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काउंटडाउन: नतीजों की घड़ी नजदीक आते ही बढ़ने लगी सभी उम्मीदवारों की धड़कनें

काउंटडाउन: नतीजों की घड़ी नजदीक आते ही बढ़ने लगी सभी उम्मीदवारों की धड़कनें

नतीजों की घड़ी नजदीक आते ही कांग्रेस-भाजपा के तमाम दिग्गजों की धड़कने तेज हो गई हैं.

नतीजों की घड़ी नजदीक आते ही कांग्रेस-भाजपा के तमाम दिग्गजों की धड़कने तेज हो गई हैं.

उत्तराखंड में मतगणना की उल्टी गिनती शुरू होने के साथ ही सियासी दल और उम्मीदवारों में बेचैनी शुरू हो गई है. देवभूमि की 70 विधानसभा सीटों पर दांव लगा रहे 637 उम्मीदवारों की धड़कने बढ़ने लगी हैं. 11 मार्च को नई सरकार, वंशवाद, बागियों और दागियों पर मतदाताओं के मन की बात के साथ ईवीएम से बाहर आ जाएगी.

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    उत्तराखंड में मतगणना की उल्टी गिनती शुरू होने के साथ ही सियासी दल और उम्मीदवारों में बेचैनी शुरू हो गई है. देवभूमि की 70 विधानसभा सीटों पर दांव लगा रहे 637 उम्मीदवारों की धड़कने बढ़ने लगी हैं.

    11 मार्च को नई सरकार, वंशवाद, बागियों और दागियों पर मतदाताओं के मन की बात के साथ ईवीएम से बाहर आ जाएगी. उत्सुकता इस बात को लेकर है कि उत्तराखंड का जनमत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वादों या फिर सीएम हरीश रावत के इरादों के साथ खडा होगा.

    तमाम एग्जिट पोल की राय सामने आने के बाद अब 11 मार्च को ईवीएम खुलने की बारी है. उत्तराखंड में काउंटिंग की उल्टी गिनती शुरू होने के साथ ही सियासी दलों और सभी 637 उम्मीदवारों का चुनावी प्रसव पीड़ा के दौर से गुजरना स्वाभाविक है.

    पहले कईं ऐसे मौके आए जबकि पोल और सर्वे ऑड ईवन हो गए. लिहाजा कौन विधायक बनेगा और किसकी सरकार बनेगी ये तो ईवीएम खुलने के बाद ही तय होगा.

    कहने की जरूरत नहीं हैं कि उत्तराखंड में पूरा चुनाव प्रचार पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम हरीश रावत की पर्सनलिटी पर केंद्रित रहा. यानि मोदी लहर और रावत की जमीनी राजनीति के चुनावी मंथन का अमृत 11 मार्च को काउंटिंग के बाद निकलेगा. यूं भी कह सकते हैं कि उत्तराखंड के ऊंचे नीचे और टेडे मेढ़े पहाड़ी रास्तों पर नरेंद्र मोदी के करिश्मे का इंतिहान है. साथ ही खाँटी और जमीनी नेता हरीश रावत की सबसे बड़ी सियासी अग्निपरीक्षा है.

    खुद मुख्यमंत्री हरीश रावत तराई की किच्छा और मैदान की हरिद्वार ग्रामीण यानि दो सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं. लिहाजा कांग्रेस को सत्ता वापसी कराने के साथ रावत पर खुद दोनों सीटें जीतने का दबाव है. कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय सहसपुर और बीजेपी अध्यक्ष अजय भट्ट रानीखेत से चुनाव लड़ रहे हैं. लेकिन बागी उम्मीदवारों ने इन दोनों सूरमाओं के पसीने छुड़ा रखे हैं. लिहाजा किशोर और भट्ट की मौजूदा हार-जीत राजनीतिक भविष्य तय करने में अहम होगी.

    वैसे मोदी बनाम रावत की जंग में सबकी नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या उत्तराखंड में पूर्ण बहुमत वाली सरकार बन पाएगी. वजह ये है कि 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था. पूर्ववर्ती भुवन चंद्र खंडूरी, रमेश पोखरियाल निशंक, विजय बहुगुणा और मौजूदा हरीश रावत सरकार निर्दलीयों की वैसाखी पर टिक कर चली हैं. उत्सुकता ये जानने की भी है कि क्या उत्तराखंड का जनमानस कांग्रेस युक्त बीजेपी पर अपना भरोसा जताएगा.

    बीजेपी ने विधानसभा में हरीश रावत सरकार का तख्ता पलट करने वाले तत्कालीन बागियों और अन्य कांग्रेस छोड़ने वाले करीब एक दर्जन नेताओं पर दांव लगाया है. चौबटटाखाल में सतपाल महाराज, बाजपुर में यशपाल आर्य और हरक सिंह कोटद्वार में चुनाव लड़ रहे हैं. लिहाजा इन नेताओं की हार-जीत बीजेपी में आगे उनकी अहमियत और भविष्य दोनों तय करेगी.

    वैसे कांग्रेस ने भी भाजपा से आए पूर्व विधायक शैलेंद्र रावत पर यमकेश्वर, घनसाली में भीमलाल और पुरोला में राजकुमार पर दांव लगाया है. यानि जीत की खातिर कांग्रेस ने भी दलबदलुओं पर दरियादिली दिखाई. सूबे की इकलौती क्षेत्रीय पार्टी उत्तराखंड क्रांति दल के सामने खाता खोलकर सूबे की सियासत में अपनी प्रासंगिकता बरकरार रखने की चुनौती है. इसी तरह बहुजन समाज पार्टी के लिए हरिद्वार और उधमसिंहनगर में अपनी सियासी जमीन सुरक्षित रखने की सबसे बड़ी परीक्षा है.

    वैसे पिता पुत्र, पिता पुत्री, पति पत्नी और समधाने के सहारे उत्तराखंड में वंशवाद की बेल का भी इंतिहान है. पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी की पुत्री रितू खंडूरी यमकेश्वर और पूर्व सीएम विजय बहुगुणा के बेटे सौरभ बहुगुणा सितारगंज में बीजेपी के उम्मीदवार हैं.

    इसी तरह ऐन चुनाव से पहले कांग्रेस छोड़ने वाले यशपाल आर्य के बेटे संजीव आर्य ने नैनीताल में ताल ठोंकी है. पूर्व विधायक और विकासनगर में बीजेपी उम्मीदवार मुन्ना सिंह की पत्नी मधु चौहान चकराता सीट पर चुनाव लड़ रही हैं. इसी तरह गृहमंत्री राजनाथ सिंह के समधी नारायण सिंह राणा धनोल्टी में बीजेपी उम्मीदवार हैं.

    दिलचस्प बात ये है कि मतदाता पूरे विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान खामोश रहे और अब भी चुप्पी तोड़ने को तैयार नहीं हैं. सत्ताधारी कांग्रेस और विपक्षी बीजेपी दोनों बहुमत के साथ जीत का दावा कर रही हैँ.

    इस माहौल में अगर हरीश रावत को सरकार बचाने के लिए तराई मैदान में सीटें बढ़ानी होंगी. पहाड़ में पुरानी बचानी पडेंगी. इसके उलट भारतीय जनता पार्टी को तराई मैदान की पुरानी सीटें बचाते हुए पहाड़ में सीटें बढ़ानी होंगी. लेकिन रहस्य से परदा ईवीएम खुलने के बाद ही हटेगा.

    Tags: Uttarakhand news

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