदमा
साल 2014 में 6 मुकदमे.
साल 2015 से 2016 तक 2 मुकदमे हर साल
साल 2015 में 5 मुकदमे दर्ज हुए.

खीम सिंह बोरा बरेली से हुआ था गिरफ्तार

इसके साथ ही साल 2006 में जब माओवाद संगठन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुदा था तो जोनल कमेटी खीम सिंह बोरा का राज्य के माओवाद में बड़ा नाम था. इसे जिसको पुलिस ने बरेली से गिरफ्तार किया था.

भाष्कर पांडे था राज्य का अंतिम माओवादी

लंबे समय से फरार चल रहे माओवादी भास्कर पांडे की गिरफ्तारी पूरे उत्तराखंड की पुलिस के लिए बहुत बड़ी चुनौती थी. इस पर 20 हजार का इनाम भी था. भास्कर पांडे पर साल 2017 में चुनाव को प्रभावित करने का आरोप था और भास्कर राज्य में अंतिम माओवादी था. इसे पकड़ने के लिए पुलिस लम्बे समय से तलाश कर रही थी. वहीं पूछताछ में एरिया कमांडर भास्कर का कहना है कि वो राज्य में माओवाद की जड़ों को एक बार फिर मजबूत करने की जिम्मेदारी उस पर थी. पुलिस की मानें तो साल 2022 के चुनाव को प्रभावित करना भी भास्कर पांडे का मकसद था.

डीजीपी अशोक कुमार के अनुसार प्रदेश के सभी माओवादियों को जेल भेज दिया गया है. हाल फिलहाल कोई भी माओवादी राज्य में नहीं है. यानि की माओवाद पर ये राज्य की बड़ी कामयाबी है.

नैनीताल मालरोड जाम पर पुलिस की सख्ती: गाड़ी चलाने और पार्किंग के ये नियम न माने तो कार्रवाई

नैनीताल मालरोड जाम पर पुलिस की सख्ती.

Nainital News : डीआईजी नीलेश आनंद ने कहा कि नैनीताल के चौराहों से लेफ्ट ओपन के साथ अतिक्रमण को हटाया जायेगा. सड़कों पर पार्किंग प्रतिबंधित होगी. इसके साथ ही किसी भी वाहन को चार बार एक ही सड़क पर घुमाने की अनुमति नहीं होगी. पार्किंग में भी 7 दिन से अधिक गाड़ी पार्क नहीं की जा सकेगी.

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नैनीताल. नैनीताल (Nainital) शहर को जाम के झाम से निकालने के लिये अब एक और यातायात प्लान पर काम शुरु किया गया है. पुलिस ने नैनीताल शहर की सड़कों पर खड़े वाहनों को हटाने का निर्णय लिया है. इसके लिये डीआईजी नीलेश आनंद (DIG Nilesh Anand) ने दिशा निर्देश भी जारी किए हैं. इसमें सड़कों पर लगने वाले जाम की समस्या को दूर करने के लिए किनारों पर वाहनों की पार्किंग पर सख्ती बरतने की तैयारी है.

सड़क जाम की समस्या पर बातचीत के दौरान डीआईजी ने बताया कि नैनीताल के चौराहों से लेफ्ट ओपन के साथ चौराहों से अतिक्रमण को हटाया जायेगा. साथ ही सड़कों पर पार्किंग बैन किया जायेगा. डीआईजी ने कहा कि पर्यटन सीजन के साथ वीक एंड़ पर पर्यटकों को पार्किंग की सही जानकारी के लिये जीपीएस बारकोड लोकेशन सिस्टम तैयार किया जा रहा है, जिससे वाहन चालक सीधे पार्किंग में जाकर गाड़ियां खड़ी कर सकें. वहीं डीआईजी ने कहा कि किसी भी पार्किंग में 7 दिनों से ज्यादा गाडियों को खड़ा करने की अनुमति नहीं होगी. अगर कोई वाहन 7 दिनों से ज्यादा खड़ी मिली तो उस पर भी पुलिस कार्रवाई करेगी.

