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नोटबंदी के कारण नहीं मिल रहे पहाड़ी उत्पादों के लिए ग्राहक
Pithoragarh News in Hindi

Vijay Vardhan | ETV UP/Uttarakhand
Updated: December 2, 2016, 12:34 PM IST
नोटबंदी के कारण नहीं मिल रहे पहाड़ी उत्पादों के लिए ग्राहक
उच्च हिमालयी इलाकों में आलू और राजमा उगाने वाले काश्तकार भी परेशान

नोटबंदी से जहां आम लोगों को आए दिन खासी दिक्कतें उठानी पड़ रही है, वहीं पिथौरागढ़ के उच्च हिमालयी इलाकों में आलू और राजमा उगाने वाले काश्तकार भी परेशान हैं. आलम ये है कि नकदी के कमी के कारण दर्जनों गांवों में लाखों कुंतल बेसकीमती आलू और राजमा सड़ रहा है. राजमा और आलू की बर्बादी से कास्तकारों की रोजी-रोटी पर संकट भी गहरा गया है.

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नोटबंदी से जहां आम लोगों को आए दिन खासी दिक्कतें उठानी पड़ रही है, वहीं पिथौरागढ़ के उच्च हिमालयी इलाकों में आलू और राजमा उगाने वाले काश्तकार भी परेशान हैं. आलम ये है कि नकदी के कमी के कारण दर्जनों गांवों में लाखों कुंतल बेसकीमती आलू और राजमा सड़ रहा है. राजमा और आलू की बर्बादी से काश्तकारों की रोजी-रोटी पर संकट भी गहरा गया है.

साढ़े सात हजार फीट की ऊंचाई में पैदा होने वाला ये आलू और राजमा अपने बेमिसाल गुणों के लिए जाना जाता है. इसके इन्हीं गुणों के चलते पिछले साल तक इसे थोक कारोबारी हाथों-हाथ खरीद लेते थे. लेकिन इस बार नोटबंदी के कारण ऊंचे इलाकों का ये उत्पाद सड़ने के मजबूर हैं.

हिमालयी आलू और राजमा की खेती को तैयार हुए महीना भर हो गया है. लेकिन एक भी थोक कारोबारी इन इलाकों में नही पहुंचा है. कास्तकार नाथ सिंह टोलिया का कहना है कि अभी तक उनके उत्पादों को खरीदने के लिए कोई ग्राहक आया ही नही है. जिस कारण आलू और राजमा बेकार होने की कगार पर पहुंच गया है.

आलू और राजमा नही बिकने से हिमालयी इलाकों में बसे कुलथम, बौना, तोमिक, क्वीरी-जीमीया और गोल्फा जैसे गांवों में हजारों काश्तकारों परेशान हैं. इन उत्पादों की मदद से ही यहां के काश्तकारों दशकों से अपनी रोजी-रोटी जुटाते आए हैं. लेकिन इस बार हालात बिलकुल जुदा हैं. बढ़िया मौसम के कारण इस बार उत्पादन भी जमकर हुआ है, लेकिन खरीददार बिना सब सूना है.

हालात ये ही पर्यटन नगरी मुनस्यारी में होटल कारोबारी भी पर्यटकों को स्थानीय उत्पादों का स्वाद नही चखा पा रहे हैं. मुनस्यारी होटल एसोसिएशन के अध्यक्ष पूरन पाण्डे का कहना है कि बाजारों में हिमालयी उत्पाद नही होने से पर्यटकों भी इनका स्वाद नही ले पा रहे हैं.

करैंसी सकंट को लेकर जो हालात फिलहाल नजर आ रहे हैं, उससे तो यही लग रहा है कि हिमालयी काश्तकारों की दिक्कतें जल्द दूर होने से रही. ऐसे ये भी तय है कि बेसकीमती उत्पादों के बाजार में नही पहुंचने से जहां लोग इसके स्वाद से महरूम होंगे, वहीं कइयों को रोजी-रोटी भी खतरे में पड़ जायेगी.

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First published: December 2, 2016, 12:34 PM IST
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