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Uttarakhand के हाथ से गया रानीबाग-नैनीताल रोपवे प्रोजेक्ट, अब NHAI करेगी निर्माण तो क्यों होगी देर?

उत्तराखंड में रोपवे निर्माण के एक मामले में हाई कोर्ट ने एनएचएआई से शपथ पत्र दाखिल करने का कहा.

उत्तराखंड में रोपवे निर्माण के एक मामले में हाई कोर्ट ने एनएचएआई से शपथ पत्र दाखिल करने का कहा.

Uttarakhand Ropeways : नैनीताल में ट्रैफिक का दबाव कम करने के लिए रोपवे का खाका उत्तराखंड सरकार ने खींचा. पर इसके बाद पूरी कवायद कागज़ों में सिमट गई. इस बीच, केंद्र सरकार ने सभी प्रोजेक्ट NHAI को दे दिए. उत्तराखंड सरकार ने इस रोपवे के लिए सर्वे करवाए और करोड़ों खर्च किए लेकिन नतीजा सिफर रहा.

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नैनीताल. पूरे देश में अब तमाम रोपवे प्रोजेक्ट नेशनल हाई अथॉरिटी ऑफ इंडिया के खाते में चले गए हैं. हल्द्वानी के रानीबाग से नैनीताल के हनुमानगढ़ी तक रोपवे का इंतज़ार और बढ़ गया है. अब इस रोपवे का निर्माण NHAI करेगी, जिसके तहत पूरा सर्वे अब दोबारा होगा. हाई कोर्ट में NHAI ने कहा कि जो सर्वे सरकार ने तीन सालों में किए हैं, उनसे इतर सभी सर्वे दोबारा करवाए जाएंगे. इसके लिए एक जर्मन कंपनी को काम देकर करीब 9 करोड़ का प्रारंभिक बजट जारी किया गया है.

इस दौरान NHAI के वकील ने कहा कि सभी रोपवे प्रोजेक्टों को अब पूरे भारत में यही अथॉरिटी बनाएगी और इसके लिए भारत सरकार स्तर से उसको अनुमति मिल गई है. सुनवाई के बाद कोर्ट ने NHAI को शपथ पत्र के साथ जवाब दाखिल करने को कहा. हालांकि सरकार ने भी कोर्ट में कहा कि आईआईटी रुड़की की रिपोर्ट आई है लेकिन कोर्ट ने हाईवे अथॉरिटी को निर्देश देकर कहा कि वह जवाब फाइल करे.

याचिका में इस तरह उठाया गया मुद्दा
हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल करते हुए पर्यावरणविद् अजय रावत ने कहा कि हनुमानगढ़ी में रोपवे के लिए सरकार ने भूगर्भीय रिपोर्ट के अध्ययन के बगैर प्रस्ताव बनाया है. याचिका के मुताबिक हनुमानगढ़ी की पहाडियां मिट्टी की चट्टानें हैं इसलिए कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है. पहले भी वन विभाग कह चुका है कि इस जमीन पर कोई निर्माण संभव नहीं है, लिहाज़ा यहां हनुमान वाटिका बनेगी. याचिका में दोनो ओर से नालों से कटाव होने का तर्क देकर खुर्पाताल या फिर पटवाडांगर में रोपवे का स्टेशन बनाने की मांग की गई है.

अजय रावत ने उठाये थे ये सवाल
हनुमानगढी की इन पहाड़ियों में रोपवे स्टेशन निर्माण पर सवाल उठाते हुए रावत ने कहा था मनोरा थ्रस्ट फॉल्ट लाइन के यहां से गुजरने के कारण इस पहाड़ी को भूगर्भशास्त्रियों ने खतरा बताया है. हाईकोर्ट ने भी यहां निर्माण पर पहले रोक लगा रखी है. डीएफओ कार्यालय, हेलीपैड के निर्माण को भी अनुमति नहीं मिल सकी.

इतना ही नहीं साल 1898 में इस पहाड़ी पर भूस्खलन से 27 लोगों की मौत हुई तो 18वीं शताब्दी में कृष्णापुर, दुर्गापुर, अमृतपुर तीन स्टेट में से अमृतपुर का नामोनिशान खत्म हो गया. पहाड़ियों की संवेदनशीलता को देखते हुए अंग्रेजों ने नैनीताल में ट्रेन न लाने का निर्णय लिया था, तो नैनीताल के लिए सड़क लाने के रास्ते को भी बदलना पड़ा.

Tags: Uttarakhand Tourism

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