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बिना इजाजत नहीं कर सकते थे घर में रोशनी, अब सरकार के इस फैसले से जगी नई उम्‍मीद
Pauri-Garhwal News in Hindi

Anupam Bhardwaj | News18 Uttarakhand
Updated: February 27, 2020, 11:00 AM IST
बिना इजाजत नहीं कर सकते थे घर में रोशनी, अब सरकार के इस फैसले से जगी नई उम्‍मीद
कई सालों के बाद ग्रामीणों को विकास की उम्मीद दिखाई देने लगी है.

उत्‍तराखंड सरकार (Uttarakhand Government) ने कॉर्बेर्ट टाइगर रिज़र्व (Corbett Tiger Reserve) के सेंसटिव जोन (sensitive zone) की परिधि को दो किलोमीटर तक घटाने का निर्णय लिया है.

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कोटद्वार (Kotdwar). पूरा देश डिजिटल इंडिया (Digital India) का वो युग देख रहा है, जहां सब कुछ डिजिटल और सुविधाजनक होता जा रहा है. इस सब के बीच उत्‍तराखंड (Uttarakhand) में आज भी कुछ गांव ऐसे हैं, जो विकास की दौड़ में बहुत पीछे छूट गए हैं. इन्‍हीं गांवों में कोटद्वार (Kotdwar) के अंतर्गत आने वाले तैडिया (Taidiya) और पांड (Pand) गांव भी शामिल हैं. इन गांवों के ग्रामीण आज भी आजादी से पहले के भारत के समय में जी रहे है.

सेसिटव जोन ने बढ़ाई मुश्किलें
आलम यह है कि वन कानूनों के चलते ग्रामीणों को अपने ही गांव में जाने के लिए वन अधिकारियों के दफ्तर के चक्कर लगाने पड़ते हैं. इन गांवों पर वन कानूनों की बेड़ियां इस कदर कस चुकी थी कि ग्रामीण बिना वन अधिकारियों की मर्जी से घरों में रोशनी तक नही कर सकते हैं. वहीं, 11 जून 1991 का दिन इन गांवों के लिए काले दिन की तरह बनकर रह गया, जब तत्कालीन उत्तरप्रदेश सरकार ने कालागढ़ वन प्रभाग को कालागढ़ टाइगर रिज़र्व में परिवर्तित कर दिया था. इसी दिन ये गांव टाइगर रिज़र्व के सेंसिटिव जोन के भीतर आ गए. इन गांवों के साथ ही कुल 46 गांव भी सीटीआर के सेंसटिव जोन में जबरन शामिल कर लिया गया.

सरकार ने किया अहम बदलाव



सीटीआर में सेंसेटिव जोन में आने के कुछ सालों के भीतर ही दो दर्जन से ज्यादा गांव पूरी तरह खाली हो गए.  रोज नए-नए वन कानूनों से परेशान ग्रामीण अपने घरों, खेतों को छोड़ कर दूसरी जगह शिफ्ट होने को मजबूर हो गए. हालांकि ग्रामीणों ने गांव तो छोड़ दिए, लेकिन गांव लौटने की चाहत के चलते ग्रामीण इसके लिए लंबे समय तक संघर्ष करते रहे. आखिरकार उनका संघर्ष रंग ला ही गया. प्रदेश सरकार ने कॉर्बेर्ट टाइगर रिज़र्व के सेंसटिव जोन की परिधि को दो किलोमीटर तक घटाने का निर्णय लिया है. इस फैसले के बाद ग्रामीणों के चेहरे खिल गए हैं और कई सालों के बाद ग्रामीणों को विकास की उम्मीद दिखाई देने लगी है.

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First published: February 27, 2020, 10:52 AM IST
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अपडेटेड: April 09 (05:00 PM)
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स्रोत: जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी, U.S. (www.jhu.edu)
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