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ऋषिकेश के टाट वाले बाबा को कैसे मिला ये नाम, जानिए उन्हीं की जुबानी

ऋषिकेश के टाट वाले बाबा को कैसे मिला ये नाम, जानिए उन्हीं की जुबानी

टाट

टाट वाले बाबा शंकर दास जी.

टाट वाले बाबा के शिष्य स्वामी शंकर दास महाराज भी टाट वाले बाबा के नाम से ही जाने जाते हैं. 

    उत्तराखंड का ऋषिकेश संतों की नगरी के नाम से भी प्रसिद्ध है. देश-विदेश से लोग शांति और समाधान की तलाश में यहां साधु-संतों के पास आते हैं. ऐसे ही यहां एक संत मणिकूट पर्वत की गुफा में निवास करते हैं, जिन्हें लोग टाट वाले बाबा (Taat Wale Baba Rishikesh) के नाम से जानते हैं. यह वही बाबा हैं, जिन्होंने कुछ समय पहले अयोध्या में बन रहे भव्य राम मंदिर के लिए एक करोड़ रुपये दान किए थे.

    टाट वाले बाबा के शिष्य स्वामी शंकर दास महाराज भी टाट वाले बाबा के नाम से ही जाने जाते हैं. वे पिछले 60 वर्षों से मणिकूट पर्वत पर बनी गुफा में रह रहे हैं. उन्होंने बताया कि साधना के समय उन्होंने केवल पत्ते खाकर अपना जीवन व्यतीत किया था. राम मंदिर के लिए एक करोड़ रुपये दान देने के सवाल पर उन्होंने कहा कि वह साल 1983 से राम मंदिर के लिए धन इकट्ठा कर रहे थे.

    बता दें कि इनके गुरु टाट वाले बाबा स्वामी महावीर दास ने करीब 90 वर्ष की आयु में अपना शरीर त्याग दिया था. 60 के दशक में चौरासी कुटिया शुरू करने से पहले महेश योगी ने टाट वाले बाबा को ही शुभारंभ के लिए आमंत्रित किया था. बताते हैं कि इन्हीं गुफाओं से प्रेरित होकर महेश योगी ने चौरासी कुटिया की स्थापना की थी.

    दरअसल इस गुफा का नाम टाट वाली गुफा इसलिए पड़ा, क्योंकि टाट वाले बाबा महावीर दास अपने शरीर पर एक लंगोटी के अलावा कुछ नहीं पहनते थे और एक टाट ही होता था, जिसे वह बिछाते और ओढ़ते थे. टाट वाली इस गुफा के आसपास कुछ और गुफाएं भी मौजूद हैं. अध्यात्म की तलाश में यहां आने वाले साधकों को ध्यान करने के लिए यह गुफाएं दी जाती हैं. साधकों के खाने-पीने का खर्च बाबा ही उठाते हैं. टाट वाले बाबा कहते हैं कि जो भी व्यक्ति स्वयं को जानना चाहता है, तो उसे कुछ समय एकांत में आकर साधना जरूर करनी चाहिए.

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