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कार्यकर्ताओं में ही विश्वास नहीं बचा... क्या करेगा उत्तराखंड क्रांति दल

कार्यकर्ताओं में ही विश्वास नहीं बचा... क्या करेगा उत्तराखंड क्रांति दल

उत्तराखंड क्रांति दल का चुनाव निशान.

उत्तराखंड क्रांति दल का चुनाव निशान.

लोकसभा चुनाव में दल के जनाधार वाले वरिष्ठ नेताओं दिवाकर भट्ट, काशी सिंह ऐरी और बीडी रतूड़ी समेत अन्य नेता ऐन वक्त पर चुनाव लड़ने के बजाय पीठ दिखाकर निकल लिए थे.

    अलग उत्तराखंड राज्य की लड़ाई लड़कर उसे जीतने वाला राज्य के सबसे पुराना क्षेत्रीय दल यूकेडी आज अपनों के बीच ही सबसे ज्यादा ग़ैर है. राज्य के पहले विधानसभा चुनाव में 4 सीटें झटकने के बाद हर चुनाव में यूकेडी का ग्राफ़ लगातार गिरता रहा. कई बार टूटने के बाद दल में किसी तरह एकता तो हुई लेकिन इस लोकसभा चुनाव में बड़े नेताओं के चुनाव से किनारा करने के बाद आज इसकी स्थिति मात्र उपस्थिति दर्ज करने तक ही सिमट गई है.

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    1979 में स्थापित हुई यूकेडी ने अलग राज्य के लिए न सिर्फ़ आंदोलन छेड़ा था बल्कि यह राज्य हासिल भी किया. लेकिन यूकेडी न तो कभी अपने कुनबे को संभाल पाई और न ही कभी उद्देश्यों के प्रति गंभीर दिखी. पार्टी की स्थिति कितनी ख़राब है इसका अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि लोकसभा चुनाव में पार्टी के बड़े नेता ऐन वक्त पर चुनाव लड़ने का साहस तक नहीं जुटा पाए.

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    यूकेडी अध्यक्ष और फ़ील्ड मार्शल कहे जाने वाले दिवाकर भट्ट कहते हैं कि ज़मीनी हकीकत को देखकर ही फ़ैसला लेना पड़ता है. उन्होंने कहा कि अगर पार्टी का अध्यक्ष ही हार गया तो पार्टी ख़त्म समझो.

    जब जहाज का कैप्टन ही जब उसे मुसीबत में छोड़ भागे तो स्थिति की कल्पना की जा सकती है. राज्य प्राप्ति के बाद के विधानसभा चुनाव में पहले 4, फिर 3 और अंत में 1 सीट पर आने के बाद यूकेडी पर जनता ने विश्वास करना ही छोड़ दिया. जनता का यह रवैया बेवजह भी नहीं था. भाजपा-कांग्रेस की सत्ताओं के साथ अपने स्वार्थ के लिए यूकेडी नेताओं की जुगलबंदी और इस कारण दल के टूट दर टूट इसका कारण बनी.

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    हालत यह है कि पार्टी कार्यकर्ता निराश हो चुके हैं. यूकेडी कार्यकर्ता गणेश भट्ट कहते हैं कि पार्टी ने जनता का भरोसा खोया है. वह कहते हैं कि अगर गढ़वाल सीट पर दिवाकर भट्ट, नैनीताल सीट पर काशी सिंह ऐरी मतदाता होते तो कार्यकर्ताओं में अलग ही उत्साह होता और जनता में उत्सुकता भी.

    गढ़वाल सीट से प्रत्याशी शांतिप्रसाद भट्ट भी मानते हैं कि पार्टी को उसका शेयर नहीं मिला. वह यह भी कहते हैं कि पार्टी संगठन कमज़ोर है लेकिन कहते हैं कि कमियों की समीक्षा की जा रही है. शांतिप्रसाद भट्ट दावा करते हैं कि संगठन मजबूत होते है यूकेडी का फिर उभार होगा.

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    लोकसभा चुनाव में दल के जनाधार वाले वरिष्ठ नेताओं दिवाकर भट्ट, काशी सिंह ऐरी और बीडी रतूड़ी समेत अन्य नेता ऐन वक्त पर चुनाव लड़ने के बजाय पीठ दिखाकर निकल लिए थे. अचानक बदले प्रत्याशियों के कारण भी जनता में अच्छा संदेश नहीं गया. अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए दल का इस्तेमाल और फिर कई टुकड़ों में बंटकर किसी तरह एक हो चुकी यूकेडी पर जनता आखिरकार विश्वास करे भी तो कैसे.

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    Tags: Garhwal S28p02, North Uttarakhand Lok Sabha Elections 2019, Pauri Garhwal news, Uttarakhand Lok Sabha Elections 2019, Uttarakhand news

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