Corona वायरस की वजह से नहीं हुआ उत्तराखंड में हिमालयी वियाग्रा का दोहन... पर्यावरण हो सकता है प्रभावित  

नेचुरल स्टेरॉइड के रूप में इसकी दुनिया भर में भारी मांग है. इंटरनेशनल मार्केट में इसकी कीमत 20 लाख रुपये किलो है.
नेचुरल स्टेरॉइड के रूप में इसकी दुनिया भर में भारी मांग है. इंटरनेशनल मार्केट में इसकी कीमत 20 लाख रुपये किलो है.

विशेषज्ञ कहते हैं कि जरूरत से ज्यागा फंगस स्कोर हिमालयी इनसेक्ट्स की लाइफ लाइन को भी प्रभावित करेगा.

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पिथौरागढ़. उत्तराखंड के 3 जिलों में ऊंचे इलाकों में कीड़ा जड़ी या यारसा गंबू यानी हिमालयन वियाग्रा का उत्पादन होता है लेकिन इस साल कोरोना वायरस के चलते यारसा गंबू का दोहन नहीं हो पाया. दुनिया के सबसे करामाती फंगस का दोहन न होने से ऊंचे इलाकों के पर्यावरण के साथ ही भविष्य में इसकी पैदावार पर भी असर पड़ सकता है. जानकारों का मानना है कि इसकी वजह से आने वाले समय में कीड़ा जड़ी की पैदावार अधिक हो सकती है लेकिन इसके साथ ही यह भी आशंका है कि यह पर्यावरण के लिए खतरनाक हो सकता है.

20 लाख रुपये किलो है कीमत

35 सौ मीटर की ऊंचाई में पैदा होने वाली कीड़ा जड़ी या यारसा गंबू को हिमालयन वियाग्रा के नाम से भी जाना जाता है. नेचुरल स्टेरॉइड के रूप में इसकी दुनिया भर में भारी मांग है. इंटरनेशनल मार्केट में इसकी कीमत 20 लाख रुपये किलो है. यही वजह उच्च हिमालयी इलाकों में रहने वालों के लिए यारसा गंबू रोजगार का सबसे बड़ा जरिया साबित हुआ है.



हिमालयन वियाग्रा का सबसे बेहतर इस्तेमाल चीना ही करता आया है. इस साल कोरोना संकट के कारण चीन और नेपाल के बॉर्डर पूरी तरह सील हैं. इसकी वजह से इसके दोहन में किसी ने भी खास रुचि नहीं दिखाई. इस साल वन पंचायतों को भी कीड़ा जड़ी के दोहन की अनुमति नहीं मिल पाई. दशकों बाद यह पहला मौका है, जब कीड़ा जड़ी का दोहन नहीं हुआ है. जानकारों की मानें तो दोहन न होना, आने वाले सालों में इसकी पैदावार बढ़ाने में मददगार साबित होगा.
अच्छा भी और खतरनाक भी 

कीड़ा जड़ी पर रिसर्च कर चुके डॉक्टर सचिन बोरा का मानना है कि दोहन न होने से ऊंचे इलाकों में इंसानी हस्तक्षेप कम हुआ है. इस कारण आने वाले सालों में इसकी पैदावार बढ़ेगी. बोरा के अनुसार फंगस उचित मात्रा में होने से भी इसकी पैदावार बढ़ेगी. उत्तराखंड के पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी के ऊंचे इलाकों में हर साल भारी संख्या में इसका दोहन होता है.

यारसा गंबू के ज़रूरत से ज्यादा दोहन और ऊंचे इलाकों में बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप ने पर्यावरण को भी खासा प्रभावित किया है. इस सबके बीच एक सूरत यह भी है कि कम दोहन खतरनाक भी साबित हो सकता है.

डॉक्टर सचिन बोरा एक आशंका यह भी जता रहे हैं कि फंगस जरूरत से ज्यादा होना भी खतरनाक साबित हो सकता है. अगर ऊंचे इलाकों में फंगस मांग के मुताबिक हुई तो आने वाले सालों में इसकी पैदावार में जमकर इज़ाफ़ा होगा. साथ ही यह खतरा भी बना हुआ है कि जरूरत से ज्यागा फंगस स्कोर हिमालयी इनसेक्ट्स की लाइफ लाइन को भी प्रभावित करेगा.
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