पौड़ी में ‘धगुलि, हंसुलि’ जोड़ेंगी बच्चों को गढ़वाली बोली, संस्कृति से

पहली से पांचवीं तक की कक्षाओं के लिए गढ़वाली में स्थानीय परंपराओं, उत्तराखंड के हीरो, लोक संस्कृति के बारे में जानकारी देती हुई किताबें तैयार की गई हैं.

Sudhir Bhatt | News18 Uttarakhand
Updated: June 28, 2019, 6:51 PM IST
पौड़ी में ‘धगुलि, हंसुलि’ जोड़ेंगी बच्चों को गढ़वाली बोली, संस्कृति से
राज्य में पहली बार पहली से पांचवीं तक की कक्षाओं के लिए गढ़वाली में स्थानीय परंपराओं, उत्तराखंड के हीरो, लोक संस्कृति के बारे में जानकारी देती हुई किताबें तैयार की गई हैं.
Sudhir Bhatt | News18 Uttarakhand
Updated: June 28, 2019, 6:51 PM IST
दक्षिण भारत और दिल्ली में त्रिभाषा फ़ॉर्मूले पर हुए विवाद से दूर पौड़ी में भाषा को लेकर एक प्रयोग ख़ामोशी से हो रहा है. अंग्रेज़ी पढ़ाने के दबाव के बीच मातृभाषा में शिक्षा देने का कोशिश पौड़ी ब्लॉक से शुरु हुई है. राज्य में पहली बार पहली से पांचवीं तक की कक्षाओं के लिए गढ़वाली में स्थानीय परंपराओं, उत्तराखंड के हीरो, लोक संस्कृति के बारे में जानकारी देती हुई किताबें तैयार की गई हैं. प्रयास यह है कि नई पीढ़ी अपनी बोली, संस्कृति से जुड़ी रहे.

पलायन से बढ़ी चिंता 

गैर हिंदी राज्यों में स्थानीय भाषाएं पाठ्यक्रमों का हिस्सा हैं और इसका असर इन समाजों में भी नज़र आता है. लेकन उत्तराखंड में चिंता का विषय यह भी है कि यहां की नई पीढ़ी अपनी बोली-संस्कृति से दूर होती जा रही है. इसलिए पौड़ी के ज़िलाधिकारी डीएस गबरियाल की पहल पर विषय विशेषज्ञों की टीम ने पहली से पांचवीं तक की कक्षाओं के लिए गढ़वाली पुस्तकें तैयार की हैं.

इनके नाम भी प्रचलित स्थानीय आभूषणों पर रखे गए हैं. पहली क्लास की किताब का नाम है- धगुलि, दूसरी के लिए है हंसुलि, तीसरी के लिए छुबकी, चौथी के लिए पैजबी और पांचवीं क्लास के लिए झुमकि.  पाठ्यक्रम समिति के संयोजक गणेश खुगशाल गणी कहते हैं कि पूरी कोशिश की गई है कि गढ़वाली की इन किताबों का स्तर किसी भी दूसरे पाठ्यक्रम की पुस्तक से अलग कमतर हो.

पायलट प्रोजेक्ट 

गढ़वाल कमिश्वर बीवीआरसी पुरुषोत्तम इसे एक अच्छी पहले कहते हैं. वह कहते हैं कि सभी शिक्षाविद् मानते हैं अपनी मातृभाषा में बच्चे जल्दी सीखते हैं. अगर यह पायजल प्रोजेक्ट सफल रहता है तो इसे अन्य ब्लॉकों और ज़िलों में भी विस्तार दिया जाएगा.

पौड़ी में पलायन राज्य में सबसे अधिक है और इसका असर स्थानीय बोली और संस्कृति पर भी नज़र आने लगा है. ऐसे में नई पीढ़ी को सीधे स्कूली पाठ्यक्रम से ही अपनी भाषा के माध्यम से समाज से जोड़ने की यह पहल ज़रूरी भी लगती है.
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First published: June 28, 2019, 6:51 PM IST
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