नैनीताल में बेवजह घूमने वालों पर होगी कार्रवाई

नैनीताल में गाडियों को बेवजह सड़कों पर घुमाने पर अब कानूनी कार्रवाई भी झेलनी पड़ेगी. डीआईजी नीलेश आनंद ने कहा कि बार बार गाड़ी को सड़क पर घुमाने वालों पर पुलिस की नजर रहेगी. अगर तीन से 4 बार गाड़ी घूमती हुई मिली तो उस पर कार्रवाई की जायेगी. इसके साथ ही डीआईजी ने कहा कि मालरोड पर खास तौर पर पुलिस का फोकस है और यहां किसी भी तरह से वाहनों की पार्किन ही होने दी जायेगी.

डीआईजी ने कहा कि पंत पार्क से भी पार्किंग को हटाने के साथ मालरोड़ में एंट्री करने पर ही गाड़ी मालिक या ड्राइवर को एक पर्चा दिया जायेगा. इसमें पार्किंग के साथ मालरोड में गाड़ी पार्किग करने पर क्या कानूनी कार्रवाई हो सकती है इसकी पूरी जानकारी होगी. अगर इसके बाद भी कोई गाड़ी को मालरोड पर खड़ी करेगा तो उस पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी. डीआईजी ने कहा कि शहर के आस पास छोटे पार्किंग स्थल चिन्हित कर रहे हैं जिससे जनता और पर्यटकों को लाभ मिल सके।

चारधाम यात्रा पर गतिरोध : कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के बाद विधानसभा पर धरना देंगे हरीश रावत, गोदियाल

हरीश रावत व गणेश गोदियाल की मौजूदगी में कांग्रेस चारधाम यात्रा मुद्दे पर प्रदर्शन करेगी.

एक दिन पहले कांग्रेस के कई कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन करते हुए ​गिरफ्तारियां दीं तो आज वरिष्ठ नेता चारधाम यात्रा के मुद्दे पर उत्तराखंड सरकार को घेरेंगे. वहीं, धामी सरकार को अब हाई कोर्ट में इस मामले के लिए जाने का रास्ता मिल गया है.

  • News18Hindi
  • LAST UPDATED : September 14, 2021, 13:54 IST
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देहरादून/नैनीताल. उत्तराखंड में चारधाम यात्रा को लेकर गतिरोध हंगामे की हद तक पहुंच चुका है. एक तरफ कांग्रेस के कार्यकर्ता चारधाम यात्रा को शुरू किए जाने की मांग को लेकर लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, तो वहीं आज मंगलवार को उत्तराखंड कांग्रेस के दिग्गज नेता विधानसभा भवन के सामने धरना देने जा रहे हैं. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल और पूर्व सीएम हरीश रावत की मौजूदगी में चारधाम यात्रा का मुद्दा गरमाएगा. उधर, चारधाम यात्रा पर रोक लगाने के हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची सरकार ने शीर्ष अदालत से याचिका वापस ले ली है और सुप्रीम कोर्ट ने इजाज़त दे दी है कि हाई कोर्ट से ही यात्रा पर लगी रोक को लेकर सरकार अपना पक्ष रख ले.

चारधाम यात्रा सुचारू किए जाने को लेकर सोमवार को कांग्रेस की ज़िला कमेटी, एनएसयूआई और युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने बदरीनाथ कूच किया. इस विरोध प्रदर्शन के दौरान कांग्रेसियों की पुलिस बल के साथ झड़प भी हुई. वास्तव में दोपहर पांडुकेश्वर पहुंचे कांग्रेसियों को रोकने के लिए पहले ही पुलिस बल मौजूद था, जिसका विरोध करते हुए कांग्रेसियों ने गिरफ्तारियां दीं. पुलिस के साथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं का यह गतिरोध करीब तीन घंटे तक चलता रहा.

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कांग्रेस ने कहा सरकार ‘तानाशाह’
ज़िला कांग्रेस और एनएसयूआई पदाधिकारियों के हवाले से खबरों में कहा गया कि चारधाम यात्रा पर लगी रोक हटवाने में नाकाम रही उत्तराखंड सरकार ने गरीब लोगों की आ​जीविका का संकट खड़ा कर दिया है. कांग्रेसियों ने कहा सरकार का रवैया तानाशाह ढंग का है, जिससे लोग मुश्किल और गुस्से में हैं. यही नहीं, हक हुकूकधारियों तक के अधिकारों पर सरकार का बर्ताव निराशाजनक रहा है.

