भारत-नेपाल सीमा पर बढ़ा तनाव, सैनिक तैनाती के बाद छावनी बना रहा पड़ोसी देश!
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भारत-नेपाल सीमा पर बढ़ा तनाव, सैनिक तैनाती के बाद छावनी बना रहा पड़ोसी देश!
9 मई को नेपाल के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार इंद्रजीत राई हेलीकॉप्टर से कालापानी और छांगरु पहुंच गए थे.

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में बनी लिपुलेख सड़क (Lipu lekh pass) के उद्घाटन के बाद नेपाल ने सीमा (Nepal Border) पर सक्रियता बढ़ा दी है. सेना तैनात करने के साथ-साथ छावनी की योजना बना रहा पड़ोसी.

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पिथौरागढ़ (उत्तराखंड). उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में बनी लिपुलेख सड़क (Lipu lekh pass) के उद्घाटन के बाद भारत-नेपाल सीमा (Indo-Nepal Border) पर तनाव बढ़ गया है. एक दिन पहले नेपाल ने सीमा पर जहां सैनिकों की तैनाती के संकेत दिए, वहीं पड़ोसी देश अब उत्तराखंड के छांगरू में स्थानी छावनी निर्माण की योजना बनाता दिख रहा है. 12 साल की मेहनत के बाद चीन सीमा को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण लिपुलेख सड़क बनने के बाद नेपाल ने विरोध भी जताया है. पड़ोसी देश पहले भी लिपुलेख और कालापानी को अपना बताते हुए सड़क निर्माण पर तीखा विरोध जताता रहा है. वहीं अब जबकि सड़क निर्माण पूरा होता दिख रहा है, तो नेपाल भारत से लगे इस इलाके में अपनी चौकसी बढ़ा दी है.

सैनिक छावनी में तब्दील हो रहा इलाका

कुछ रोज पहले ही नेपाल ने भारत से सटे छांगरू (Chhangru) में स्थाई तौर पर बॉर्डर आउट पोस्ट खोला था. अब जानकारी मिल रही है कि नेपाल इस इलाके को जल्द ही सैनिक छावनी में तब्दील करने जा रहा है. इस छावनी में 160 सैनिकों की तैनाती स्थाई तौर पर होनी है. यह छावनी इंटरनेशनल बॉर्डर से 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थापित होगी.



लिपुलेख सड़क के उद्घाटन के बाद से ही इस इलाके में नेपाल की सक्रियता में तेज़ी देखने को मिली है. 8 मई को लिपुलेख सड़क का उद्घाटन होने के बाद 9 मई को ही नेपाल के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार इंद्रजीत राई हेलिकॉप्टर से कालापानी और छांगरू पहुंच गए थे और 13 मई को बीओपी खोलकर रवाना हुए.



पूरे साल रहेगी नेपाली सैनिकों की मौजूदगी

बताया जा रहा है कि नेपाल फिलहाल 9 करोड़ की लागत से छावनी बनाने की योजना बना रहा है. छावनी बनने के बाद उच्च हिमालयी इलाके में नेपाली सैनिकों की साल भर मौजूदगी रहेगी. असल में लिपुलेख सड़क का उद्घाटन होने के बाद नेपाल ने कड़ा विरोध जताया है.

सुगौली संधि के बाद से दोनों इलाके भारत के पास

नेपाल सरकार का दावा है कि कालापानी और लिपुलेख उसका हिस्सा है और भारत ने नेपाल के भू-भाग में जबरन सड़क का निर्माण किया है. जबकि सच्चाई ये है कि ये दोनों इलाके सुगौली संधि के बाद से ही भारत के पास है. जिस कालापानी पर नेपाल दावा जता रहा है, वहां 1962 के बाद से ही भारतीय जवानों की तैनाती है. यही नहीं, 1962 में हुए बंदोबस्त के मुताबिक कालापानी गर्व्यांग गांव का तोक है, जिसके अभिलेख भी धारचूला राजस्व विभाग के पास मौजूद हैं. लिपुलेख सड़क को लेकर नेपाल की बौखलाहट के पीछे चीनी साजिश भी नजर आ रही है.

सेना प्रमुख ने कहा- किसी और का हो सकता है इशारा

भारतीय सेना प्रमुख एम एम नरवणे भी कह चुके हैं कि ये संभव है कि नेपाल किसी अन्य के इशारे पर लिपुलेख दर्रे को जोड़ने वाली सड़क पर आपत्ति जाता रहा है. पिथौरागढ़ से लगे बॉर्डर पर नेपाल की अतिसक्रियता के बावजूद भारतीय सुरक्षा एजेंसियां पहले की ही तरह अपने काम पर लगी हैं. नेपाल बॉर्डर पर तैनात एसएसबी की 11 वीं बटालियन के सेनानायक महेंद्र प्रताप का कहना है कि नेपाल अपनी सीमाओं के भीतर काम कर रहा है. नेपाल बॉर्डर पर एसएसबी पहले की ही तरह सुरक्षा में जुटी है.

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