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इंडो-चाइना ट्रेड पर कोरोना फिर भारी, हजारों परिवारों की रोजी-रोटी पर आया संकट

तीन महीने तक होने वाले ट्रेड के दौरान गुंजी मंडी पूरी तरह आबाद भी रहती थी. लेकिन बार यहां हर तरफ सन्नाटा ही पसरा है.

तीन महीने तक होने वाले ट्रेड के दौरान गुंजी मंडी पूरी तरह आबाद भी रहती थी. लेकिन बार यहां हर तरफ सन्नाटा ही पसरा है.

30 सालों में पहली बार लगातार 3 सालों से भारतीय व्यापारी चीन की मंडियों में नहीं जा पाएंगे. वहीं भारतीय व्यापारियों का करीब 45 करोड़ का माल भी चीन में ही फंसा हुआ है, ऐसे में अब उसके वापस मिलने की आस भी व्यापारियों को खत्म हो गई है.

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पिथौरागढ़. कोरोना के चलते इस साल भी इंडो-चाइना ट्रेड पर संकट मंडरा गया है. बीते 30 सालों में पहली बार लगातार 3 सालों तक भारतीय व्यापारी चीन की मंडी नहीं पहुंच पाएंगे. ट्रेड नहीं होने से इंडियन ट्रेडर्स का 45 करोड़ का माल भी चाइना में ही फंसा हुआ है. वस्तु विनिमय के आधार पर होने वाला ट्रेड जहां खुद में अनौखा व्यापार है, वहीं इससे हजारों परिवारों की रोजी-रोटी भी जुड़ी है.
भारत-चीन युद्द के बाद 1991 से 2019 तक इंडो-चाइना ट्रेड बदस्तूर जारी रहा . लिपूलेख दर्रे से होने वाले इस ट्रेड में उच्च हिमालयी इलाकों के सैकड़ों व्यापारी शिरकत करते थे. ये व्यापारी घोड़े-खच्चरों से चीन तक अपना सामान पहुंचाते थे और इन्हीं की मदद से चीन से भी सामान लाते थे. लेकिन बीते दो सालों की तरह इस बार भी कोरोना की मार इंटरनेशनल ट्रेड पर पड़ती दिख रही है. आमतौर पर इंडो-चाइना ट्रेड जून में शुरू हो जाता था. जिसकी कवायद काफी पहले से शुरू हो जाती थी. लेकिन इस बार विदेश मंत्रालय से अब तक कोई निर्देश नहीं मिले हैं. डीएम पिथौरागढ़ आशीष चौहान का कहना है कि अभी तक उन्हें व्यापार को लेकर कहीं से भी कोई निर्देश नहीं मिला है.

45 करोड़ का माल चाइना में फंसा
भारतीय व्यापारी चीन की तकलाकोट मंडी से सामान के बदले अपनी जरूरत का सामान लाते थे. चीन से लाए सामान के जरिए ही गुंजी और उसके आस-पास के गांवों की जरूरतें भी पूरी होती थीं. गुंजी भले ही भारत की सबसे बड़ी बॉर्डर मंडी हो, बावजूद इसके यहां का बाजार चीनी माल से पटा रहता था. लेकिन अब हालात एकदम जुदा हैं. 2019 में भारतीय व्यापारी करीब 45 करोड़ का माल चाइना छोड़ कर आए थे. जिसकी वापसी की आस अब नहीं के बराबर है. यही नहीं तीन महीने तक होने वाले ट्रेड के दौरान गुंजी मंडी पूरी तरह आबाद भी रहती थी. लेकिन बार यहां हर तरफ सन्नाटा ही पसरा है.

ट्रेड में हर साल शिरकत करने वाले भारतीय व्यापारी ईश्वर सिंह बतातें हैं कि व्यापार बंद होने से उन जैसे व्यापारियों को हर साल नुकसान तो ही रहा है, लेकिन सबसे अधिक नुकसान चीन में फंसे माल की वापसी नही होने से हो रहा है. लिपुलेख दर्रे से होने वाला इंडो-चाइना ट्रेड बॉर्डर इलाकों की अर्थव्यवस्था का केन्द्र भी है. चीन के साथ भारत का वस्तु विनिमय के आधार पर स्थलीय ट्रेड सिर्फ उत्तराखंड और हिमाचल से होता है. लेकिन व्यापारियों की संख्या के लिहाज से लिपु पास से होने वाले ट्रेड का खासा महत्व रहा था.

Tags: Indo china border, Uttarakhand news

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