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न्यूज़18 उत्तराखंड का ट्वीट.

अब हाई कोर्ट में सरकार लगा सकेगी गुहार
न्यूज़18 के संवाददाता वीरेंद्र बिष्ट ने नैनीताल से रिपोर्ट दी कि उत्तराखण्ड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से एसएलपी वापस ले ली. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को छूट दी कि वो हाईकोर्ट में इस मामले फिर से प्रार्थना पत्र दाखिल कर सकती है. वास्तव में, चारधाम यात्रा से रोक हटाने के लिए हाल में जब हाई कोर्ट में राज्य सरकार ने याचिका दायर की थी, तो हाई कोर्ट ने यही कहा था चूंकि सुप्रीम कोर्ट में सरकार पहले ही जा चुकी है इसलिए अब वह सुनवाई नहीं करेगा. अब याचिकाकर्ता व वकील दुष्यंत मैनाली ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकार हाई कोर्ट में प्रार्थना पत्र दाखिल कर सकती है.

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गौरतलब यह भी है कि केदारनाथ में तीर्थ पुरोहितों का क्रमिक आंदोलन अनशन के रूप में कई हफ्तों से बदस्तूर अब भी जारी है. चारधाम में शुमार केदारनाथ के पुरोहित देवस्थानम बोर्ड को भंग करने की मांग पर डटे हुए हैं. उनका कहना है कि 30 अक्टूबर तक अगर सरकार ने इसे भंग नहीं किया तो उग्र आंदोलन होगा. वहीं सीएम पुष्कर सिंह धामी सरकार इस बोर्ड की समीक्षा की कमेटी बनवा चुकी है और पुरोहितों को लगातार आश्वासन दे रही है.

7 झीलों से मिलकर बना है सातताल, इसके बारे में ये खास बातें नहीं जानते होंगे!

सातताल नैनीताल से 22 किलोमीटर दूर है.

नल दमयंती ताल के बारे में बताया जाता है कि राजा नल और रानी दमयंती का यहां महल हुआ करता था.

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सरोवर नगरी नैनीताल से करीब 22 किलोमीटर की दूरी पर सातताल स्थित है. यहां पहुंचने के लिए घने जंगलों से होकर गुजरना पड़ता है. जंगल के बीच में यह 7 ताल मौजूद हैं. इसी वजह से इसका नाम सातताल पड़ा. राम ताल, सीता ताल, लक्ष्मण ताल, हनुमान ताल, सूखा ताल, नल दमयंती ताल और गरुड़ ताल इनके नाम हैं.

नल दमयंती ताल के बारे में बताया जाता है कि राजा नल और रानी दमयंती का यहां महल हुआ करता था. इन तालों में सूखा ताल बारिश के दौरान ही पानी से भरा दिखता है. राम, लक्ष्मण और सीता ताल एक साथ मौजूद हैं.

स्थानीय लोग बताते हैं कि यहां राम, सीता और लक्ष्मण रहे थे, जिस वजह से इन तालों को यह नाम दिए गए. पौराणिक काल में यहां पांडव भी रहे थे. यहां भीम की पत्नी हिडिंबा आई थीं, जिस वजह से यहां पास ही के एक पहाड़ को हिडिंबा पर्वत के नाम से जाना जाता है.

सातताल बर्ड वॉचिंग के लिए काफी मशहूर है. यहां कई तरह के वॉटर स्पोर्ट्स भी होते हैं. वहीं दूसरी ओर कोरोना के चलते स्थानीय व्यापारियों को काफी नुकसान उठाना पड़ा. दुकान मालिक गोविंद सिंह सतवाल ने कहा कि उनकी चार पीढ़ियां यहां रह चुकी हैं. यहां अब केवल मई-जून में ही पर्यटक देखने को मिलते हैं, जो पिछले डेढ़ साल से कोविड के चलते और कम हो गए हैं.

