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कभी कुष्ठ रोगियों के लिए वरदान था चंडाक का लेप्रसी मिशन, अब खंडहर में तब्दील यह जगह

कभी कुष्ठ रोगियों के लिए वरदान था चंडाक का लेप्रसी मिशन, अब खंडहर में तब्दील यह जगह

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मेरी रीड ने यहां देवदार के पेड़ लगाए थे.

मिशनरीज़ पिथौरागढ़ की सुंदर पहाड़ियों के सौंदर्य से अभिभूत थे. उन्होंने देखा कि इस क्षेत्र में कुष्ठ रोगियों की संख्या अधिक है और लोगों के प्रति सेवाभाव के लिए उन्होंने चंडाक क्षेत्र में लेप्रसी अस्पताल की स्थापना की.

    पिथौरागढ़ से चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित है चंडाक लेप्रसी मिशन, जहां पर एक समय में कुष्ठ रोगियों का इलाज किया जाता था लेकिन अब यह खंडहर में तब्दील हो चुका है. 1885 में मिशनरीज़ द्वारा लेप्रसी मिशन की स्थापना की गई थी. मिशनरीज़ पिथौरागढ़ की सुंदर पहाड़ियों के सौंदर्य से अभिभूत थे. उन्होंने देखा कि इस क्षेत्र में कुष्ठ रोगियों की संख्या अधिक है और लोगों के प्रति सेवाभाव के लिए उन्होंने चंडाक क्षेत्र में लेप्रसी अस्पताल की स्थापना की.

    कुष्ठ रोगियों को जहां एक तरफ समाज से बाहर कर दिया जाता था, तो वहीं मिशनरीज़ ने यहां पर उनको भर्ती कर उनकी सेवा की. इस अस्पताल में कुष्ठ रोगियों के खान-पान, इलाज व रहने की सुविधा मिशनरीज़ द्वारा की जाती थी. मरीजों को आत्मनिर्भर बनाने का काम भी इस अस्पताल द्वारा किया गया. बीमार लोगों का इलाज आयुर्वेद की मदद से किया जाता था.

    धीरे-धीरे वक्त बदलता चला गया और आज हालात यह हैं कि इतने बड़े क्षेत्र में फैले होने के बावजूद भी अब यहां दूर-दूर तक खंडहर ही दिखाई देते हैं. लेप्रसी मिशन चंडाक में कुष्ठ रोगियों के उपचार हेतु शुद्ध हवा प्रदान करने के लिए मेरी रीड नाम की एक विदेशी महिला ने यहां पर सैकड़ों देवदार के पेड़ लगाए गए थे. मेरी रीड के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने आजीवन कुष्ठ रोगियों की सेवा करने की कसम खाई थी.

    मेरी रीड का जन्म तो इंग्लैंड में हुआ था लेकिन उनकी मृत्यु यहीं चंडाक में हुई. उन्होंने अपना सारा जीवन चंडाक में कुष्ठ रोगियों की सेवा में बिता दिया. उनके द्वारा लगाए गए यह पेड़ आज पिथौरागढ़ शहर के लिए वरदान साबित हो रहे हैं. देवदार के इन पेड़ों की वजह से पिथौरागढ़ का तापमान नियंत्रण में रहता है. चंडाक लेप्रसी मिशन कई जिंदगियों के संघर्ष की कहानी है, जो आज बदहाली की अवस्था में है. इस क्षेत्र में इको टूरिज्म की अपार संभावनाएं हैं, जिससे इस खूबसूरत क्षेत्र को एक बार फिर इस्तेमाल में लाया जा सके.

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