उत्तराखंड की लीची खाने के लिए इस साल ज्यादा ढीली करनी होगी जेब
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उत्तराखंड की लीची खाने के लिए इस साल ज्यादा ढीली करनी होगी जेब
रामनगर में हर साल करीब 20 हज़ार मीट्रिक टन आम और 10 हज़ार मीट्रिक टन लीची का उत्पादन होता है. लेकिन इस साल ऐसा नहीं हो हुआ है.

उत्तराखंड के रामनगर में इस बार आम की पैदावार में जहां 25 प्रतिशत की कमी देखी जा रही है वहीं लीची में यह कमी 60 फीसदी तक है. इस बार कोरोना के साथ ही मौसम की ऐसी मार पड़ी कि लीची का उत्पादन चार हजार मीट्रिक टन सिमट कर रह गया

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रामनगर. उत्तराखंड (Uttarakhand) का रामनगर कॉर्बेट नेशनल पार्क (Corbett National Park) के अलावा अपनी फलपट्टी के लिए भी जाना जाता है. यहां 800 हेक्टेयर में आम और 900 हेक्टेयर में लीची के बाग-बगीचे हैं जिनमें हर साल करीब 20 हजार मीट्रिक टन आम (Mango) और 10 हजार मीट्रिक टन लीची (Litchi) का उत्पादन होता है. लेकिन इस साल ऐसा नहीं हुआ है. आम और लीची के शौकीनों के लिए यह बुरी खबर है. लगातार बनते-बिगड़ते रहे मौसम और कोरोनावायरस (COVID-19) की वजह से लागू लॉकडाउन से आम और लीची का उत्पादन गिरा है. इसलिए इस साल इनकी आपूर्ति कम रहेगी.

इस वर्ष 60 प्रतिशत तक गिरा उत्पादन 

रामनगर में आम और लीची के बागानों के ठेके लेने वाले इमरान बताते हैं कि इस बार लॉकडाउन के चलते वो बगीचों में दवाओं का छिड़काव नहीं कर पाए, इसकी वजह से फल पेड़ में नहीं रूक सका. इसका खामियाजा बागान मालिकों और बगीचे के ठेकेदारों को हुआ है. साथ ही इस साल बार-बार बारिश होने के चलते ठंड देर से गई जिससे लीची में बौर करीब 15 दिन देर से आया. उसका भी फसल को नुकसान हुआ है. इसके बाद हुई बेमौसम बारिश, ओले और आंधी ने इस वर्ष उन्हें काफी नुकसान पहुंचाया है.



इस बार यहां आम की पैदावार में जहां 25 प्रतिशत की कमी देखी जा रही है वहीं लीची में यह कमी 60 फीसदी तक है. इस बार कोरोना के साथ ही मौसम की ऐसी मार पड़ी कि लीची का उत्पादन चार हजार मीट्रिक टन सिमट कर रह गया.



किसानों को होगा फायदा! 

उद्यान अधिकारी अर्जुन सिंह परवाल बताते हैं रामनगर में लंगड़ा, दशहरी और चौसा आम की प्रजातियां मुख्य रूप से उगाई जाती हैं. साथ ही यहां रोज सेंटेड लीची की भी खेती की जाती है. यहां के आम और लीची की मांग दिल्ली, चंडीगढ़, मुंबई और कलकत्ता जैसे कई बड़े शहरों में होती है. वो बताते हैं कि इस बार आम की फसल को तो उतना नुकसान नहींं हुआ लेकिन लीची का काफी नुकसान पहुंचा है. चूंकि लीची की फसल क्षेत्र में बहुत कम है इसलिए ग्राहकों को इसकी मिठास के लिए ज्यादा दाम चुकाने पड़ सकते हैं. हालांकि वो इस बात पर संतोष जताते हैं कि इससे किसानों को लाभ मिल सकता है.

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