सक्सेस स्टोरी : फेल हुए लेकिन नहीं मानी हार, संजीव भगत ने यूं बनाया 'फ्रूटेज' को मशहूर ब्रांड

उत्तराखंड में 'फ्रूटेज' एक लोकप्रिय ब्रांड बन गया है.

फ्रूटेज कंपनी जूस, जैम, अचार, स्क्वाश, मुरब्बा समेत दर्जनों प्रोडक्ट बनाती है.

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सपना तो बहुत लोग देखते हैं लेकिन ऐसे कुछ ही होते हैं, जो अपने सपनों को केवल पूरा ही नहीं करते बल्कि उन सपनों को जीते हैं. संजीव भगत उन्हीं में से एक हैं. भवाली के फरसौली गांव के रहने वाले संजीव भगत ने मेहनत करते हुए उद्योग जगत में एक बढ़ा मुकाम हासिल किया है. संजीव की कंपनी फ्रूटेज आज उत्तराखंड में ही बल्कि देश मे एक लोकप्रिय ब्रांड बन गई है.

फ्रूटेज कंपनी जूस, जैम, अचार, स्क्वाश, मुरब्बा समेत दर्जनों प्रोडक्ट बनाती है. उत्तराखंड आने वाले पर्यटक कंपनी का कोई न कोई उत्पाद जरूर ले जाते हैं. कुछ पर्यटक तो ऐसे भी होते हैं, जो विशेष तौर पर फ्रूटेज के प्रोडक्ट लेने के लिए यहां आते हैं.

संजीव भगत ने बताया कि 1989 में उन्होंने फैक्ट्री के लिए बिल्डिंग बनाने की नींव रखी थी. 1993 में फैक्ट्री ने फ्रूटेज के लिए उत्पादन बनाना शुरू किया. फैक्ट्री लगाने और उद्योग शुरू करने के लिए उन्होंने उत्तर प्रदेश खादी और ग्रामोद्योग से 2.6 लाख रुपये का लोन लिया था.

शुरुआत के दिनों में उन्हें काफी दिक्कतों का सामना तो करना पड़ा लेकिन 1996 तक उनका कामकाज बेहतर स्थिति में आने लगा और 1999 में उन्होंने भीमताल-भवाली रोड पर अपने उत्पादों का एक आउटलेट खोल दिया.

वर्तमान में भीमताल के साथ-साथ नैनीताल, आमपड़ाव और हल्द्वानी में भी फ्रूटेज के शोरूम हैं. नैनीताल के इस फूड प्रोडक्ट्स आउटलेट में कई वैरायटी देखने को मिल जाएंगी. यहां फ्रूट स्क्वाश, जैम, चटनी, अचार, मुरब्बा, जूस, और सिरका समेत 45 प्रोडक्ट्स मिल जाएंगे.

'भीमताल का मुकुट' है करकोटक नाग का मंदिर, यहां कालसर्प दोष से मिलती है मुक्ति

करकोटक नाग को ककड़ी और भुट्टा चढ़ाया जाता है.

भीमताल का मुकुट कहे जाने वाले करकोटक मंदिर में हर साल ऋषि पंचमी को मेले का आयोजन होता है.

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नैनीताल जिले के भीमताल स्थित करकोटक मंदिर को भीमताल का मुकुट कहा जाता है. यह मंदिर नैनीताल से करीब 22 किलोमीटर की दूरी पर है. भीमताल की सबसे ऊंची छोटी पर यह मंदिर स्थित है. मंदिर तक जाने के लिए पैदल मार्ग है. मंदिर की ओर जाते समय रास्ते में एक घने जंगल से गुजरना पड़ता है.

मंदिर की ओर बढ़ते समय भीमताल की झील का सुंदर नजारा भी देखने को मिलता है. मंदिर में करकोटक नाग की एक सुंदर प्रतिमा है. जिस तरह एक मां अपने बेटे को हमेशा अपने से ऊपर देखना चाहती है, उसी तरह मां कैंचुला देवी का मंदिर भीमताल के ताल के नजदीक है और करकोटक नागराज भीमताल की चोटी पर विराजमान हैं.

