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कड़कड़ाती ठंड के बीच केवल लंगोट पहनकर इस महादेव मंदिर में लोट लगाते हैं भक्‍त

पौड़ी गढ़वाल -  पौराणिक काल से चली आ रही इन धार्मिक परम्पराओं को सहेजे जाने की आवश्यकता है.

पौड़ी गढ़वाल - पौराणिक काल से चली आ रही इन धार्मिक परम्पराओं को सहेजे जाने की आवश्यकता है.

देवभूमि उत्तराखंड में आज भी ऐसी कई धार्मिक परम्पराएं हैं, जिन्हें देख हर कोई आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रह सकता. आज के आधुनिक युग में भी ये जहां बदस्तूर जारी हैं, वहीं बड़ी संख्या में जनता का इन परम्पराओं से जुड़ाव ईश्वर में उनकी अटूट आस्थाओं का द्योतक भी है.

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देवभूमि उत्तराखंड में आज भी ऐसी कई धार्मिक परम्पराएं हैं, जिन्हें देख हर कोई आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रह सकता. आज के आधुनिक युग में भी ये जहां बदस्तूर जारी हैं, वहीं बड़ी संख्या में जनता का इन परम्पराओं से जुड़ाव ईश्वर में उनकी अटूट आस्थाओं का द्योतक भी है. इन्हीं में से एक अलौकिक परम्परा है श्रीनगर गढ़वाल के प्राचीन कमलेश्वर महादेव मंदिर में हर वर्ष अचला सप्तमी पर होने वाली घृत-कमल और लोट परिक्रमा की धार्मिक परम्परा. हमेशा की तरह इस वर्ष भी देर रात्रि से सुबह तक चले इस देव आयोजन के दिव्य दर्शन हजारों श्रद्धालुओं ने किए.

भगवान शिव और पार्वती के विवाह को भले आम आदमी ने केवल कथाओं में पढ़ा हो, लेकिन कभी गढ़वाल के राजाओं की राजाओं की राजधानी रहे श्रीनगर गढ़वाल स्थित प्राचीन कमलेश्वर मंदिर में आज भी शिव और पार्वती के विवाह की अनूठी रस्म का न केवल निर्वहन किया जाता है बल्कि इस पुण्य अवसर के दर्शन कर भक्त अपने को सौभाग्यशाली भी मानते हैं. हर वर्ष होने वाली इस अनूठी परम्परा में भगवान शिव को कामाशक्त भाव जागृत करने के लिए घी का लेप किया जाता है.

मान्यता है कि तारकासुर राक्षस के भय से जब देवताओं में हाहाकार मच गया तो भगवान विष्णु ने शिवपुत्र द्वारा तारकासुर के वध की बात उन्हें बताई. इसके बाद भगवान शिव को पार्वती से विवाह को मनाने के लिए शिव आराधना की गई. इसके बाद शिवपुत्र कार्तिकेय स्वामी द्वारा तारकासुर का वध किया गया. इस दौरान भगवान आशुतोष को 52 व्यंजन और 36 प्रकार का भोग लगाया जाता है.

इस अवसर पर घृत कमल के बाद होने वाली लोट परिक्रमा की रस्म भी हर किसी को आश्चर्यचकित करती है. इसमें विश्व शांति और मंगल की कामना के उद्देश्य से दिगम्बर रूप में मंदिर के महंत द्वारा कड़कड़ाती ठंड में मात्र लंगोट में नंगे बदन मंदिर के फर्श पर लोटते हुए मंदिर की परिक्रमा की जाती है. इसे देखने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु मंदिर परिसर और आसपास के भवनों की छतों पर भी मौजूद रहते हैं. ये सारी प्रक्रियाएं देर शाम शुरू होकर मध्यरात्रि तक चलती हैं. इसके बाद भक्तों को भगवान शिव के लिंग पर मौजूद घी को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है.

पौराणिक काल से चली आ रही इस परम्परा को प्रचारित-प्रसारित करने के लिए मंदिर महंत के साथ श्रद्धालु भी सरकारी सहयोग आवयश्क मानते हैं. मंदिर महंत आशुतोष पुरी का कहना है कि पौराणिक काल से चली आ रही इन धार्मिक परम्पराओं को सहेजे जाने की आवश्यकता है. उनका कहना है कि आज भी देवभूमि के विभिन्न मठ मंदिरों में कई अनोखी धार्मिक परम्पराओं का निर्वहन किया जाता है, जिससे ये स्थान जागृत रहते हैं. उनका कहना है कि समाज में व्याप्त काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसी भावनाओं के शमन के लिए कमलेश्वर मंदिर में घृतकमल और लोट परिक्रमा जैसी धार्मिक परम्पराओं का निर्वहन किया जाता है, जिनके प्रति सरकारों का ध्यान कभी नहीं रहा.

कमलेश्वर मंदिर पहुंचे श्रद्धालु गणेश डिमरी, हरीश पुरी और त्रिलोकचन्द्र थपलियाल का कहना है कि संस्कृति और धर्मस्व मंत्रालय सरकारों ने बनाया जरूर है, लेकिन आज तक इस तरह की धार्मिक परम्पराओं को संरक्षण-संवर्द्धन का काम कभी नहीं किया गया, जो बताता है कि ये केवल नामभर से ज्यादा कुछ नहीं है. पूरे विश्व में एकमात्र श्रीनगर के कमलेश्वर महादेव मंदिर में होने वाले शिव विवाह और लोट परिक्रमा की इस धार्मिक परम्परा को व्यापक तौर पर देश-विदेश में प्रचारित-प्रसारित करने की जहां आवश्यकता है, वहीं इसे धार्मिक पर्यटन और तीर्थाटन से भी जोड़ा जा सकता है.

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