गढ़वाल जाने के लिए नहीं मिलेंगी GMOU बसें... 80 बसों के परमिट सरेंडर, बाकी भी कतार में
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गढ़वाल जाने के लिए नहीं मिलेंगी GMOU बसें... 80 बसों के परमिट सरेंडर, बाकी भी कतार में
जीएमओयू के बेड़े की जल्द ही 450 बसों में से 400 बसें जल्द ही हट जाएंगी.

1943 में स्थापित गढ़वाल मोटर ओनर्स यूनियन लिमिटेड की बसें दशकों तक गढ़वाल के पहाड़ी इलाकों में आवाजाही का एकमात्र ज़रिया रही हैं.

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कोटद्वार. कभी एशिया की सबसे बड़ी निजी परिवहन कंपनियों में गिनी जाने वाली जीएमओयू लिमिटेड की बसें अब इतिहास बनने जा रही हैं. पिछले 78 साल से गढ़वाल के सार्वजनिक परिवहन की रीढ़ रही जीएमओयू लिमिटेड से जुड़े बस मालिक अपनी बसों के परमिट सरेंडर कर रहे हैं और जीएमओयू प्रबंधन का कहना है कि संभवतः जल्द ही सभी बसों के परमिट सरेंडर कर दिए जाएंगे. इसकी वजह कोविड-19 की वजह से पैदा हुई स्थितियों में बसें चलाना घाटे का सौदा बन जाना है. दरअसल सरकार ने बसों का किराया तो बढ़ा दिया है लेकिन इस किराए पर लोग सफ़र करने को तैयार ही नहीं दिख रहे, इसलिए बस मालिकों के लिए बसें चलाना नुकसादेह साबित होने लगा है.

खाली गईं बसें

1943 में स्थापित गढ़वाल मोटर ओनर्स यूनियन लिमिटेड की बसें दशकों तक गढ़वाल के पहाड़ी इलाकों में आवाजाही का एकमात्र ज़रिया रही हैं.  GMOU का हेडक्वार्टर कोटद्वार में है. GMOU लिमिटेड के अध्यक्ष जीत सिंह पटवाल का कहना है कि कोरोना काल में बस मालिक पहले ही आर्थिक तंगी का सामना कर रहे थे. सरकार के किराया बढ़ाने के फ़ैसले से स्थिति और खराब हो गई हैं.



पटवाल बताते हैं कि कि सरकार के फ़ैसले के बाद चार दिन तक ऋषिकेश और हरिद्वार में बसों का ट्रायल किया गया था लेकिन कई घण्टे खड़े रहने के बाद भी बसों को सवारियां नहीं मिली. इसके बाद बसों को खाली जाना पड़ा. ऐसे में बस मालिकों के लिए बसें चलाना संभव नहीं रह गया है और वह अपने परमिट सबमिट कर रहे हैं.
टैक्स माफ़ी की थी मांग

जीएमओयू अध्यक्ष ने कहा कि सरकार से टैक्स माफी की मांग की गई थी लेकिन सरकार ने अपना पल्ला झाड़ते हुए किराये में वृद्धि कर दी जिसका बोझ आम आदमी पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि यूनियन पुरानी दरों पर बसें चलाने को तैयार है लेकिन सरकार को भी टैक्स माफ़ करना चाहिए.

पटवाल बताते हैं कि बुधवार तक 80 बस मालिकों ने अपने परमिट सबमिट कर दिए थे. यह संख्या गुरुवार को बढ़ती अगर परिवहन विभाग इस प्रक्रिया को बंद नहीं करता. परिवहन विभाग ने परमिट सबमिट करने की प्रक्रिया को यह कहकर फ़िलहाल रोक दिया है कि इसे ऑनलाइन किया जाएगा और इसमें एक-दो दिन का समय लगेगा.

पटवाल कहते हैं कि यह प्रक्रिया शुरु हो जाएगी तो और भी बस मालिक अपने परमिट सबमिट करेंगे और जीएमओयू के बेड़े की जल्द ही 450 बसों में से 400 बसें हट जाएंगी. अगर कोरोना वायरस का कहर खत्म नहीं हुआ तो बारिश खत्म होते-होते संभव है कि जीएमओयू के बेड़े में कोई बस न रहे.

बनी रहेगी GMOU 

बसों से पहाड़ जाने वाले लोगों को अब इस बात के लिए तैयार होना चाहिए कि बरसात के बाद जब वह गढ़वाल जाएं तो 78 साल में पहली बार उन्हें जीएमओयू की बसें न दिखें.

हालांकि इसका अर्थ यह नहीं होगा कि जीएमओयू ही ख़त्म हो जाएगा. पटवाल के अनुसार जीएमओयू के पास 5 पैट्रोल पंप और बहुत सी संपत्ति है जिससे उसे किराया मिलता है. अपने 180 कर्मचारियों को तनख्वाह देने के लिए जीएमओयू की कमाई पर्याप्त है.

यह भी बता दें कि नो प्रॉफ़िट-नो लॉस पर चलने वाली जीएमओयू का पिछले साल का टर्नओवर 56 करोड़ रुपये था.
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