पिथौरागढ़: बरसात सिर पर है, इसके बावजूद भी नहीं हो पाया संवेदनशील गांवों का विस्थापन

जिले में 37 गांवों को विस्थापन की सूची में शामिल किया गया है.

पिथौरागढ़ (Pithoragarh) में सबसे अधिक गांवों का विस्थापन धारचूला और मुनस्यारी की तहसीलों में होना है. धारचूला में 16 गांवा को तत्काल विस्थापन की दरकार है

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पिथौरागढ़. उत्तराखंड (Uttarakhand) में मानसून जल्द ही दस्तक देने वाला है. बावजूद इसके जोन फाइव में बसे पिथौरागढ़ के संवेदनशील गांव विस्थापित नहीं हो पाए हैं. अब हालात ये हैं कि विस्थापन की राह तक रहे इन गांवों पर कभी भी आसमानी आफत मौत बनकर बरस सकती है. बॉर्डर डिस्ट्रिक (Border District) के दर्जनों गांव दशकों से प्राकृतिक आपदाओं की मार झेल रहे हैं. ऐसी शायद ही कोई बरसात हो जब यहां के गांवों में आसमानी आफत न बरसी हो. प्रकृति के तांडव ने अब तक सैकड़ों लोगों को अपने आगोश में भी ले लिया है. बावजूद इसके अभी भी विस्थापन (Displacement) का मुद्दा हल नहीं हो पा रहा है. जिले में 37 गांवों को विस्थापन की सूची में शामिल किया गया है. लेकिन शासन से धनराशि मिली है सिर्फ 4 गांवों को विस्थापित करने की. जिला आपदा प्रबंधनधिकारी भूपेन्द्र महर ने बताया कि धारचूला के 4 गांवों को विस्थापित करने के लिए शासन से धनराशि मिल चुकी है. शेष गांवों के प्रस्ताव शासन में लम्बित हैं.

पिथौरागढ़ में सबसे अधिक गांवों का विस्थापन धारचूला और मुनस्यारी की तहसीलों में होना है. धारचूला में 16 गांवा को तत्काल विस्थापन की दरकार है, जबकि मुनस्यारी में 14 गांवों पर आसमानी आफत का खतरा मंडराया हुआ है. वहीं, डीडीहाट के भी 3 गांवों की विस्थापित किया जाना जरूरी है. बेरीनाग में भी एक गांव ऐसा है जिसका वजूद कभी भी बारिश खत्म कर सकती है. विस्थापन न होने के कारण प्रशासन को अब संवेदनशील गांवों के लिए अन्य विकल्पों तलाशने पड़ रहे हैं. डीएम पिथौरागढ़ आनंद स्वरूप ने बताया कि बरसात के सीजन में संवेदनशील गांवों में रहने वालों को पंचायत भवन या फिर स्कूलों में रखा जाएगा, जिससे जान का नुकसान न हो.

ताकि जिंदगी महफूज हो सके
शासन ने फिलहाल धारचूला के 4 गांवों को विस्थापित करने के लिए हरी झंड़ी दिखाई है. इन गांवों के लिए साढ़े पांच करोड़ की धनराशि भी जारी कर दी गई है. लेकिन जब बरसात मुहाने पर खड़ी हो तो जाहिर है कि 4 गांवों का भी फिलहाल विस्थापन संभव नहीं है. पिथौरागढ़ में प्राकृतिक आपदाओं का तांडव बीते कुछ सालों में इस कदर बढ़ा है कि कई गांवों को वजूद ही पूरी तरह मिट गया है, जिसमें सैकड़ों लोगों को जान भी गंवानी पड़ी है. ऐसे में बेहतर यही होगा कि जल्द ही संवेदनशील गांवों को विस्थापित किया जाए, ताकि जिंदगी महफूज हो सके.

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