करकोटक नाग को लेकर भीमताल के इतिहास में कई कहानियां हैं. पुजारी केशव दत्त बेलवाल ने बताया कि करकोटक नाग और नल दमयंती ताल के बीच गहरा संबंध रहा है. करकोटक पानी पीने के लिए नल दमयंती ताल तक जाते थे.

भीमताल का मुकुट कहे जाने वाले करकोटक मंदिर में हर साल ऋषि पंचमी को मेले का आयोजन होता है. ऋषि पंचमी के दिन ही करकोटक नागराज का जन्म हुआ था. भक्त काफी तादाद में यहां आकर नाग देवता के दर्शन करते और दूध चढ़ाते हैं.

इस दिन यहां सुंदर कांड का पाठ किया जाता है, भजन-कीर्तन होते हैं और मंदिर में भंडारे का भी आयोजन होता है. करकोटक नाग को मौसमी फल जैसे ककड़ी और भुट्टा चढ़ाया जाता है. मान्यता है कि ऋषि पंचमी के दिन जो भी भक्त श्रद्धा से नागराज को दूध और जल चढ़ाते हैं तो उन्हें काल सर्प दोष से मुक्ति मिलती है.

अल्मोड़ा में हुआ था भारत रत्न गोविंद बल्लभ पंत का जन्म, लेकिन नैनीताल से था खास नाता

नैनीताल में गोविंद बल्लभ पंत की 134वीं जयंती मनाई गई.

भारत रत्न गोविंद बल्लभ पंत के नाम पर भवाली में एक इंटरमीडिएट कॉलेज भी स्थित है.

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भारत रत्न गोविंद बल्लभ पंत की 134वीं जयंती पर उत्तराखंड के कई जिलों में उन्हें याद किया गया. उनका जन्म उत्तराखंड के अल्मोड़ा में हुआ था लेकिन नैनीताल उनकी कर्मभूमि थी. यहां रहकर उन्होंने स्वतंत्रता के आंदोलनों में न केवल हिस्सा लिया बल्कि लोगों को आजादी की लड़ाई के लिए प्रेरित भी किया.

रिटायर्ड आईजी शैलेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि 1919 में जब अंग्रेजों ने स्थानीय लोगों को लिमिटेड पॉवर के तहत सरकार बनाने की छूट दी थी, तब उस दौरान गोविंद बल्लभ पंत स्वराज पार्टी से नैनीताल क्षेत्र के प्रतिनिधि बने. यहां के जाने-माने ठेकेदार नारायण प्रसाद भट्ट की उनके साथ अच्छी दोस्ती थी.

नारायण भट्ट के साथ मिलकर गोविंद बल्लभ पंत ने भवाली के नजदीक निगलाट में चरखा चलाया था और स्वतंत्रता संग्राम के लिए लोगों को प्रेरित भी किया था. देश को आजादी मिलने के बाद वह उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने. इसके बाद उन्होंने नैनीताल की सड़के बनवाईं और अन्य विकास के काम किए.

गोविंद बल्लभ पंत ने 1925 में भवाली में एक जमीन खरीदी थी. आज भी उस जगह को पंत एस्टेट के नाम से जाना जाता है. वहां उनका एक सुंदर भवन भी स्थित है. भवाली में गोविंद बल्लभ पंत के नाम पर एक इंटरमीडिएट कॉलेज भी स्थित है, जहां हर साल उनकी जयंती पर अलग-अलग आयोजन किए जाते हैं.

नैनीताल की रंग-बिरंगी कैंडल में क्या है खास, क्यों हैं ये इतनी मशहूर?

कैंडल में सजावट हाथों से की जाती है.

वैसे तो मोमबत्ती हर जगह मिलती है लेकिन नैनीताल की कैंडल की बात ही कुछ और है.

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सरोवर नगरी के नाम से पहचान बनाने वाला नैनीताल काफी चीजों के लिए मशहूर है, इन्हीं में से एक है यहां की कैंडल. शहर की यादों के तौर पर सैलानी अपने साथ कैंडल जरूर लेकर जाते हैं. वैसे तो मोमबत्ती हर जगह मिलती है लेकिन नैनीताल की कैंडल की बात ही कुछ और है.

नैनीताल में कई दुकानों पर कैंडल बिकती हैं. दुकानों में बिकने वालीं ये रंग-बिरंगी मोमबत्तियां अलग-अलग डिजाइन और रंगों की होती हैं. जितनी सुंदर ये दिखती हैं, इन्हें बनाने में उतनी ही मेहनत भी लगती है.

अलग-अलग तरह के मोम को दूसरे शहरों से मंगवाया जाता है. इसको आकार देने के लिए टिन, रबर और लकड़ी वाले खांचों का इस्तेमाल किया जाता है. कैंडल को रंगीन बनाने के लिए एक खास तरह की मशीन को इस्तेमाल में लाया जाता है. नैनीताल के बाजार में 10 रुपये से लेकर 1000 रुपये तक की मोमबत्ती उपलब्ध है.

CM पुष्कर सिंह धामी का नैनीताल दौरा, कोरोना नियमों की जमकर उड़ी धज्जियां

रैली में ज्यादातर लोग बिना मास्क के नजर आए.

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के स्वागत समारोह और रैली में ज्यादातर लोग बगैर मास्क के नजर आए.

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दुनियाभर के देश कोरोना महामारी से लड़ रहे हैं. भारत में कोविड की तीसरी लहर से बचाव को लेकर कई राज्यों की सरकारें तेजी से काम कर रही हैं. कोरोना का डेल्टा वेरिएंट भी देश में दस्तक दे चुका है, सावधान रहने की जरूरत है लेकिन अभी भी लापरवाही की खबरें लगातार सामने आ रही हैं. ऐसा ही एक नजारा नैनीताल में राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के दौरे पर देखने को मिला.

सरोवर नगरी में CM पुष्कर सिंह धामी के आने पर उनका भव्य स्वागत तो जरूर हुआ लेकिन कोविड गाइडलाइन की धज्जियां भी उड़ती दिखाई दीं. स्वागत समारोह और रैली में ज्यादातर लोगों के मुंह से मास्क गायब था और सोशल डिस्टेंसिंग का भी जमकर मखौल उड़ाया गया.

बता दें कि उत्तराखंड सरकार ने 14 सितंबर तक कोरोना कर्फ्यू बढ़ा दिया है. एक ओर तो राज्य सरकार महामारी को रोकने के लिए लोगों को सावधान और सतर्क रहने की नसीहत दे रही है, तो वहीं दूसरी ओर इस तरह के आयोजनों से कोरोना नियमों को खूब ताक पर भी रखा जा रहा है.

'चारधाम यात्रा से रोक हटाएं योर ऑनर', उत्तराखंड सरकार की मांग पर हाईकोर्ट ने कहा, 'मजबूरी है'

उत्तराखंड में चार धाम शुरू होने का इंतज़ार किया जा रहा है.

Char Dham Yatra Update : सवा दो महीने पहले हाई कोर्ट ने कोविड संक्रमण फैलने के अंदेशे के चलते चार धाम यात्रा पर रोक लगाई थी. तब सरकार इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की शरण में गई थी. अब सरकार की यही चूक आड़े आ गई है.

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नैनीताल. उत्तराखंड सरकार ने अदालत द्वारा लगाई गई रोक को हटाकर चारधाम यात्रा शुरू करने के लिए हाई कोर्ट में प्रार्थना की, लेकिन उच्च न्यायालय ने ऐसा करने से इनकार कर दिया. मंगलवार को सरकार से महाधिवक्ता व मुख्य स्थायी अधिवक्ता चन्द्र शेखर जोशी ने कोर्ट में कहा कि चूंकि सभी सेक्टर खुलने लगे हैं और चारधाम यात्रा बंद होने से स्थानीय लोगों को बड़ा नुकसान हो रहा है. इस पर कोर्ट ने कहा कि जब तक सुप्रीम कोर्ट में याचिका पेंडिंग है, तब तक हाईकोर्ट कोई निर्णय नहीं ले सकता.

