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NIT प्रबंधन के लचर रवैये से बिगड़ी स्थिति, नियमों के बावजूद कार्रवाई को तैयार नहीं

एनआईटी आर्डिनेंस और ऐक्ट में मौजूद नियमों को तोड़ने पर कड़ी कार्रवाई का जिक्र तो है लेकिन इस पर अमल होता नहीं दिख रहा.

एनआईटी आर्डिनेंस और ऐक्ट में मौजूद नियमों को तोड़ने पर कड़ी कार्रवाई का जिक्र तो है लेकिन इस पर अमल होता नहीं दिख रहा.

बिना सूचना हॉस्टल और कैंपस छोड़ने पर भी अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान है. 20 दिन तक लगातार बिना सूचना के अनुपस्थित रहने पर छात्र का नाम काटा जा सकता है.

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श्रीनगर गढ़वाल में मौजूद प्रदेश के इकलौते एनआईटी शिफ्टिंग की छात्रों की मांग और आंदोलन के आगे संस्थान प्रबंधन के घुटने टेक देने के बाद अब छात्रों पर सीधी कार्रवाई के मामले पर भी एनआईटी प्रबंधन बैकफुट पर नजर आ रहा है. हालांकि एनआईटी आर्डिनेंस और ऐक्ट में मौजूद नियमों को तोड़ने पर कड़ी कार्रवाई का जिक्र तो है लेकिन इस पर अमल होता नहीं दिख रहा. उधर एनआईटी प्रशासन के अब तक सुस्त व लचर रवैये को देखते हुए छात्रों का हौसला बढ़ गया है.

एनआईटी को मैदानी क्षेत्रों में शिफ्ट करने की मांग को लेकर पिछले साल 8 दिन और इस साल कक्षाओं और परीक्षाओं के बहिष्कार के साथ आंदोलन करने व कैम्पस छोड़ने के बाद 19 वें दिन भी कैम्पस नहीं पहुंचने से एनआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के अंदर अनुशासन की धज्जियां उड़ती दिखाई दे रही हैं.

ख़ास बात यह है कि नियम कहते हैं कि किसी भी कोर्स में 65 प्रतिशत उपस्थिति यदि पूरी नहीं है तो छात्र को परीक्षा में नहीं बैठने दिया जाएगा. इसके अलावा बिना सूचना हॉस्टल और कैंपस छोड़ने पर भी अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान है. और तो और 20 दिन तक लगातार बिना सूचना के अनुपस्थित रहने पर छात्र का नाम काटा जा सकता है. लेकिन एनआईटी प्रबंधन इसे लेकर ख़ामोश है.

एनआईटी प्रबंधन यह मानता है कि छात्रों के स्थापित नियमों को तोड़ने से एनआईटी की सारी व्यवस्थाएं गड़बड़ा गई हैं और इसने राष्ट्रीय स्तर के एक प्रतिष्ठित संस्थान के अनुशासन को बुरी तरह तार-तार किया है. एनआईटी प्रबंधन यह भी कह रहा है कि डीन ऐकेडमिक के प्रस्ताव पर सीनेट की बैठक में ही अनुशासनात्मक कार्रवाई का फ़ैसला लिया जा सकता है लेकिन सवाल ये है कि जब अनुशासन को लेकर ऐक्ट और आर्डिनेंस पर नियम साफ हैं तो फिर सीनेट की बैठक का इंतजार क्यों.

दूसरी तरफ आंदोलित छात्रों का कहना है कि जब जान के खतरे के सामने अनुशासनात्मक कार्रवाई का डर कुछ नहीं.

लेकिन जानकार इस प्रकरण पर कई सवाल उठा रहे हैं. पहला तो यह कि अन्य शैक्षणिक संस्थानों में भी छात्र इसी तरह मनमाना फैसला करवाने पर प्रबंधन को मजबूर करने लगें तो स्थिति क्या होगी? प्रश्न यह भी है कि सुरक्षा के नाम पर कैम्पस शिफ्ट करने को लेकर एनआईटी प्रबंधन को घुटनों पर ले आने वाले छात्र क्या किसी और स्थान पर दुर्घटना न होने की गारंटी ले सकते हैं? सबसे बड़ा सवाल राज्य और केन्द्र सरकार के रवैये पर है जो दस साल में स्थाई कैम्पस के लिए ज़मीन नहीं ढूंढ पाई और इस लापरवाही की वजह से प्रदेश का एकमात्र एनआईटी ऐकेडमिक एक्सीलेंस नहीं, छात्रों के विरोध के लिए जाना जा रहा है.

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