लिपुलेख का खतरनाक सफर: गगनचुंबी पहाड़ियां, नाले और हर पल बदलता मौसम का मिजाज

छियालेख में मौजूद है इनरलाइन यानी यहां से आगे बढ़ने के लिए परमिट जरूरी है.
छियालेख में मौजूद है इनरलाइन यानी यहां से आगे बढ़ने के लिए परमिट जरूरी है.

भारत-नेपाल के बीच सीमा विवाद (Indo-Nepal Border Dispute) के दौरान लिपुलेख (Lipulekh) लगातार चर्चा में हैं. इस रास्ते पर News 18 की टीम ने जाने की कोशिश की.

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पिथौरागढ़. भारत-नेपाल के बीच सीमा विवाद (Indo-Nepal Border Dispute) के दौरान लिपुलेख (Lipulekh) लगातार चर्चा में हैं. लद्दाख में चीन एक बार फिर अपनी चालबाजियां दिखा रहा है. लेकिन इधर भारत ने चीन के सीने पर चढ़ाई कर दी है. कैलाश-मानसरोवर रूट में भारत ने चीन की दहलीज पर सीधी दस्तक देकर उसके आंगन तक रोड पहुंचा दी है. जिसके बाद न सिर्फ ड्रैगन बल्कि ड्रैगन के साथी नेपाल में भी कोहराम मचा है. लिपुलेख रोड का काम बीते 12 सालों से चल रहा था और जब ये पूरा हुआ तो भारत की चीन बॉर्डर पर सीधी पहुंच हो गई है और सबसे बड़ी बात ये है कि News 18 सबसे पहले भारत के उस अंतिम छोर पर पहुंचा. जहां तक पहुंच पाना तो दूर, सोचना भी नामुमकिन था. इस सड़क को निर्माण क्षेत्र में भारतीय सेना का बेजोड़ नमूना कहा जा रहा है.

चुनौती भरा है लिपुलेख पहुंचने का सफर
लिपुलेख पहुंचने का सफर घटियाबगड़ से ही चुनौती भरा है. घटियाबगड़ से मालपा पहुंचने के लिए जहां खतरनाक गगनचुंबी पहाड़ियों को पार करना पड़ता है, वहीं मालपा से बूंदी जाने के लिए 12 किलोमीटर का कठिन मार्ग तो है ही. साथ ही सबसे बड़ी चुनौती है बूंदी नाले को पार करना. बूंदी पहुंचने से आधा किलोमीटर पहले ये नाला पड़ता है. ग्लेशियर से निकलने वाला बूंदी नाला दिन चढ़ने के साथ ही बढ़ने लगता है. पानी के बीचों-बीच गाड़ी निकालने के लिए मजबूत कलेजे की दरकार है. हमारे साथ यात्रा में शामिल यशवंत महर ने उफनते बूंदी नाले से गाड़ी को पार किया. नाले से ऊपर निकलते वक़्त कुछ पलों के लिए गाड़ी के पहिए थम गए थे. लेकिन यशवंत ने सूझबूझ दिखाते हुए राह की मुश्किल दूर की. बूंदी नाले में बीआरओ पुल बना रहा है. ये इलाका कभी कैलाश-मानसरोवर यात्रा का पड़ाव भी हुआ करता था. आज भी यहां कुमाऊं मंडल विकास निगम का गेस्ट हाउस है. साथ ही नेपाल बॉर्डर पर निगरानी रखने के लिए एसएसबी की चौकी बनाई गई है.

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ग्लेशियर से निकलने वाला बूंदी नाला दिन चढ़ने के साथ ही बढ़ने लगता है.

 



और बूंदी पहुंचने के बाद बदलने लगा मौसम का मिजाज
बूंदी पहुंचने के साथ ही मौसम का मिजाज बदलने लगा. आगे की यात्रा कुछ देर के लिए रोकनी पड़ी. मौसम थमने तक हमनें बूंदी के एक छोटे से ठाबे में खाना खाया. 2740 मीटर की ऊंचाई पर बसे बूंदी में दोपहर 1 बजे ही शाम होने लगती है. बूंदी के बाद हमारी यात्रा शुरू होती है छियालेख की ओर. छियालेख के टॉप में पहुंचने के लिए 3 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई पार करना जरुरी है. इस चढ़ाई पर पहुंचने के लिए 32 बैंड पार करने पड़ते हैं. शुरुआती मोड़ भले ही सामान्य हों, लेकिन ऊपर चढ़ने के साथ ये काफी खतरनाक होते जाते हैं.

जलेबी मोडों ने रोक ली सांसें
इस सफर में बारिश और बर्फबारी से तो हमें जूझना ही पड़ा. साथ ही छियालेख के जलेबी मोडों ने हमारी सांसों को थाम दिया. 10 किलोमीटर गाड़ी से इस चढ़ाई पर चढ़ने के बाद लगा कि हम छियालेख पहुंच ही जाएंगे. लेकिन अंतिम बैंड ने हमारी राह रोक दी. शाम हो रही थी बारिश और बर्फ़बारी रुकने का नाम नही ले रही थी. ऐसे में हम पूरे एक घंटे अंतिम बैंड को पार करने की कोशिशों में लगे रहे. कच्चे रास्ते में बैंड से गाड़ी निकालने की कई कोशिशें नाकाम रहीं. थक-हार कर अन्य विकल्पों पर विचार कर ही रहे थे कि फिर एक बार साथी यशवंत महर ने हिम्मत दिखाई और अन्य साथियों ने पूरी ताकत से गाड़ी को धक्का लगाया तो हमारी सबसे बड़ी बाधा दूर हुई और हम पहुँचे 3350 मीटर पर बसे छियालेख में.

छियालेख में इनरलाइन परमिट है जरूरी
छियालेख में मौजूद है इनरलाइन यानी यहां से आगे बढ़ने के लिए परमिट जरूरी है. बिना परमिट के छियालेख में मौजूद आईटीबीपी, एसएसबी और सेना के जवान एक कदम भी किसी को आगे नही बढ़ने देते. छियालेख इस इलाके में सबसे सुंदर तो है ही साथ ही भारतीय सुरक्षा एजेंसियों का पहला बड़ा केंद्र भी है. जहां सीमाओं के प्रहरी हर वक़्त मुस्तैद दिखते हैं.

 

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