कोर्ट में कहा गया कि चारधाम यात्रा बंद होने से हजारों स्थानीय लोगों की रोजी रोटी प्रभावित हो रही है. डांडी, कांठी से लेकर खच्चर, होटल, रेस्टोरेंट समेत अन्य छोटे बड़े कारोबारों पर असर पड़ रहा है. लिहाज़ा रोक हटाई जाए ताकि लोगों राहत मिले. लेकिन कानूनी प्रोसीजर का हवाला देकर हाई कोर्ट ने इस तरह का आदेश देने से मना कर दिया.

ये भी पढ़ें : उत्तराखंड में जन आशीर्वाद यात्रा से BJP जोश में,केंद्रीय मंत्री अजय भट्ट ने किया ये दावा

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उत्तराखंड हाई कोर्ट ने प्रोसीजर का हवाला देकर चार धाम यात्रा पर रोक न हटा पाने की बात कही.

क्या सरकार सुप्रीम कोर्ट से वापस लेगी याचिका?
मामला यह है कि 28 जून को हाई कोर्ट ने चारधाम यात्रा पर रोक लगा दी थी. कोर्ट ने माना था कि चारधाम यात्रा वाले ज़िलों में कोविड संबंधी व अन्य स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है. डॉक्टरों और 108 समेत अन्य सुविधाओं की कमी की ज़िला प्रशासन की रिपोर्ट का हवाला कोर्ट ने दिया था. तब हाई कोर्ट के इस आदेश के खिलाफ सरकार ने 6 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दाखिल की थी, जिस पर अभी सुनवाई बाकी है. सूत्र बता रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट से राज्य सरकार एसएलपी वापस ले सकती है, जिसके बाद हाईकोर्ट में प्रार्थना पत्र दाखिल कर रोक हटाने की मांग फिर की जाएगी.

नैनीताल का सबसे प्राचीन मंदिर है पाषाण देवी, पत्थर पर बनी है मां भगवती की अद्भुत मूर्ति

वस्त्र के रूप में देवी मां को सिंदूर चढ़ाया जाता है.

पाषाण देवी मंदिर में माता भगवती की 9 पिंडियां पहाड़ पर स्वतः अवतरित हुई थीं.

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देवभूमि उत्तराखंड में कई ऐसे मंदिर हैं, जिनकी अपनी महत्वता और पुराणों से जुड़ी कहानियां हैं. उत्तराखंड के नैनीताल में पाषाण देवी का भी एक सुंदर मंदिर है. ठंडी सड़क से लगी पहाड़ी पर यह मंदिर स्थित है. पाषाण देवी को नैनीताल की सबसे प्राचीन देवी माना जाता है. जितनी पुरानी नैनीताल की झील है, उतना ही पुराना मां भगवती का स्वरूप भी माना गया है.

इस मंदिर में माता भगवती की 9 पिंडियां अपने आप अवतरित होकर आई हैं. पहाड़ी में देवी मां ने अपने 9 के 9 रूप पत्थर पर दिखाए, इसलिए यह मंदिर पाषाण देवी के नाम से प्रसिद्ध है और 9 रूप होने की वजह से इन्हें नव दुर्गा के रूप में भी पूजा जाता है.

देवी मां के गर्दन से ऊपरी शरीर का हिस्सा, आंखें, कान, नाक प्रत्यक्ष रूप से दिखते हैं और गर्दन से नीचे का शरीर जैसे उनकी भुजाएं और पादुकाएं ताल के अंदर विराजमान हैं. देवी का यह रूप ताल के अंदर से अपने आप प्रकट हुआ था. पत्थर पर 8 रूप पिंडियों के हैं और एक रूप मुख के रूप में प्रकट हुआ था.

मंदिर के पुजारी जगदीश भट्ट ने बताया कि देवी मां की यह एक प्राकृतिक मूर्ति है और इसमें किसी भी प्रकार का कोई बदलाव नहीं किया गया है. यहां वस्त्र के रूप में सिंदूर चढ़ाने की मान्यता है. सुबह देवी को स्नान कराने के बाद सिंदूर का चोला वस्त्र के रूप में चढ़ाया जाता है.

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