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नैनीताल के चार खेत में लकड़ियों से बनाए जाते हैं अलग अलग डिजाइन 

पाइन

पाइन कोन डक है काफी मशहूर 

स्थानीय शिल्पकार उमेश चंद्र "कुमाऊँ काष्ठ कला केंद्र " के नाम से स्थानीय लकड़ियां जैसे अखरोट, चिनार, देवदार, चीड़ और बाकी जंगली लकड़ियों का

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    नैनीताल में ऐसी अनेकों आकृतियाँ हैं जो पर्यटकों को काफी लुभाती हैं.  इन्हीं में से एक है काष्ठ यानि लकड़ी की कला. लकड़ियों में अलग अलग आकृतियाँ देना एक अद्भुत कला है. नैनीताल नगर की कई सजावट भरी दुकानों पर यह कला देखने को मिलती हैं. लेकिन ऐसी कला के पीछे लगती है मेहनत जिसके बारे में लोगों को कम जानकारी होती है. नैनीताल से करीब  8 किमी. की दूरी पर स्थित है खुर्पताल की एक छोटी सी बसावट, जिसका नाम है चार. यहां स्थानीय शिल्पकार उमेश चंद्र \”कुमाऊँ काष्ठ कला केंद्र \” के नाम से स्थानीय लकड़ियां जैसे अखरोट, चिनार, देवदार, चीड़ और बाकी जंगली लकड़ियों का इस्तेमाल करते हुए लकड़ियों से अलग अलग आकृतियां बनाते हैं और उन्हें बेचते हैं. उमेश चंद्र बताते हैं कि उनको यह काम उनके पिताजी से उन्हें विरासत में मिला है. इस काम को करते हुए करीब 70 से 75 साल हो गए हैं. पूर्वजों से मिली इस विरासत में कला को आधुनिक रूप देने के लिए इनके पिताजी श्री रामलाल को साल 1990 में हाथ से बनाई लकड़ी की गणेश की मूर्ती के लिए उत्तर प्रदेश से प्रादेशिक पुरस्कार मिला. इसकी के साथ लकड़ी से बनाई पशुपतिनाथ मंदिर की आकृति के लिए साल 2016 में सरकार से उत्तराखंड राज्य शिल्प पुरस्कार भी मिला. उमेश ने लकड़ी की इन कलाओं की बारीकीयों को अपने पिता से घर के आंगन में ही सीखा है. स्कूल में पढ़ाई के साथ साथ इस कला में उनकी पकड़ बचपन से ही शुरू हो गई थी. रेत, छीजल, आरी, हथोड़ी से खेलने के शौक ने आज उमेश को काष्ठ कला के क्षेत्र में एक अच्छा काष्ठकार बना दिया है.
    यहां लकड़ी के अनेकों प्रकार के नमूने देखने को मिलते हैं. नैनीताल में चलने वाली नाव की आकृति, गणेश की प्रतिमा, मशरुम अगरबत्ती स्टैंड, बुल, खाट,आई लव नैनीताल वाली \’की चेन\’, ओल्ड मैन काफी मशहूर हैं. चीड़ के फलों से बनाई आकृतियां भी यहां देखने को मिलती हैं. चीड़ से बनाया पाइन कोन डक का नमूना भी यहां देखने को मिलता है.
    नैनीताल आने जाने वाले पर्यटकों को यह कलाकृतियां काफी आकर्षित करती हुई आई हैं लेकिन लॉकडाउन ने इस कला पर काफी असर डाला है. लॉकडाउन होने से यहां पर्यटकों का आना बंद हुआ तो यहां का व्यवसाय ठप हो गया. लॉकडाउन खुलने से थोड़ी बहुत राहत तो मिली लेकिन लगातार हो रहे भूस्खलन ने फिर से पर्यटकों की संख्या में कमी की है. अगर यूही चलता रहा तो बरसों से चली आ रही यह बेहतरीन काष्ठ कला कहीं विलुप्त ही ना हो जाए.

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