पिथौरागढ़ में 3000 मीटर पर बन रही है हाई एल्टीट्यूड लैब... मिलेंगे जलवायु परिवर्तन के सटीक आंकड़े

पंचाचूली में तीन करोड़ की लागत से हाई एल्टीट्यूट लैब में ग्लेशियरों के सटीक अध्ययन के लिए नई तकनीक के उपकरण लगाए जाने हैं.
पंचाचूली में तीन करोड़ की लागत से हाई एल्टीट्यूट लैब में ग्लेशियरों के सटीक अध्ययन के लिए नई तकनीक के उपकरण लगाए जाने हैं.

हाई एल्टीट्यूट लैब की मदद से ग्लेशियरों की मोटाई नापने के साथ ही उनके पिघलने की भी सही जानकारी आसानी से मुहैय्या होगी.

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पिथौरागढ़. उच्च हिमालयी इलाकों की स्टडी के लिए जीबी पंत पर्यावरण संस्थान पंचाचूली में लैब स्थापित करने जा रहा है. केन्द्र के सहयोग से हिमालय स्टडी मिशन के तहत लगने वाली इस लैब की मदद से जहां ऊंचे इलाकों में होने वाले बदलावों पर नज़र रखी जाएगी. इससे मौसमी बदलाव की जानकारी भी आसानी से मिल सकेगी. इसके अलावा इस लैब से ग्लेशियरों के अध्ययन में मदद मिलेगी और जलवायु परिवर्तन के उन पर असर से जुड़े सटीक आंकड़े मिल सकेंगे. पर्यावरण में हो रहे बदलावों पर नज़र रखने से भूस्खलन, बादल फटने जैसी प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि को समझना आसान होगा.

ग्लेशियरों के अध्ययन में फ़ायदा 

तीन हज़ार मीटर से अधिक की ऊंचाई पर पंचाचूली के मेलवा ग्लेशियर पर में एक ऐसी लैब लगने जा रही है, जिसका फायदा कई मायनों में मिलेगा. तीन करोड़ की लागत से हाई एल्टीट्यूट लैब में ग्लेशियरों के सटीक अध्ययन के लिए नई तकनीक के उपकरण लगाए जाने हैं. लैब शुरू होने के बाद जहां सभी जानकारी वैज्ञानिकों तक ऑनलाइन पहुंच जाएगी वहीं ऊंचाई वाले इलाकों में होने वाली मौसमी हलचल की भी सटीक भविष्यवाणी की जा सकेगी.



जीबी पंत हिमालयन पर्यावरण एवं विकास संस्थान के डायरेक्टर डॉक्टर आरएस रावल ने बताया कि लैब को स्थापित करने की सभी तैयारियां हो चुकी है. इसी महीने लैब काम करना शुरू देगी. हाई एल्टीट्यूट लैब की मदद से ग्लेशियरों की मोटाई नापने के साथ ही उनके पिघलने की भी सही जानकारी आसानी से मुहैय्या होगी. यही नहीं इससे ग्लेशियरों में मौजूद पानी की मात्रा के साथ उसकी गुणवत्ता का भी पता लगाया जा सकेगा.
कई नई जानकारियां मिलेंगी 

वैज्ञानिकों का दावा है कि इस हाईटेक लैब की मदद से ग्लोबल वार्मिंग के हिमालया पर पड़ रहे प्रभावों की भी स्टडी आसान हो जाएगी. राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन  के नोडल अफसर डॉक्टर किरीट कुमार ने बताया कि लैब कई मायनों में लाभकारी सिद्ध होगी. साथ ही इसकी मदद से मिलने वाले आंकड़ों से कई जानकारियां मिल सकेंगी.

दरअसल हिमालयी इलाकों में बीते कुछ सालों में बड़े स्तर पर बदलाव देखने को मिले हैं. पर्यावरण में हो रहे लगातार बदलावों से बादल फटने के साथ ही भूस्खलन की घटनाओं में भी ख़ासा इज़ाफा हुआ है. ऐसे में हाई एल्टीट्यूट लैब जहां इन बदलावों के कारणों का पता लगाने में मददगार साबित होगी, वहीं खतरे से पहले लोगों को आगाह करने के लिए भी इसके आंकड़े कारगर साबित होंगे.
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