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रामपुर तिराहा कांडः जानिए कोर्ट में 25 साल का संघर्ष... क्या था CBI रिपोर्ट में, कैसे हुई गवाह की हत्या और अब क्या है उम्मीद

Virendra Bisht | News18 Uttarakhand
Updated: October 2, 2019, 6:04 PM IST
रामपुर तिराहा कांडः जानिए कोर्ट में 25 साल का संघर्ष... क्या था CBI रिपोर्ट में, कैसे हुई गवाह की हत्या और अब क्या है उम्मीद
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान की एक तस्वीर.

राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण और रामपुर तिराहे पर आन्दोलनकारियों के दमन, गवाहों को मारे जाने के मामले में दायर याचिका को सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया है.

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नैनीताल. राज्य आन्दोलन के दौरान शहीद हुए आन्दोलनकारियों के लिए न्याय की आस अब सुप्रीम कोर्ट से जागी है. सरकारी सेवाओं में आन्दोलनकारियों को 10 प्रतिशत आरक्षण पर हाईकोर्ट के फैसले से नाराज़ आन्दोलनकारियों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है, जिस पर कोर्ट ने सभी डीएम को नोटिस जारी किया है. इसके साथ ही रामपुर तिराहे पर आन्दोलनकारियों के साथ दमन और गवाहों को मारे जाने के मामले में भी याचिका को सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया है. इससे अब एक बार फिर उम्मीद जागी है कि सरकारों की लापरवाही से राज्य आंदोलनकरियों को नुक़सान हुआ है, उपेक्षा झेलनी पड़ी है उसकी भरपाई हो सकेगी.

रामपुर तिराहा कांड और सीबीआई जांच 

बता दें कि 2 अक्टूबर, 1994 को दिल्ली में एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे  आंदोलनकारियों की गाड़ियों को मुज़फ़्फ़रपुर के रामपुर तिराहा में रात 12.30 बजे यूपी पुलिस ने रोक लिया था. पुलिस ने अचानक इन पर लाठीचार्ज किया और आंसू गैस छोड़नी शुरु कर दीं. इसके बाद पुलिस ने निहत्थे आंदोलनकारियों पर गोलियां भी चलाई थीं. इसमें कई आंदोलनकारी शहीद हुए थे और महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और सामूहिक दुष्कर्म तक किया गया था.

आज़ाद भारत में सत्ता के दुरुपयोग के सबसे शर्मनाक मामलों में से एक रामपुर तिराहा कांड को लेकर 7 अक्टूबर, 1994 को उत्तराखंड संघर्ष समिति ने आधा दर्जन याचिकाएं इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल कीं. 6 दिसंबर, 1994 को कोर्ट ने सीबीआई से खटीमा, मसूरी व मुजफ्फरनगर कांड पर रिपोर्ट मांगी.

सीबीआई ने कोर्ट में सौंपी रिपोर्ट में स्वीकार किया कि उत्तराखंड आंदोलन के दौरान सात सामूहिक दुष्कर्म के मामले हुए, 17 महिलाओं से छेड़छाड़ की गई और 28 हत्याएं की गईं. सीबीआइ के पास कुल 660 शिकायतें आई थीं. 12 मामलों में पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी.

shaheed uttarakhand rajya aandolankari, उत्तराखंड आंदोलन में शहीद हुए आंदोलनकारी.
उत्तराखंड आंदोलन में शहीद हुए आंदोलनकारी.


 
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मुआवज़े का आदेश और रोक 

19 जनवरी, 1995 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में आरोपित अफसरों ने सरकारी अनुमति के बिना मुकदमा चलाए जाने को लेकर याचिका दायर की, जिस पर कोर्ट ने फैसला दिया कि हत्या, दुष्कर्म समेत संगीन अपराधों के मामले में शासकीय अनुमति की ज़रूरत ही नहीं है. कोर्ट ने इसे मानवाधिकार उल्लंघन मानते हुए मृतकों के परिजनों और दुष्कर्म पीड़ित महिलाओं को 10-10 लाख रुपये मुआवज़ा और छेड़छाड़ की शिकार महिलाओं और पुलिस हिरासत में उत्पीड़न के शिकार आंदोलनकारियों को 50-50 हज़ार रुपये मुआवज़ा देने का आदेश दिया.

इस निर्णय के खिलाफ अभियुक्तों और यूपी सरकार ने चार विशेष अनुमति याचिकाएं सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल कीं. 13 मई, 1999 को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का आदेश निरस्त कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया जिनको मुआवज़ा दिया जा चुका है, उनसे वापस नहीं लिया जाएगा.

केस ट्रांस्फ़र 

कोर्ट ने अपने फैसले में सीबीआई जांच के आदेश को बरकरार रखा तो सीबीआई ने 12 मामलों में चार्जशीट दाखिल की. इनमें 7 मामले मुजफ्फरनगर में जबकि 5 मामले उत्तराखंड के हैं. इसी बीच आरोपितों ने केस को इलाहाबाद से लखनऊ कोर्ट ट्रांस्फर करने के लिए अर्ज़ी दाखिल कर दी. 4 मामले के ट्रांस्फर कर दिए जबकि एक मुकदमा इसलिए रुका कि अर्ज़ी नहीं थी.

