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चुनावी मौसम में राजनीतिक दलों के चंदे पर चपत, 84 फीसदी की गिरावट

चुनावी मौसम में राजनीतिक दलों के चंदे पर चपत, 84 फीसदी की गिरावट

राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में 84 फीसदी की कमी आई है. 2014-2015 के मुकाबले 2015-16 में राजनीतिक दलों को महज 16 फीसदी चंदा ही मिल पाया है (Demo Pic)

राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में 84 फीसदी की कमी आई है. 2014-2015 के मुकाबले 2015-16 में राजनीतिक दलों को महज 16 फीसदी चंदा ही मिल पाया है (Demo Pic)

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में चुनाव की रणभेरी बजने वाली है. राजनीतिक दलों के लिहाज से चुनाव भारी-भरकम खर्च वाला इवेंट होता है. खर्च का कुम्भकर्ण राजनीतिक दलों के सिर पर खड़ा है. वहीं दूसरी ओर राजनीतिक दलों की कमाई काफी कम हो गई है. प्रचार पर पानी की तरह पैसा बहाने वाली पार्टियां अब पाई-पाई की मोहताज हो रही हैं. जो कुछ कमी बची थी, वह नोटबंदी ने पूरी कर दी.

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उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में चुनाव की रणभेरी बजने वाली है. राजनीतिक दलों के लिहाज से चुनाव भारी-भरकम खर्च वाला इवेंट होता है. खर्च का कुम्भकर्ण राजनीतिक दलों के सिर पर खड़ा है. वहीं दूसरी ओर राजनीतिक दलों की कमाई काफी कम हो गई है. प्रचार पर पानी की तरह पैसा बहाने वाली पार्टियां अब पाई-पाई की मोहताज हो रही हैं. जो कुछ कमी बची थी, वह नोटबंदी ने पूरी कर दी.

आपको बता दें कि राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में 84 फीसदी की कमी आई है. 2014-2015 के मुकाबले 2015-16 में राजनीतिक दलों को महज 16 फीसदी चंदा ही मिल पाया है. चुनावी साल है और ऐसे में राजनीतिक दलों को प्रचार के लिए कुबेर का खजाना चाहिए, लेकिन राजनीतिक दलों को दानदाता नहीं मिल रहे हैं.

कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी साथ में उपाध्यक्ष (फाइल फोटो)
कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी साथ में उपाध्यक्ष (फाइल फोटो)


नेशनल इलेक्शन वॉच और एडीआर की ओर से छह राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को मिले चंदे पर रिपोर्ट तैयार की गई है. इनमें भाजपा, कांग्रेस, एनसीपी, तृणमूल, माकपा और भाकपा शामिल है. रिपोर्ट के मुताबिक 1744 लोगों या संस्थाओं ने इन दलों को चंदा दिया है. चंदा देने वालों में 359 कॉरपोरेट घराने है जबकि1322 व्यक्तिगत दानदाताओं ने चंदा दिया है.

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह (फाइल फोटो)
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह (फाइल फोटो)


आपको बता दें कि 20 हजार रुपये से ज्यादा चंदा देने वालों की सूची बनती है और इनका हिसाब पेन कार्ड के साथ चुनाव आयोग को देना होता है. भाजपा और कांग्रेस को पिछले दो सालों में मिले चंदे की तुलना करें तो इसमें जमीन-आसमान का अंतर नजर आता है. वर्ष 2014-15 में भाजपा को 437.35 करोड़ रुपये चंदा मिला था जो 2015-16 में घटकर 76.85 करोड़ रह गया है. वर्ष 2014-15 में कांग्रेस को 141.46 करोड़ रुपये चंदा मिला था जो 2015-16 में घटकर केवल 20.42 करोड़ रह गया है.

वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा
वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा


राजनीतिक विश्लेषक राजीव नयन बहुगुणा का कहना है कि राजनीतिक दलों को इस पर चिंतन करना चाहिए. यह भी देखना होगा कि कहीं चंदा 20 हजार रुपये से कम की किस्तों में तो नहीं लिया जा रहा है. वहीं छात्र नेता गवाक्ष जोशी कहते हैं कि राजनीतिक दलों को कम चंदा मिलना एक अच्छा संकेत है. इससे चुनाव में धनबल का उपयोग घटेगा. छात्र राजनीति में जिस तरह से शुचिता की दलील दी जाती है, आखिर राष्ट्रीय राजनीति में भी उसका पालन होना चाहिए.

कॉपरपोरेट घरानों ने दिया दो तिहाई चंदा
राजनीतिक दलों को दो तिहाई चंदा तो कॉरपोरेट घरानों ने दिया है. व्यक्तिगत दानदाताओं ने ज्यादा दरियादिली नहीं दिखाई. राष्ट्रीय दलों को 102.02 करोड़ रुपये चंदे में मिले. इनमें से 77.28 करोड़ रुपये का चंदा कॉरपोरेट घरानों से मिला. यानी कुल चंदे का 75.75 फीसदी कॉरपोरेट घरानों से मिला-23.61 करोड़ रुपये का चंदा व्यक्तिगत दानदाताओं से मिला है. एक रिपोर्ट के मुताबिक बसपा ने तो कह दिया है कि उन्हें पिछले दस सालों में एक भी ऐसा दानदाता नहीं मिला, जिसने 20 हजार रुपये से ज्यादा का चंदा दिया है. दरअसल चुनाव आयोग को 20 हजार से ज्यादा चंदा देने वालों का ही हिसाब देना पड़ता है.

सियासत के शादी समारोह में कैसे बजेंगे बैंड-बाजे
खर्च की बात करें तो राजनीतिक दलों के लिए चुनाव किसी परिवार में होने वाली शादी की तरह होते हैं. शादी में हाथ खींचकर खर्च किया जा सकता है. बारात छोटी बुलाई जा सकती है. व्यंजन कम किये जा सकते हैं. लेकिन चुनावी शादी में न बाराती घटाये जा सकते हैं और न ही बैंडबाजों का शोर कम किया जा सकता है. अब यह राजनीतिक दलों के मैनेजमेंट के ऊपर है कि इस शादी के खर्च को कैसे मैनेज करेंगे.

Tags: BJP, Uttarakhand news

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