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उत्तराखंड: Forest Fire से ग्लेशियरों पर कौन सा खतरा मंडराया? हवा इतनी जहरीली कि सेहत के लिए खतरनाक

उत्तराखंड के जंगलों की आग से ग्लेशियरों पर खतरा बढ़ गया है.

उत्तराखंड के जंगलों की आग से ग्लेशियरों पर खतरा बढ़ गया है.

Uttarakhand Forest Fire : गर्मियां शुरू होने के बाद उत्तराखंड के जंगलों में लगातार फैल रही आग से इंसानों, जानवरों के साथ ही पर्यावरण को भी भारी खतरा पैदा हो रहा है. हिमालय में बर्फ, पहाड़ों मेंं हवा और बस्तियों में लोगों की सेहत का क्या हाल है? देखिए विस्तृत रिपोर्ट.

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पिथौरागढ़. उत्तराखंड के जंगलों में धधक रही आग से अब ग्लेशियरों में ब्लैक कार्बन जमने का खतरा है, वहीं इनके गलने की रफ्तार भी काफी बढ़ सकती है. खतरा किस कदर होगा, अभी इसे समझना बाकी है. लेकिन यह तो समझ में आ ही रहा है कि पर्यावरण और वन्यजीवन के लिए बड़ा खतरा पैदा हो चुका है. इधर, वनों की आग के साथ ही पराली जलाए जाने से कई रिहाइशों इलाकों में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं. किसी को सांस लेने में तकलीफ है तो किसी की आंखें जल रही हैं.

पहाड़ी इलाकों में जंगल की आग ने बेशकीमती वन संपदा को तो तबाह किया ही है, अब इसका प्रभाव उच्च हिमालयी इलाकों के ग्लेशियरों पर भी पड़ रहा है. हालात ये हैं कि ग्लेशियरों पर ब्लैक कार्बन की एक हल्की परत जमने लगी है. यही नहीं ब्लैक कार्बन जमने से ग्लेशियरों के गलने की रफ्तार बढ़ेगी. जीबी पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान के निदेशक डॉ किरीट कुमार का कहना है कि ब्लैक कार्बन जमने से ग्लेशियरों को खतरा कितना होगा, अभी इसकी स्टडी होनी है. ग्लेशियरों के तेज़ी से पिघलने की आशंका भी कुमार ने जताया.

कितनी ज़हरीली हो चुकी है हवा?
आग लगने की घटनाओं के लगातार बढ़ने से हवा की गुणवत्ता भी खासी खराब हो रही है. हालात ये हैं कि आम तौर पर जहां पर्यावरण में ब्लैक कार्बन 2 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर होता था, वहीं इन दिनों ये 15 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर पहुंच गया है. यही नहीं, आग लगने से कार्बन के साथ ओज़ोन की मात्रा में भी खासा इज़ाफा हुआ है.

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बागेश्वर में खेतों की पराली और वनाग्नि से धुआं व धुंध छाए रहने से मरीज़ बढ़ रहे हैं.

पानी, मिट्टी, जानवर सबकी सेहत खराब
जीबी पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान वैज्ञानिक डॉ जेसी कुनियाल के मुताबिक छोटे पेड़ और पौधे जल रहे हैं, जिससे निकले कार्बन से मिट्टी की गुणवत्ता भी खासी प्रभावित हो रही है. धधकती आग पेड़-पौधों, ग्लेशियरों, पेयजल स्रोतों के साथ ही मिट्टी के लिए भी खतरनाक है. एक फैक्ट यह भी है कि प्रकृति, जीवों और लोगों की सेहत को जो नुकसान हो रहा है, उसका खमियाज़ा लम्बे समय तक चुकाना पड़ सकता है.

बागेश्वर में रोगी बढ़े, विज़िबिलिटी घटी
जंगलों की आग के बीच क्षेत्र में किसानों द्वारा गेहूं की फसल काटने के बाद पराली जलाई गई है, जिससे बागेश्वर की हवा ज़हरीली होने की भी खबर है. न्यूज़18 संवाददाता सुष्मिता थापा की रिपोर्ट ​है कि कई दिनों से बागेश्वर के आसमान में सफेद धुंध छाई है. लोगों की आंखों और सांस रोगों की शिकायतें बढ़ रही हैं. अस्पताल में मरीज़ बढ़ रहे हैं. आंखों में जलन, एलर्जी, दमा, श्वास, अस्थमा आदि के रोगी बढ़ गए हैं. धुंध के कारण ​विज़िबिलिटी इतनी कम है कि सामने का पहाड़ तक वाहन चालकों को दिखने में मुश्किल है.

ज़िला अस्पताल के नेत्र चिकित्सक डॉ. एसपी त्रिपाठी के अनुसार आंखों की एलर्जी से बचाव के लिए दिन में कम से कम चार-पांच बार ठंडे पानी से आंखों को धोना चाहिए. जिला अस्पताल के डॉ. एलएस बृजवाल और डॉ. विनोद टम्टा ने बताया कि कुछ दिनों से अस्पताल में किस तरह रोगी बढ़ गए हैं. जनवरी में जहां ओपीडी में 6276 मरीज़ पहुंचे, वहीं फरवरी में 8081 और मार्च में 8457. अप्रैल का डेटा आना बाकी है. गौरतलब है कि उत्तराखंड में फॉरेस्ट फायर सीज़न 15 फरवरी के आसपास से शुरू होता है.

उत्तरकाशी में भी धुआं ही धुआं
उत्तरकाशी संवाददाता बलबीर परमार की रिपोर्ट की मानें तो गंगा, यमुना घाटी और टौंस घाटी के पास के जंगलों में लगी आग विकराल होने से घाटियों में धुआं ही धुआं छाया हुआ है. पर्यावरण और वन्य जीवों को भारी नुकसान हो ही रहा है, अब अस्पतालों में मरीज़ों की संख्या में भी भारी इजाफा हो रहा है. ज़िला अस्पताल के फिजिशियन डॉ. सुबेग सिंह का कहना है आंखों में जलन, लालपन, सांस लेने में दिक्कतें, गले और एलर्जी की शिकायतें बढ़ रही हैं.

Tags: Forest fire, Uttarakhand Forest Department, Uttarakhand Glacier

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