इसी बीच अलग राज्य बन गया तो सीबीआइ ने 5 अभियुक्तों के खिलाफ धारा 304, 307 व 324 व 326, सपठित-34 आइपीसी के तहत आरोप पत्र दाखिल किया. सीबीआई कोर्ट के जज ने इसे 302, 307, 324, 326 व सपठित-34 के तहत केस नंबर 42-1996 में चार्ज फ्रेम किए.

rajya aandolankari, Nainital, नैनीताल में राज्य आंदोलनकारियों ने आज का दिन काला दिवस के रूप में मनाया.
नैनीताल में राज्य आंदोलनकारियों ने आज का दिन काला दिवस के रूप में मनाया.


प्रत्यक्षदर्शी गवाह की हत्या 

22 जुलाई 2003 को तत्कालीन डीएम अनंत कुमार सिंह ने 42-1996 में ज़मानत के बाद आरोप पत्र को उत्तराखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी. कोर्ट ने अनंत कुमार सिंह की याचिका स्वीकार करते हुए सीबीआइ कोर्ट का आदेश निरस्त कर दिया. 22 अक्टूबर, 2003 को आंदोलनकारियों ने पुनर्विचार याचिका दाखिल की तो जस्टिस पीसी वर्मा व जस्टिस एमसी घिल्डियाल की खंडपीठ ने पूर्व के आदेश को रिकॉल कर लिया.

28 मई, 2005 को जस्टिस इरशाद हुसैन व जस्टिस राजेश टंडन की कोर्ट ने मामले को निरस्त कर दिया. इस केस में हाजिर माफ़ी गवाह कांस्टेबल संतोष गिरी की बॉम्बे एक्सप्रेस में गाजियाबाद के समीप गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. इसके बाद सीबीसीआइडी ने केस में फाइनल रिपोर्ट लगा दी.

मानवाधिकार उल्लंघन और आंदोलनकारी 'Rowdy' 

इसी बीच कोर्ट में आरक्षण का मामला चला. मानवाधिकार उल्लंघन को देखते हुए राज्य सरकार ने आंदोलनकारियों को 10 फ़ीसदी क्षैतिज आरक्षण दिया. आंदोलनकारी करुणेश जोशी ने याचिका दायर कर शासनादेश का लाभ देने की मांग की. जस्टिस तरुण अग्रवाल की एकलपीठ ने 1269/2004 के शासनादेश को संविधान का उल्लंघन करार देते निरस्त कर दिया.

राज्य सरकार ने 2010 आरक्षण नियमावली बनाई, तो उस वक्त के चीफ जस्टिस बारिन घोष व जस्टिस सर्वेश गुप्ता ने मामले में सुनवाई के दौरान आंदोलनकारियों के लिए ‘राउडी’ यानी कि उपद्रवी शब्द का प्रयोग करते हुए दोनों शासनादेशों के तहत नियुक्तियों पर रोक लगा दी.

Trivendra Rawat Uttarakhand shaheed sthal, CM त्रिवेंद्र सिंह रावत ने रामपुर तिराहा शहीद स्थल पर जाकर श्रद्धांजलि अर्पित कीी.
CM त्रिवेंद्र सिंह रावत ने रामपुर तिराहा शहीद स्थल पर जाकर श्रद्धांजलि अर्पित कीी.


अलग-अलग फ़ैसले 

इसके बाद अधिवक्ता रमन कुमार शाह ने आंदोलनकारियों की ओर से इन्टरवेंशन प्रार्थना पत्र दाखिल कर जस्टिस आलोक सिंह और जस्टिस सर्वेश कुमार गुप्ता की खंडपीठ में कोर्ट से पूछा कि राउडी उत्तराखंडी हैं या आंदोलनकार? इस पर कोर्ट ने मामला अग्रसारित कर दिया.

इसी मामले पर जस्टिस धूलिया और जस्टिस ध्यानी की खंडपीठ ने अलग-अलग फैसला दिया. ध्यानी ने आरक्षण को सही ठहराया तो धूलिया ने संविधान का उल्लंघन करार दिया. फिर मामला तीसरी बेंच को दे दिया गया, जिसने जस्टिस धूलिया का समर्थन किया.

अब यह है स्थिति

राज्य आंदोलकारी रमन शाह ने केस पर पुनर्विचार याचिका दायर की. रमन शाह ने तीनों आदेशों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की, इसमें आन्दोलनकारियों को सरकारी नौकरी में 10 प्रतिशत आरक्षण, पूरे मामले में दोषी आधिकारियों पर कार्रवाई और गवाह को मारने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है. सुप्रीम कोर्ट ने अभी राज्य आन्दोलनकारियों को 10 प्रतिशत आरक्षण के मामले में राज्य ते सभी 13 ज़िलाधिकारियों, प्रमुख सचिव गृह और उत्तराखंड आंदोलनकारी मंच को नोटिस जारी किए हैं.

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First published: October 2, 2019, 5:59 PM IST
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