नेपाल-चीन से सटे उत्तराखंड के जिलों में बिछा सड़कों का जाल, लेकिन हवाई सेवा के सपने अभी भी अधूरे

उत्तराखंड के नेपाल और चीन सीमा से सटे जिलों में पिछले दो दशक में सड़कों का जाल बिछ गया है.
उत्तराखंड के नेपाल और चीन सीमा से सटे जिलों में पिछले दो दशक में सड़कों का जाल बिछ गया है.

राज्य के इन तीन सीमावर्ती जिलों में एक वक्त सड़कों (Road) घोर अभाव था. लेकिन पिछले दो दशक में पिथौरागढ़ में लिपुलेख और दारमा घाटी, चमोली में नीति-माणा, उत्तरकाशी में नैलोंग घाटी रोड से जुड़ गई हैं.

  • Share this:
पिथौरागढ़. अलग राज्य के रूप में उत्तराखंड दो दशक का सफर पूरा करने जा रहा है. गुजरे 20 सालों में राज्यवासियों के भले ही कई सपने अधूरे रहे हों, लेकिन बॉर्डर इलाकों (Border Areas) में सड़कों के जाल बिछाने का ख्वाब जरूर पूरा हुआ है. राज्य के पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी जिलों का गठन सामरिक नजरिए से हुआ है. चीन (China) और नेपाल (Nepal) सीमा से लगे ये जिले देश की सुरक्षा के लिए खासे अहम है.

राज्य के इन तीन सीमावर्ती जिलों एक वक्त सड़कों घोर अभाव था. लेकिन पिछले दो दशक में पिथौरागढ़ में लिपुलेख और दारमा घाटी, चमोली में नीति-माणा, उत्तरकाशी में नैलोंग घाटी रोड से जुड़ गई हैं. यही नहीं मिलम घाटी को भी रोड से जोड़ने का काम युद्ध स्तर पर जारी है. साथ ही कुमाऊं-गढ़वाल को जोड़ने के लिए मिलम से मलारी तक रोड बनाने का भी प्लान तैयार हो रहा है.

विदेशी बॉर्डर से जुड़े इन जिलों में भले ही रोड का काम तेजी से चल रहा हो, लेकिन इन इलाकों में हवाई कनेक्टिविटी का मामला अभी भी अधर में है. पिथौरागढ़ में नैनी-सैनी एयरपोर्ट बन कर तैयार है, जबकि चिन्यालीसौड़ और गोचर में भी हवाई पट्टियां मौजूद हैं. बावजूद इसके बॉर्डर डिस्ट्रिक्ट हवाई सर्विस से ये इलाके नहीं जुड़ पाए हैं. यही नहीं बॉर्डर इलाके शिक्षा, स्वास्थ्य के साथ-साथ संचार सेवा से भी कोसों दूर हैं. पिथौरागढ़ के लोग आज भी नेपाली सिग्नल के सहारे शेष दुनिया से जुड़ने को मजबूर हैं.



हालांकि इन जिलों में जिस तेजी से सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है, उससे ये उम्मीद जोर पकड़ रही है कि देर से ही सही लेकिन यहां बेसिक इन्फ्रास्ट्रचर भी जरूर उपलब्ध होगा. ये इसलिए भी जरूरी है कि सीमावर्ती ये जिले शेष भारत से खुद को आसानी से जोड़ सके.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज