पिथौरागढ़ में महिलाओं का बोलबाला, इस मामले में कोसों पीछे रह गए पुरुष

बीते साढ़े पांच सालों में पिथौरागढ़ में 8175 महिलाओं की तुलना में मात्र 75 पुरुष परिवार नियोजन के लिए आगे आये हैं.

Vijay Vardhan | News18 Uttarakhand
Updated: July 22, 2019, 3:55 PM IST
पिथौरागढ़ में महिलाओं का बोलबाला, इस मामले में कोसों पीछे रह गए पुरुष
परिवार नियोजन को लेकर महिलाओं में अधिक जोश दिखा है.
Vijay Vardhan | News18 Uttarakhand
Updated: July 22, 2019, 3:55 PM IST
वैसे तो मौजूदा दौर में महिलाएं पुरुषों को हर क्षेत्र में कड़ी टक्कर दे रही हैं, लेकिन पिथौरागढ़ में परिवार नियोजन के मामले में महिलाओं के सामने पुरुष कहीं भी नहीं ठहर रहे हैं. आलम ये है कि सीमांत जिले में पिछले साढ़े पांच सालों में नसबंदी के जो मामले सामने आए हैं, उनमें पुरुषों का योगदान एक फीसदी से भी कम है.

यूं महिलाओं ने मारी बाजी
स्वास्थ्य विभाग में दर्ज आंकड़ों के मुताबिक, 2014 में यहां 1606 महिलाओं के मुकाबले सिर्फ 28 पुरुषों ने नसबंदी कराई, तो 2015 में तो इस आंकड़े में और फासला आ गया. इस साल यहां 1609 महिलाओं के मुकाबले मात्र 14 पुरुष ही नसबंदी को आगे आए. वहीं, 2016 में हालात कुछ ऐसे ही रहे और 1391 महिलाओं की तुलना में कुल 15 पुरुषों ने ही नसबंदी कराई.

बात अगर 2017 की करें तो इस साल 1035 महिलाओं ने जहां परिवार नियोजन के लिए नसबंदी कराई तो पुरुषों की संख्या सिर्फ 5 रही. नसबंदी में सबसे ज्यादा असमानता बीते साल देखी गई. जी हां, 2018 में 1839 महिलाओं और मात्र 3 पुरुषों ने नसबंदी कराई थी. इस साल अब तक 695 महिलाएं और 10 पुरुषों ने ही नसबंदी कराई है.

बीते साढ़े पांच सालों में जिले में 8175 महिलाओं की तुलना में मात्र 75 पुरुष परिवार नियोजन के लिए आगे आये हैं.


ये पहल बनी कामयाबी का जरिया
सीएमओ डॉ. ऊषा गुंजयाल का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग इस बारे में जागरूकता के लिए समय-समय पर कार्यक्रम संचालित करता है, लेकिन पुरुष आज भी पुरानी सोच से ग्रसित है. पुरुषों को लगता है कि नसबंदी से उनके शरीर में कमी आएगी, जबकि ऐसा कतई नहीं है.
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बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ अभियान का दिखा असर
हालांकि पिथौरागढ़ जिले में महिलाओं को लेकर सोच में पिछड़ापन पहले भी देखने को मिला था. कुछ साल पहले ये जिला देश के उन दस जिलों में शुमार था, जहां बच्चों के मुकाबले बच्चियां सबसे कम पैदा हो रही थीं. लेकिन बीते सालों में बेटी पढ़ाओ- बेटी बचाओ जैसे अभियानों को गंभीरता से संचालित किया गया. साथ ही अल्ट्रासाउंड केन्द्रों पर भी सख्ती की गई, जिस कारण अब नवजातों के लिंगानुपात में काफी हद तक सामनता आई है.

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First published: July 22, 2019, 3:46 PM IST
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