महिलाओं के लिए मिसाल बन गई हैं चीन के बॉर्डर पर रहने वाली गीता और आशा

गीता ने बताया कि पोर्टर का काम शुरू करने पर उसे गांव के कई लोगों का विरोध भी झेलना पड़ा. लेकिन उसने लम्बी दुर्गम पैदल यात्रा को सफलता के साथ पूरा कर विरोध करने वालों को करारा जवाब दिया है.

Vijay Vardhan | News18 Uttarakhand
Updated: July 28, 2019, 10:52 AM IST
महिलाओं के लिए मिसाल बन गई हैं चीन के बॉर्डर पर रहने वाली गीता और आशा
गीता बना दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणा
Vijay Vardhan | News18 Uttarakhand
Updated: July 28, 2019, 10:52 AM IST
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ की सीमांत तहसील धारचूला के बॉर्डर में रहने वाली महिलाएं कुछ ऐसे काम कर रही हैं, जिन पर अभी तक पुरुषों का ही कब्जा था. आपदाग्रस्त गांव जिप्ति की गीता ठाकुर ने जहां अपने परिवार को पालने के लिए पोर्टर का काम शुरू किया है, वहीं बालिंग की आशा बंग्याल आदि कैलाश यात्रियों के लिए गाइड का काम कर रही है. ये पहला मौका है जब चीन सीमा पर रहने वाली महिलाओं पोर्टर और गाइड जैसे पेशों को अपना रहीं हैं.

 

गीता को झेलना पड़ा विरोध
गीता ठाकुर ने आदि कैलाश यात्रियों के 7 वें दल के 22 यात्रियों के साथ महिला पोर्टर के बतौर काम शुरू किया. इस दल के यात्रियों के साथ गीता ने 140 किलोमीटर की दुर्गम पैदल यात्रा की. गीता ने बताया कि पोर्टर का काम शुरू करने पर उसे गांव के कई लोगों का विरोध भी झेलना पड़ा. लेकिन उसने लम्बी दुर्गम पैदल यात्रा को सफलता के साथ पूरा कर विरोध करने वालों को करारा जवाब दिया है.



अपना खर्चा भी खुद उठाया है गीता ने
गरीब परिवार से निकली गीता के 6 भाई-बहन हैं और माता-पिता जिप्ति गांव में ही छोटी-मोटी खेती करते हैं. गीता धारचूला में किराये पर कमरा लेकर अपनी बहन और भतीजी को पढ़ा भी रही है. जिसके लिए उसे पैसों की भी खासी दरकार रहती है. पैसों की कमी को दूर करने लिए गीता ने वो पेशा अपनाया, जिससे अब तक यहां कि महिलाएं दूर ही रहा करती थीं.

Loading...




गीता की तरह आशा बंग्याल ने भी गाइड का काम शुरू किया
गीता की तरह आशा बंग्याल ने भी गाइड का काम शुरू किया




आशा ने भी कुछ अलग करने की ठानी
गीता की तरह आशा बंग्याल ने भी गाइड का काम शुरू किया है. 40 साल की आशा विधवा हैं और उनके दो बच्चे हैं, जिनकी परवरिश का पूरा जिम्मा उन्हीं पर है. आशा ने ट्रैकर लक्ष्मण सिंह के साथ गाइड का काम शुरू किया है. वे पर्यटकों को पंचाचूली ग्लेशियर, आदि कैलाश जैसे स्थलों पर सुरक्षित पहुंचाती हैं. आशा ने दारमा घाटी में पहली बार हुई आदि कैलाश यात्रियों के 21 सदस्यों के दल के साथ गाइड का काम किया.


आशा स्थानीय गीत गाकर सफर को आसान बनाती हैं

आशा एक अच्छी गायिका भी हैं, जो यात्रा के दौरान स्थानीय संस्कृति पर आधारित गीत गाकर सैलानियों के सफर को आसान बनाती हैं. आदि कैलाश यात्री दल के टीम लीडर चैतन्य का कहना है कि आशा को पूरी दारमा घाटी के बारे बेहतरीन जानकारी है और उनका व्यवहार ऐसा है कि 140 किलोमीटर का पैदल सफर कब पूरा हुआ पता भी नहीं चला.​


First published: July 27, 2019, 11:36 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...