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उत्तराखंड हाई कोर्ट का अहम फैसला, जासूसी के आरोपी पाकिस्तानी आबिद अली की 7 साल कैद की सज़ा बरकरार

उत्तराखंड हाई कोर्ट भवन

उत्तराखंड हाई कोर्ट भवन

Uttarakhand News : कथित जासूसी का ये मामला 11 साल पुराना है, जिसमें ट्रायल कोर्ट, अपीली कोर्ट और हाई कोर्ट के दखल से कई मोड़ आते रहे. अब जाकर ट्रायल कोर्ट के फैसले पर उच्च न्यायालय ने मुहर लगाई है.

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नैनीताल. हाईकोर्ट में राज्य सरकार की ओर से आबिद अली उर्फ असद अली उर्फ अजीत सिंह निवासी लाहौर (पाकिस्तान) की रिहाई आदेश के खिलाफ दायर विशेष अपील पर पूर्व में हुई सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था. बुधवार को कोर्ट ने अपना निर्णय सुनाते हुए आबिद अली की सजा को बरकरार रखते हुए गिरफ्तार किए जाने के आदेश जारी किए. मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति श्री रवींद्र मैठाणी की एकलपीठ में की गई. इससे पहले इस केस में निचली ट्रायल कोर्ट ने आरोपी आबिद को 7 साल की सज़ा सुनाई थी, जिसे हाई कोर्ट ने बरकरार रखने के आदेश दिए. वहीं, ट्रायल कोर्ट के फैसले के उलट अपीली कोर्ट ने इस मामले में आरोपी को रिहा करने के आदेश भी दिए थे, जिसमें हाई कोर्ट को चार साल पहले भी दखल देना पड़ा था.

क्या था मामला और इल्ज़ाम?
यह मामला 25 जनवरी 2010 का है, जब हरिद्वार के गंगनहर कोतवाली पुलिस ने आबिद को ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट, विदेश एक्ट और पासपोर्ट एक्ट के तहत थाना कोतवाली रुड़की गंगनहर में गिरफ्तार किया था. आबिद के पास से मेरठ, देहरादून, रुड़की और अन्य सैन्य ठिकानों के नक्शे मिले थे. एक पेन ड्राइव व गोपनीय जानकारियों से जुड़े कई दस्तावेज बरामद हुए थे. पुलिस ने रुड़की के मच्छी मुहल्ला स्थित उसके ठिकाने पर छापा मारा था, तो वहां से बिजली फिटिंग के बोर्ड तथा सीलिंग फैन में छिपाकर रखे गए करीब एक दर्जन सिम बरामद हुए थे. 19 दिसंबर 2012 को निचली कोर्ट ने अभियुक्त को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी, जिसको चुनौती देने के लिए अभियुक्त ने हाई कोर्ट में अपील की थी.

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क्या थी आरोपी की दलील?
अभियुक्त के अधिवक्ता ने कोर्ट में दायर अपील में कहा ​था कि आबिद के पते आदि के बारे में सही तथ्य नहीं लिखे गए, जिस पर अपर जिला जज (द्वितीय) हरिद्वार ने अभियुक्त को बरी करने के आदेश पारित किए थे. इसके बाद जेल अधीक्षक के स्तर से कोर्ट तथा एसएसपी को प्रार्थना पत्र देकर बताया गया कि अभियुक्त विदेशी नागरिक है और इसके लिए उसको रिहा करने से पहले उसका व्यक्तिगत बंधपत्र व अन्य औपचारिकताएं पूरी करनी आवश्यक थीं. अभियोजन पक्ष के मुताबिक एसएसपी द्वारा उक्त मामले में गंभीरता न दिखाते हुए उसे रिहा कर दिया था. राज्य की ओर से उक्त रिहाई आदेश के खिलाफ विशेष अपील 33/2014 दायर की गई. इसके बाद हाई कोर्ट के आदेश पर उसे फिर गिरफ्तार किया गया था.

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