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पिथौरागढ़ महाविद्यालय: फीकी पड़ रही छात्र राजनीति, अध्यक्ष भी चुना गया निर्विरोध
Pithoragarh News in Hindi

Vijay Vardhan | ETV UP/Uttarakhand
Updated: October 12, 2016, 11:05 AM IST
पिथौरागढ़ महाविद्यालय: फीकी पड़ रही छात्र राजनीति, अध्यक्ष भी चुना गया निर्विरोध
लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों पर अमल होने से भले ही छात्र राजनीति के अपराधीकरण पर लगाम लगी हो. लेकिन इसके चलते छात्र राजनीति की चमक भी फीकी पड़ी है. हालात इस हद तक जा चुके हैं कि जिस पिथौरागढ़ महाविद्यालय में छात्र संघ पदाधिकारी बनने के लिए कभी ऐड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ता था, आज उसी महाविद्यालय में अध्यक्ष जैसा पद निर्विरोध चुना जा रहा है.

लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों पर अमल होने से भले ही छात्र राजनीति के अपराधीकरण पर लगाम लगी हो. लेकिन इसके चलते छात्र राजनीति की चमक भी फीकी पड़ी है. हालात इस हद तक जा चुके हैं कि जिस पिथौरागढ़ महाविद्यालय में छात्र संघ पदाधिकारी बनने के लिए कभी ऐड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ता था, आज उसी महाविद्यालय में अध्यक्ष जैसा पद निर्विरोध चुना जा रहा है.

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लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों पर अमल होने से भले ही छात्र राजनीति के अपराधीकरण पर लगाम लगी हो. लेकिन इसके चलते छात्र राजनीति की चमक भी फीकी पड़ी है. हालात इस हद तक जा चुके हैं कि जिस पिथौरागढ़ महाविद्यालय में छात्र संघ पदाधिकारी बनने के लिए कभी ऐड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ता था, आज उसी महाविद्यालय में अध्यक्ष जैसा पद निर्विरोध चुना जा रहा है.

1960 में स्थापित पिथौरागढ़ महाविद्यालय शुरूआत से ही छात्र आंदोलनों का गढ़ रहा है. 1970 में विश्व विद्यालय बनाओ आंदोलन में यहां के दो छात्र पुलिस की गोली से शहीद हुए थे. 'नशा नहीं रोजगार दो' आंदोलन में भी पिथौरागढ़ छात्र संघ ने अहम योगदान दिया था. पर्वतीय इलाकों में राज्य आंदोलन की अलख जगाने में पिथौरागढ़ महाविद्यालय का नाम शीर्ष पर था, लेकिन पिछले एक दशक में इस महाविद्यालय की छात्र राजनीति सिमटती जा रही है.

आलम ये है कि इस साल महाविद्यालय के इतिहास में पहली बार छात्र संघ अध्यक्ष निर्विरोध चुना गया. छात्र संघ के चुनाव प्रभारी डॉ. अजय शुक्ल का कहना है कि उन्होंने ये पहली बार देखा कि यहां छात्र संघ अध्यक्ष निर्विरोध चुना गया हो.

छात्र राजनीति के सिमटते दायरे के लिए लिंगदोह कमेटी की सिफारिशें सबसे बड़ी वजह बनकर सामने आईं हैं. कमेटी की सिफारिशों पर अमल होने से जहां परिपक्व छात्र नेता चुनावी दायरे से बाहर होते गये, वहीं मात्र एक बार चुनाव लड़ने की बाध्यता ने छात्रों को कहीं का नहीं छोड़ा है. हालात इस कदर हो गये हैं कि सालों तक छात्र राजनीति की बागडोर संभालने वाले छात्र नेताओं की भूमिका आज महज क्लास मॉनिटर जैसी हो गई हैं.

महाविद्यालय के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष मुकेश पंत का कहना है कि उनके दौर में छात्र संघ चुनावों में कुछ ऐसी ही प्रतिस्पर्धा देखने को मिलती थी, जैसी आज के दौर में विधायक और सांसद के चुनावों में देखी जाती है. उस दौर में किसी के निर्विरोध चुना जाना किसी सपने जैसे होता था.

ये सही है कि लिंहदोह कमेटी की सिफारिशों पर अमल होने से सरकारी तंत्र का बोझ काफी कम हुआ है. मगर जिस तेजी से छात्र राजनीति प्रतिस्पर्धा विहीन होती जा रही है, उससे छात्र संघों के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान लगने लगे हैं.

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First published: October 12, 2016, 11:05 AM IST
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