इस चमड़े की गेंद के लिए डेढ़ सौ साल से भिड़ रहे हैं खिलाड़ी... देखिए क्या है गिंदी कौथिक

यह खेल दुनिया का पहला ऐसा खेल है जिसमें समय की कोई बाध्यता नही होती. चमड़े की गेंद से यह खेल को खेला जाता है.

ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व रखने वाले इस मेले की शुरुआत साल 1872 से हुई.

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पौड़ी गढ़वाल. इंग्लैंड में खेले जाने वाले रग्बी खेल को तो शायद आपने देखा ही होगा लेकिन आपको जानकर हैरानी हो सकती है कि रग्बी से भी ज्यादा रोमांचक खेल बरसों से पहाड़ों में खेला जाता है. गिंदी कौथिक में खेले जाने वाले इस मैच में एक साथ अनगिनत खिलाड़ी यानी कि जितने चाहें, उतने खिलाड़ी दो पक्षों में बंट जाते हैं और मैच खेलते हैं. यह ख़ास खेल मकर संक्रांति के मौके पर होता है.

जितने चाहे, उतने खिलाड़ी 

पौड़ी गढ़वाल के थल नदी, डाडामण्डी और मवाकोट में मकर संक्रांति के दिन होने वाले इस मुकाबले में शामिल होने वाले खिलाड़ी गेंद को अपने पाले में डालने के लिए मैदान में संघर्ष करते हैं. ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व रखने वाले इस मेले की शुरुआत साल 1872 से हुई.

यह खेल दुनिया का पहला ऐसा खेल है जिसमें समय की कोई बाध्यता नही होती. चमड़े की गेंद से यह  खेल को खेला जाता है.

डाडामंडी में होने वाले खेल के लिए गेंद छवाण राम तिवाड़ी के ही वंशज बनाते है. गेंद का वजन 5 किलो से लेकर 15 किलो तक रखा जाता  है. जो टीम पहले गेंद को अपनी सीमा तक ले गई जीत उसी की मानी जाती है.

बढ़ रहा है रोमांच 

गिन्दी के मुकाबले को लेकर रोमांच हर साल बढ़ता जा रहा है. हज़ारों की तादाद में दर्शक गिन्दी का मैच देखने आते हैं. मैच के दौरान कई बार खिलाड़ी बुरी तरह ज़ख्मी भी हो जाते हैं बावजूद इसके  खिलाड़ियों का उत्साह कम नहीं होता.

ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही गिन्दी कौथिक देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक अपनी अलग पहचान बनाएगा.

 

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