यहां अस्पताल पहुंचने के लिए मरीजों को चलना पड़ता है 35 किलोमीटर
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यहां अस्पताल पहुंचने के लिए मरीजों को चलना पड़ता है 35 किलोमीटर
टिहरी झील बनने के बाद से खुद को अभिशापित महसूस कर रहे प्रतापनगरवासी वास्तव में टिहरी झील का दंश झेलने को मजबूर हैं. टीएचडीसी भले ही आज बिजली उत्पादन कर करोड़ों रुपए कमा रहा हो, लेकिन जिस झील के लिए लोगों ने अपना सबकुछ न्यौछावर किया उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है.

टिहरी झील बनने के बाद से खुद को अभिशापित महसूस कर रहे प्रतापनगरवासी वास्तव में टिहरी झील का दंश झेलने को मजबूर हैं. टीएचडीसी भले ही आज बिजली उत्पादन कर करोड़ों रुपए कमा रहा हो, लेकिन जिस झील के लिए लोगों ने अपना सबकुछ न्यौछावर किया उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है.

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टिहरी झील बनने के बाद से खुद को अभिशापित महसूस कर रहे प्रतापनगरवासी वास्तव में टिहरी झील का दंश झेलने को मजबूर हैं. टीएचडीसी भले ही आज बिजली उत्पादन कर करोड़ों रुपए कमा रहा हो, लेकिन जिस झील के लिए लोगों ने अपना सबकुछ न्यौछावर किया उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है.

डोबरा चांठी पुल न बनने के कारण पहले ही अलग-थलग पड़े प्रतापनगरवासी अब स्वास्थ्य सुविधाओं से भी महरूम होते दिखाई दे रहे हैं. टिहरी झील बनने के बाद से ही प्रतापनगर की करीब डेढ़ लाख की आबादी सड़क स्वास्थ्य शिक्षा जैसी मूलभूत समस्याओं से जूझ रही है.

साल 2013 में तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा द्वारा डोबरा क्षेत्र में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बनाने की घोषणा की गई थी, जिसके लिए पुर्नवास विभाग द्वारा स्वास्थ्य विभाग को टीएचडीसी की करीब 16 नाली भूमि आवंटित की गई.



अगस्त 2014 में विभाग द्वारा कार्रवाई भी शुरू कर दी गई और प्रथम फेज के एस्टीमेट के तौर पर 4,34,000 हजार रुपए भी स्वीकृत हो गए, लेकिन बाद में टीएचडीसी ने अपनी भूमि देने से मना कर दिया और इस मामले को लेकर हाईकोर्ट चला गया.
कनेक्टिविटी नहीं होने के चलते प्रतापनगर के लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं और किसी तरह की इमरजेंसी होने पर उन्हें 35 किलोमीटर की दूरी तय कर जिला अस्पताल बौराड़ी पहुंचना पड़ता है.

डोबरा में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बनने से प्रतापनगर और थौलधार के करीब 56 गांवों के ग्रामीणों को इसका लाभ मिल सकता था. पुर्नवास निदेशक द्वारा अब शासन में प्रस्ताव भेजकर डोबरा में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के लिए सरकारी भूमि मांगी गई है.
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